उल्लू रेस्क्यू की लाइव रिपोर्ट ! घायल पक्षी 24 घंटे बिना खाना, इलाज को तरसा

VINAY VERMA | Jul 20, 2026, 15:52 IST
उल्लू रेस्क्यू की लाइव रिपोर्ट
रायपुर में घायल उल्लू 24 घंटे इलाज को तरसता रहा। पर्यावरण प्रेमियों के बचाने के बाद वन विभाग अधिकारी इलाज के बजाय फोटो खिंचवाते रहे। सेंघ की नाराजगी के 24 घंटे बाद उसकां इलाज शुरू हुआ।

क्या है पूरा मामला

रायपुर में 18 जुलाई की शाम एक घायल उल्लू सड़क किनारे गिरा मिला। उसका एक पंख नहीं था। आसपास खेल रहे बच्चे उसे पत्थर मार रहे थे। तभी पर्यावरण प्रेमी संघ के संस्थापक आरडी दहिया ने उसे बचाया और घर ले आए। यहीं से शुरू हुई एक ऐसी कहानी, जिसने वन विभाग की रेस्क्यू व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए। विभाग ने घायल पक्षी को तत्काल इलाज दिलाने के बजाय पूरे दिन इधर-उधर घुमाया। 24 घंटे तक न उसे खाना मिला, न इलाज। इस दौरान कई अधिकारी केवल हैंडओवर और फोटो की चिंता करते रहे।



मुख्यालय से प्वाइंट, फिर भी मनमानी

संघ के सदस्य विद्याभूषण दूबे ने 18 जून को घायल उल्लू की फोटो अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक शालिनी रैना को भेजी। इसके बाद कई अधिकारियों और कर्मचारियों के फोन आने लगे। सभी उल्लू को अपनी कस्टडी में लेने की बात कर रहे थे। लेकिन संघ ने साफ कहा कि प्रदेश में वन्यजीव तस्करी के मामले सामने आते रहते हैं, इसलिए पक्षी को बिना पारदर्शी प्रक्रिया के नहीं सौंपेंगे। उनकी शर्त थी कि वन विभाग की मौजूदगी में सुरक्षित स्थान पर छोड़ा जाएगा और पूरी प्रक्रिया सामने होगी। जवाब सुनते ही फोन आने की संख्या कम हो गई। व्यवस्था कुछ कर्मचारियों के भरोसे छोड़ दी गई।



सुबह से शाम तक सिर्फ इंतजार

रातभर उल्लू संघ के पास रहा। अगले दिन तय हुआ कि वन विभाग की टीम उसे 40 किलोमीटर दूर मोहरेंगा नेचर सफारी ले जाएगी। संघ के सदस्य भी साथ रवाना हुई। लेकिन वहां पहुंचने के बाद घंटों किसी बडे़ अधिकारी का इंतजार होता रहा। मौके पर न इलाज की तैयारी थी, न कोई स्पष्ट योजना। घायल पक्षी पिंजरे में तड़पता रहा और जिम्मेदार अधिकारी आने का इंतजार होता रहा। सहायक परिक्षेत्र अधिकारी फेंकू राम वर्मा हर बार यही बताते बस 10 मिनट में साहब पहुंच ही रहे हैं।



पहले फोटो, फिर इलाज की बात

दोपहर करीब ढाई बजे अरण्य भवन में पदस्थ डीएफओ आलोक तिवारी परिवार के साथ सरकारी वाहन से नेचर सफारी पहुंचे। पता चला इन्हीं के हाथों उल्लू के छोड़ने की योजना थी। फिर शुरु फोटो सेशन.. परिवार के सदस्यों ने घायल उल्लू के साथ अलग-अलग एंगल से तस्वीरें खिंचवाईं। जब संघ के सदस्यों ने कहा कि पक्षी घायल है और उसे तत्काल चिकित्सा चाहिए, तब जाकर पता चला कि नेचर सफारी में इलाज की सुविधा नहीं है। उसे अब 43 किलोमीटर दूर जंगल सफारी ले जाना होगा।



डॉक्टर को सूचना तक नहीं

वन विभाग की ओर से बताया गया कि जंगल सफारी मे डॉक्टरों को पहले ही सूचना दे दी गई है। लेकिन संघ के सदस्यों ने जब स्वयं डॉक्टर से फोन पर बात की, तो उन्होंने ऐसी किसी पूर्व सूचना से इनकार किया। हालांकि उन्होंने इलाज का भरोसा दिया। इसके बाद संघ के सदस्यों ने शाम करीब साढ़े छह बजे घायल उल्लू को जंगल सफारी पहुंचाया। तब जाकर वहां इलाज शुरू हुआ।



