छतीसगढ़ में योजनाएं ठप ; भारी-भरकम बजट के बाद भी विकास की रफ्तार सुस्त, फंड लैप्स

Aishwarya Dwivedi | May 14, 2026, 11:01 IST
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छत्तीसगढ़ के 2 लाख करोड़ के बजट में सामाजिक योजनाओं पर भारी खर्च हुआ, लेकिन बुनियादी ढांचा पिछड़ गया। पीएचई और पीडब्ल्यूडी विभाग अपना आधा बजट भी खर्च करने में विफल रहे।

NEWS IN SHORT

  • प्रदेश का कुल बजट बढ़कर दो लाख करोड़ रुपए पहुंचा।
  • पीएचई विभाग का 81 प्रतिशत बजट खर्च हुए बिना लौटा।
  • पीडब्ल्यूडी की कार्य रफ्तार सुस्त, आधा फंड भी नहीं खर्च।
  • सामाजिक सुरक्षा और राशन योजनाओं पर बजट से अधिक व्यय।
  • तकनीकी खामियों और विभागीय देरी से विकास कार्य बुरी तरह प्रभावित।

NEWS IN DETAIL

छत्तीसगढ़ सरकार के वर्ष 2025-26 के बजट आंकड़ों ने विकास की प्राथमिकताओं और धरातल पर क्रियान्वयन को लेकर एक विरोधाभासी तस्वीर पेश की है। प्रदेश का कुल बजट 2 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 25% अधिक है। हालांकि, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी (PHE) और लोक निर्माण विभाग (PWD) जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचागत विभागों में भारी बजट सरेंडर होने से विकास की सुस्त रफ्तार पर सवाल खड़े हो रहे हैं।



कल्याणकारी योजनाओं में बंपर खर्च

Bumper Spending on Welfare Schemes


बजट विश्लेषण से स्पष्ट है कि सरकार का पूरा ध्यान महतारी वंदन और राशन जैसी सामाजिक सुरक्षा और सब्सिडी वाली योजनाओं पर है। इन विभागों ने न केवल अपना बजट उपयोग किया, बल्कि आवंटित राशि से कहीं अधिक खर्च किया है।



खाद्य विभाग: 9441 करोड़ के बजट के मुकाबले 20007 करोड़ (212%) खर्च किए।



छत्तीसगढ़ महिला एवं बाल विकास विभाग: 8243 करोड़ के मुकाबले 9903 करोड़ (120%) खर्च।



नगरीय प्रशासन: 6044 करोड़ के मुकाबले 6609 करोड़ (109%) खर्च।



इसके विपरीत, बुनियादी सुविधाओं वाले विभागों की स्थिति चिंताजनक है। PHE विभाग अपने 5300 करोड़ के बजट का मात्र 19.1% (1011 करोड़) ही खर्च कर पाया, यानी करीब 81% राशि लैप्स हो गई। वहीं, PWD ने 9509 करोड़ में से केवल 4563 करोड़ (48%) खर्च किए।



अबूझमाड़ में नल है, पर जल नहीं

पैसे की उपलब्धता के बावजूद धरातल पर संकट गहरा है। नारायणपुर के अबूझमाड़ स्थित कारकानार गांव की तस्वीर सरकारी दावों की पोल खोलती है। यहां 250 की आबादी आज भी झिरिया और नालों का गंदा पानी पीने को मजबूर है।



ग्रामीण महिलाएं 2-3 किमी पथरीले रास्तों से पानी लाती हैं। जल जीवन मिशन के तहत नल तो लगा दिए गए हैं, लेकिन उनमें पानी नहीं पहुंचा है। यही हाल प्रदेश के फ्लोराइड प्रभावित जिलों का है, जहां बजट होने के बाद भी समाधान ठप है।



जटिल प्रक्रिया और खराब वर्क कल्चर

In Abujhmad


विशेषज्ञों और वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, विभागों की सुस्ती के पीछे प्रशासनिक और तकनीकी कारण प्रमुख हैं:



1. प्रक्रियागत देरी: डीपीआर तैयार करने, तकनीकी स्वीकृति और टेंडर प्रक्रिया (L-1 चयन) में ही 4 से 6 महीने बर्बाद हो जाते हैं।



2. क्लियरेंस की बाधा: PWD के कई प्रोजेक्ट्स भूमि अधिग्रहण और वन विभाग की मंजूरी न मिलने के कारण सालों से अटके हैं।



3. केंद्र से फंड का अभाव: PHE अधिकारियों का दावा है कि 2025-26 में केंद्र से राशि प्राप्त नहीं हुई, जिससे रफ्तार प्रभावित हुई।



उपमुख्यमंत्री का पक्ष और आर्थिक स्थिति

उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने विभाग का बचाव करते हुए कहा कि बजट की पूरी राशि खर्च न होने का अर्थ सुस्ती नहीं है। उन्होंने बताया कि PWD ने इस वर्ष 754 सड़कों और 200 पुलों के लिए 9129 करोड़ की प्रशासकीय स्वीकृति दी है, जो पिछले वर्षों की तुलना में कहीं अधिक है।



वहीं, वित्तीय मोर्चे पर राज्य की स्थिति स्थिर बताई गई है। छत्तीसगढ़ का कर्ज-जीएसडीपी अनुपात 24% है, जो पंजाब और हिमाचल जैसे राज्यों से काफी बेहतर है। सरकार अब उधारी के बजाय जीएसटी और खनिज रॉयल्टी के माध्यम से स्वयं की आय बढ़ाने पर जोर दे रही है।



FAQ

1. बजट की राशि कितनी थी और कितना विस्तार हुआ?



कुल बजट ₹2 लाख करोड़ था, जो पिछले वर्ष से 25% अधिक है।



2. किन विभागों का प्रदर्शन सबसे खराब रहा?



पीएचई (PHE) ने 81% और पीडब्ल्यूडी (PWD) ने 52% बजट खर्च नहीं किया।



3. किन क्षेत्रों में सबसे अधिक खर्च हुआ?



खाद्य (राशन) और महिला-बाल विकास (महतारी वंदन) जैसी सामाजिक योजनाओं पर।



4. विकास कार्यों में देरी का मुख्य कारण क्या है?



डीपीआर, टेंडर प्रक्रिया में देरी और खराब वर्क कल्चर मुख्य कारण हैं।



निष्कर्ष

रिटायर्ड आईएएस सुशील त्रिवेदी के अनुसार, एक ओर बजट का 81% सरेंडर होना और दूसरी ओर कुछ विभागों में दो गुना खर्च होना, दोनों ही स्थितियां वित्तीय प्रबंधन के लिए चिंताजनक हैं। विकास और कल्याण के बीच संतुलन बनाना सरकार के लिए आने वाले समय में बड़ी चुनौती होगी।



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