राजधानी रायपुर में तीन बड़े प्रोजेक्ट वर्षों से अधूरे, लागत 110 करोड़ रुपए बढ़ी; जनता और छात्रों को भारी परेशानी

Aishwarya Dwivedi | Apr 26, 2026, 12:11 IST
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रायपुर में तीन प्रमुख प्रोजेक्ट समय से पीछे, लागत 110 करोड़ बढ़ी। अधूरे कार्यों से आम जनता, मरीज और छात्रों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

NEWS IN SHORT

  • स्काईवाक सात वर्षों से अधूरा, लागत लगातार बढ़ी
  • सिकलसेल संस्थान तकनीकी खामियों से रुका, लागत दोगुनी
  • मेडिकल हॉस्टल निर्माण बंद, छात्रों को असुविधा जारी
  • लापरवाही से परियोजनाओं की समय सीमा पूरी नहीं हुई
  • जवाबदेही तय न होने से विकास कार्य प्रभावित लगातार

NEWS IN DETAIL

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में चल तीन प्रमुख विकास कार्य चल रहे हैं। स्काईवाक परियोजना, मेडिकल कॉलेज हॉस्टल और सिकलसेल संस्थान निर्धारित जिसमे लगभग दो साल की देरी के बावजूद अभी तक काम पूरा नहीं हो पाया हैं। इन अधूरे प्रोजेक्ट्स के कारण न केवल आम जनता और मरीजों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, बल्कि इनकी लागत में भी लगभग 110 करोड़ रुपए की भारी वृद्धि हो चुकी है।



स्काईवाक योजना

इन परियोजनाओं में सबसे चर्चित स्काईवाक योजना है, जिसे वर्ष 2016-17 में 42 करोड़ 55 लाख रुपए की लागत से शुरू किया गया था। शुरुआत में इसका उद्देश्य शहर के प्रमुख चौराहों पर पैदल आवागमन को सुगम बनाना था, लेकिन 2018 में सरकार बदलने के बाद काम ठप पड़ गया।



लंबे समय तक निर्माण कार्य रुका रहने के कारण ढांचे में जर्जरता आ गई और अब इसकी लागत बढ़कर लगभग 80 करोड़ रुपए तक पहुंच चुकी है। वर्तमान में काम धीमी गति से चल रहा है, लेकिन शास्त्री चौक क्षेत्र में निर्माण सामग्री और लोहे के खंभों के कारण यातायात व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित है और जाम की स्थिति बनी रहती है।



सिकलसेल संस्थान का सेंटर ऑफ एक्सीलेंस

दूसरी बड़ी परियोजना देवेंद्रनगर चौक स्थित सिकलसेल संस्थान का सेंटर ऑफ एक्सीलेंस है। 2.96 एकड़ क्षेत्र में बन रहे इस संस्थान का निर्माण जून 2023 में शुरू हुआ था। इसकी प्रारंभिक लागत 48 करोड़ 12 लाख रुपए तय की गई थी। इसे अगस्त 2025 तक पूरा किया जाना था, लेकिन डिजाइन और तकनीकी खामियों के कारण काम बीच में रोकना पड़ा।



लंबे समय तक कार्य बंद रहने से इसकी लागत लगभग दोगुनी होकर 99.23 करोड़ रुपए तक पहुंच गई है। इस परियोजना के पूरा न होने से सिकलसेल मरीजों के इलाज और शोध कार्यों पर भी प्रतिकूल असर पड़ा है।



मेडिकल कॉलेज हॉस्टल

तीसरी परियोजना मेडिकल कॉलेज हॉस्टल की है, जिसका उद्देश्य छात्रों और डॉक्टरों के लिए आधुनिक आवास सुविधा उपलब्ध कराना था। इस परियोजना की मंजूरी 42 करोड़ 73 लाख रुपए में दी गई थी। इसका निर्माण कार्य 2021 में शुरू हुआ था। लेकिन अप्रैल 2023 की समयसीमा बीत जाने के बाद भी काम अधूरा है। पिछले तीन वर्षों से निर्माण रुका हुआ है और अब इसकी लागत में लगभग 21 करोड़ रुपए की वृद्धि दर्ज की गई है। इसके चलते मेडिकल छात्रों को अभी भी पुराने और सीमित सुविधाओं वाले हॉस्टलों में रहना पड़ रहा है।



पीडब्ल्यूडी विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल

इन तीनों परियोजनाओं की देरी को लेकर पीडब्ल्यूडी विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि शुरुआती चरण में डीपीआर (डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट) में तकनीकी पहलुओं की अनदेखी, समय पर मॉनिटरिंग की कमी और एजेंसियों पर कार्रवाई न होना इस स्थिति के प्रमुख कारण हैं।



तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार, यदि समय पर समीक्षा और सख्त निगरानी की जाती तो करोड़ों रुपए की अतिरिक्त लागत बचाई जा सकती थी। अब जरूरत इस बात की है कि जिम्मेदारी तय की जाए और निर्माण कार्यों को निर्धारित समय सीमा में पूरा करने के लिए सख्त व्यवस्था लागू की जाए, ताकि जनता को राहत मिल सके और विकास कार्यों पर खर्च होने वाला सार्वजनिक धन व्यर्थ न जाए।



निष्कर्ष

रायपुर के स्काईवाक, सिकलसेल संस्थान और मेडिकल कॉलेज हॉस्टल जैसे तीन बड़े प्रोजेक्ट वर्षों से अधूरे पड़े हैं। जिससे लागत 110 करोड़ रुपए बढ़ गई है। देरी, तकनीकी खामियां और लापरवाही के कारण जनता, मरीज और छात्र प्रभावित हैं। जवाबदेही तय न होने से विकास कार्यों पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।



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