द सूत्र की खबर का असर: जेल डीजी ने शासन से कहा- वर्दी भत्ते पर करें पुनर्विचार
द सूत्र की खबर का बड़ा असर हुआ है। जेल प्रहरियों के वर्दी भत्ते की फाइल फिर खुल गई है। जेल विभाग के महानिदेशक हिमांशु गुप्ता ने गृह विभाग को पत्र लिखा है। उन्होंने शासन से फैसले पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया है। अब यह मामला फिर से शासन के उच्च स्तर पर पहुंच गया है।
16 जून की खबर बनी चर्चा का विषय
द सूत्र ने 16 जून को ''बजट में डेढ़ करोड़ का प्रावधान, वर्दी भत्ता नहीं दे रहा वित्त विभाग'' शीर्षक से खबर प्रकाशित की थी। खबर में बताया गया था कि जेल विभाग के जवानों को वर्दी भत्ता देने के लिए बजट में राशि रखी गई है। इसके बावजूद उन्हें लाभ नहीं मिल रहा। खबर के बाद विभागीय स्तर पर हलचल तेज हो गई।
सरकार ने वाहवाही लूटी, फाइल अटक गई
बजट सत्र में सरकार ने जेल जवानों के लिए वर्दी किट भत्ते की घोषणा की थी। इसके लिए डेढ़ करोड़ रुपए का प्रावधान भी किया गया। घोषणा के बाद सरकार ने इसे कर्मचारी हितैषी फैसला बताया। लेकिन जब प्रस्ताव स्वीकृति के लिए आगे बढ़ा तो वित्त विभाग ने असहमति जता दी। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर आपत्ति किस बात पर थी?
कारण बताए बिना लगा दी रोक
सूत्रों के मुताबिक वित्त विभाग ने प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी। हैरानी की बात यह है कि असहमति का कोई स्पष्ट कारण भी सामने नहीं आया। इससे जेल विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों में नाराजगी है। उनका कहना है कि बजट में राशि स्वीकृत होने के बाद भी लाभ नहीं मिलना समझ से परे है।
पुलिस की तर्ज पर भत्ता देने की मांग
जेल विभाग ने अपने पत्र में पुलिस विभाग का उदाहरण दिया है। राज्य में आरक्षक और प्रधान आरक्षक को हर साल 8 हजार रुपए का वर्दी किट भत्ता मिलता है। यह व्यवस्था 2023 से लागू है। जेल विभाग का तर्क है कि उनके जवान भी वर्दीधारी बल का हिस्सा हैं। इसलिए उन्हें भी समान सुविधा मिलनी चाहिए।
हर जवान को मिलना है 8 हजार रुपए
प्रस्ताव के अनुसार जेल प्रहरी, मुख्य प्रहरी और प्रमुख मुख्य प्रहरी को हर साल 8 हजार रुपए का एकमुश्त वर्दी किट भत्ता दिया जाना है। यह राशि सीधे कर्मचारियों को मिलेगी। इससे वे अपनी जरूरत के अनुसार वर्दी और अन्य सामग्री खरीद सकेंगे। विभाग का मानना है कि इससे व्यवस्था अधिक व्यावहारिक होगी।
अभी क्या है व्यवस्था
वर्तमान व्यवस्था में विभाग कपड़ा खरीदता है। जिसे जवानों को दे दिया जाता है। जवान अपने खर्च वर्दी सिलवाते हैं। जूते, बेल्ट, मोजे और कैप जैसी सामग्री भी जवान को ही लेनी होती है। इस पूरी प्रक्रिया में समय और संसाधन दोनों खर्च होते हैं। विभाग का कहना है कि नकद भत्ता देने से यह व्यवस्था सरल हो जाएगी।
डीजी ने गृह विभाग से मांगा सहयोग
महानिदेशक हिमांशु गुप्ता ने प्रमुख सचिव गृह निहारिका बारिक को पत्र भेजा है। पत्र में अनुरोध किया गया है कि प्रस्ताव पर सहानुभूतिपूर्वक पुनर्विचार किया जाए। साथ ही इसे प्रशासकीय स्वीकृति देने की सिफारिश की जाए। बताया जा रहा है कि गृह विभाग इस प्रस्ताव को फिर वित्त विभाग के पास भेज सकता है।
बजट में है डेढ़ करोड़ का प्रावधान
वित्तीय वर्ष 2026-27 के मुख्य बजट में इस मद के लिए 1 करोड़ 50 लाख रुपए का प्रावधान पहले से मौजूद है। राशि आवर्ती व्यय के तहत स्वीकृत है। बजट हेड भी तय है। ऐसे में जेल विभाग का तर्क है कि वित्तीय बोझ का सवाल भी नहीं उठता।
अब वित्त विभाग के फैसले पर नजर
पूरा मामला अब फिर वित्त विभाग के पाले में पहुंच गया है। जेल जवानों को उम्मीद है कि इस बार सकारात्मक निर्णय होगा। बड़ा सवाल अब भी वही है। जब बजट में पैसा है और विभाग भी सहमत है, तो वित्त ने फाइल क्यों अटका दी? इधर विपक्ष आने वाले विधानसभा सत्र में यह पूछने की तैयारी कर रहा है कि उप मुख्यमंत्री वाले विभाग की सहमति पर, वित्त मंत्री वाला विभाग कैसे असहमत हो रहा?
FAQ
- जेल प्रहरियों के वर्दी भत्ते का प्रस्ताव क्या है?
जेल विभाग ने प्रस्ताव दिया है कि जेल प्रहरी, मुख्य प्रहरी और प्रमुख मुख्य प्रहरी को हर साल 8,000 रुपये का वर्दी किट भत्ता दिया जाए, जिससे वे अपनी वर्दी और जरूरी सामान खुद खरीद सकें। - क्या पुलिस विभाग को भी वर्दी भत्ता मिलता है?
हाँ, राज्य में पुलिस आरक्षक और प्रधान आरक्षक को 2023 से हर साल 8,000 रुपये का वर्दी किट भत्ता दिया जा रहा है, जिसे आधार बनाकर जेल विभाग ने भी समान सुविधा की मांग की है।
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