तस्करी के लगातार मामले

उल्लू देश में सबसे ज्यादा तस्करी होने वाले पक्षियों में शामिल है। तंत्र-मंत्र और अवैध व्यापार में इसकी मांग रहती है। सामान्य दिनों में इसकी अवैध कीमत करीब 1 लाख रुपए तक बताई जाती है, जबकि दीपावली के आसपास यह कीमत करीब 2 लाख रुपए तक बढ़ जाती है। इसी वजह से संघ ने बिना निगरानी के पक्षी सौंपने से इनकार किया। उनका कहना है कि यदि विभाग पूरी प्रक्रिया पारदर्शी रखता, तो विवाद की नौबत ही नहीं आती।



सादे पेज पर पावती

इतना ही नहीं उल्लू के रिसीविंग की पावती तक विभाग नहीं दे रहा था। बताया गया कि रविवार होने के कारण कार्यालय बंद है। जब संघ के सदस्यों ने नाराजगी जताई तब जाकर एक सादे पेज पर पावती बनाकर दिया गया। फॉरेस्ट विभाग में मनमानी का आलम तब है जब राज्य में वन्य जीवों की तस्करी के कई मामले सामने आ रहे हैं। इसमे विभागीय अधिकारियों के नाम भी जुड़ रहे हैं। हाल ही में बाघो के खाल की तस्करी को लेकर महाराष्ट्र और छग खुद को चिंतित बता रहे हैं।



फोन बंद, जवाब बंद... सवाल बाकी’

संघ के सदस्यो ने बताया कि जब उन्होंने हैंडओवर देने से पहले साथ चलने की शर्त रखी, तो सुबह से लगातार संपर्क करने वाले कई अधिकारी और कर्मचारी फोन रिसीव करना तक बंद कर दिए। इससे संदेह और गहरा हुआ। विभाग की प्राथमिकता घायल वन्यजीव की जान बचाना था या सिर्फ औपचारिक हैंडओवर पूरा करना? इस सवाल का जवाब अभी बाकी है। हालांकि वन विभाग की ओर से इन आरोपों पर आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।



5 बड़े सवाल

  1. भारत में उल्लू की तस्करी क्यों होती है और वन्यजीव संरक्षण कानून के तहत इसे क्या सुरक्षा प्राप्त है?
    भारत में उल्लू की तस्करी मुख्य रूप से अंधविश्वास, तंत्र-मंत्र, और अवैध व्यापार के लिए की जाती है। भारत में पाई जाने वाली उल्लू की सभी प्रजातियाँ भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 (Wildlife Protection Act, 1972) के तहत संरक्षित हैं, जिसके तहत इनका शिकार, पकड़ना या व्यापार करना पूरी तरह से गैर-कानूनी और दंडनीय अपराध है।
  2. छत्तीसगढ़ का प्रसिद्ध 'जंगल सफारी' कहाँ स्थित है?
    छत्तीसगढ़ का जंगल सफारी नवा रायपुर (अटल नगर) में स्थित है। यह एशिया की सबसे बड़ी मानव निर्मित (Man-made) सफारियों में से एक है और इसका आधिकारिक नाम 'जंगल सफारी' है।
  3. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लुप्तप्राय जीवों के व्यापार को रोकने के लिए कौन सा समझौता लागू है?
    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वन्यजीवों और पक्षियों (जैसे उल्लू) के अवैध व्यापार को रोकने के लिए CITES (Convention on International Trade in Endangered Species of Wild Fauna and Flora) नाम की वैश्विक संधि लागू है, भारत भी जिसका एक हस्ताक्षरकर्ता सदस्य देश है।
  • भारत में उल्लू की तस्करी क्यों होती है और वन्यजीव संरक्षण कानून के तहत इसे क्या सुरक्षा प्राप्त है?
    भारत में उल्लू की तस्करी मुख्य रूप से अंधविश्वास, तंत्र-मंत्र, और अवैध व्यापार के लिए की जाती है। भारत में पाई जाने वाली उल्लू की सभी प्रजातियाँ भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 (Wildlife Protection Act, 1972) के तहत संरक्षित हैं, जिसके तहत इनका शिकार, पकड़ना या व्यापार करना पूरी तरह से गैर-कानूनी और दंडनीय अपराध है।
  • छत्तीसगढ़ का प्रसिद्ध 'जंगल सफारी' कहाँ स्थित है?
    छत्तीसगढ़ का जंगल सफारी नवा रायपुर (अटल नगर) में स्थित है। यह एशिया की सबसे बड़ी मानव निर्मित (Man-made) सफारियों में से एक है और इसका आधिकारिक नाम 'जंगल सफारी' है।
  • अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लुप्तप्राय जीवों के व्यापार को रोकने के लिए कौन सा समझौता लागू है?
    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वन्यजीवों और पक्षियों (जैसे उल्लू) के अवैध व्यापार को रोकने के लिए CITES (Convention on International Trade in Endangered Species of Wild Fauna and Flora) नाम की वैश्विक संधि लागू है, भारत भी जिसका एक हस्ताक्षरकर्ता सदस्य देश है।

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