जंगल बचाने से ज्यादा ट्रेनिंग पर खर्च! एमपी वन विभाग के बजट पर उठे सवाल

Sanjay Sharma | Jul 01, 2026, 22:17 IST
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एमपी वन विभाग के बजट पर उठे सवाल
एमपी वन विभाग के बजट पर उठे सवाल

मध्य प्रदेश के वन क्षेत्रों में अतिक्रमण बढ़ा है। सुरक्षा बजट केवल 27 करोड़ रुपए रखा गया। मानव संसाधन पर 43 करोड़ रुपए खर्च होंगे। प्रशिक्षण खर्च पर भी सवाल उठ रहे हैं। वनरक्षकों के पास पर्याप्त हथियार और अधिकार नहीं हैं।

समझें क्या है पूरा मामला

  • वन विभाग ने सुरक्षा शाखा को दिए 27 करोड़, ट्रेनिंग पर 43 करोड़ खर्च।
  • हथियार चलाने का अधिकार न होने से वनरक्षकों पर 40% बढ़े हमले।
  • खंडवा में कार्रवाई करने पहुंचे वनकर्मियों पर भीड़ द्वारा हमले की वारदात।
  • जहां जरूरत कम वहां वनों की सुरक्षा और संसाधन जुटाने से ज्यादा खर्च
  • अधिकारियों का ध्यान कागजी प्रशिक्षण पर ज्यादा, मैदानी स्थिति कमजोर

वनकर्मियों के पास संसाधन तक नहीं

मध्य प्रदेश के जंगल अतिक्रमण के मामले में देश में सबसे बदहाल हैं। 77 हजार 73 वर्ग किमी जंगल की सुरक्षा को विभाग के अधिकारी ही अनदेखा कर रहे हैं। स्थिति ये है कि वनों की सुरक्षा के लिए बंद कमरों में कागजी प्रशिक्षण को ज्यादा तवज्जो दी जा रही है। वहीं जंगलों में गश्त करने वाले वनकर्मियों के पास हथियार और संसाधन तक नहीं हैं। विडंबना यह है कि सुरक्षा शाखा को सिर्फ 27 करोड़ का बजट मिला, वहीं प्रशिक्षण के लिए ही 43 करोड़ और वानिकी को 37 करोड़ दिए गए।

वनरक्षकों के पास नहीं संसाधन

मध्य प्रदेश के वनों की सुरक्षा की जिम्मेदारी उठा रहे वनकर्मियों के पास सुरक्षा के संसाधन तक नहीं है। उन्हें पुरानी रायफल थमाई गई हैं लेकिन इन्हें चलाने का अधिकार ही नहीं दिया गया। इसी वजह से रात में वन क्षेत्र में गश्त के दौरान जंगल माफिया और लकड़ी चोर उन्हें निशाना बना रहे हैं। बदमाशों में वनकर्मियों का खौफ भी नहीं है। जिससे जंगल से पेड़ों की कटाई और वन्यजीवों का शिकार नहीं रुक रहा है।

बजट का गलत बंटवारा

प्रदेश के 77 हजार 073 वर्ग किमी वन क्षेत्र की सुरक्षा के नाम पर 27 करोड़ का बजट दिया गया है। हैरानी की बात यह है कि बंद कमरों में प्रशिक्षण देने के लिए मानव संसाधन शाखा को 43 करोड़ को बड़ा बजट मिला है। प्रशिक्षण के नाम पर इसका बड़ा हिस्सा फाइलों पर ही खर्च हो जाता है।

वहीं पर्यावरण वानिकी शाखा को भी 37 करोड़ मिले। यानी जिस इकाई के पास सबसे अहम जिम्मेदारी है उसे सबसे कम जबकि ट्रेनिंग जैसे कम महत्वपूर्ण काम को ज्यादा राशि दी गई है। 77 हजार वर्ग किमी से भी ज्यादा विस्तृत वन क्षेत्र की सुरक्षा के लिए 27 करोड़ रुपए के बजट को कहीं से भी पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

वनकर्मियों की बेहद कमी

वन विभाग में मुख्यालय में तो पर्याप्त कर्मचारी है लेकिन वनकर्मियों की संख्या और मैदानी अमला काफी कम है। वन मंडलों में तैनात वनकर्मियों के पास वन क्षेत्रों की सुरक्षा की दोहरी- तिहरी जिम्मेदारी है।

कई जगह तो एक वनरक्षक तीन से ज्यादा क्षेत्रों में गश्त करने मजबूर है। उनके पास अपनी सुरक्षा के लिए सुरक्षा कवच और हेलमैट तक नहीं हैं। वनक्षेत्र में लकड़ी चोर और शिकारियों से सामना होने पर उन्हें अपनी सुरक्षा करना भी मुश्किल हो जाता है।

वन अमले को फोर्स का दर्जा नहीं

शिकारी या लकड़ी चोरों से टकराव के दौरान भी वनकर्मियों को फायरिंग का अधिकार नहीं है। बीते सालों में आमने- सामने भिड़ंत की स्थिति में फायर करने पर कई वनकर्मी निलंबित और बर्खास्त किए जा चुके हैं। उन्हें हत्या जैसे अपराधों में आरोपी भी बनाया गया है। वनकर्मी भी फोर्स का दर्जा देने की मांग कर रहे हैं। पुलिस की तरह अपराधियों पर नकेल कसने के दायित्व को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट भी सुझाव दे चुका है, लेकिन निर्णय नहीं लिया गया ।

वनकर्मियों पर बढ़ रहे हमले

वनकर्मियों को जंगल में गश्त के दौरान भिड़ंत होने पर भी लकड़ी चोर या शिकारियों पर सख्ती का अधिकार नहीं हैं। बदमाशों द्वारा उनकी इस लाचारी का फायदा उठाकर फायरिंग, पथराव जैसे तरीके अपनाए जाते हैं। गोफन, पथराव और गोली दागने की वारदातों के अलावा वनकर्मियों को वाहन से कुचलने, उनके वाहनों को टक्कर मारकर घायल करने जैसी दर्जनों वारदात बीते सालों में हुई हैं।

हाल ही में खंडवा और बुरहानपुर में वनक्षेत्र से कब्जा हटाने गए वनकर्मियों को घेरकर जानलेवा हमला भी किया गया था। इस घटना में 12 से ज्यादा वनकर्मी जख्मी हुए थे। वहीं देवास, भोपाल के बैरसिया, मुरैना में भी वनकर्मियों को जोखिम का सामना करना पड़ा है।

40 फीसदी ज्यादा वारदात

वनकर्मियों पर बीते सालों के मुकाबले हमलों की वारदात 40 फीसदी से भी ज्यादा बढ़ गई हैं। हर साल 50 से ज्यादा वनकर्मी शिकारी और लकड़ी चोरों के हमले में जख्मी हो रहे हैं। वहीं अंचल के जंगल में सख्ती दिखाने पर वनकर्मियों पर दबाव डाला जाता है। ऐसे मामलों में राजनीतिक दखल के चलते वनकर्मी चुप रहने मजबूर हो जाते हैं।

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