राजनांदगांव : पांच करोड़ की सिटी बसें कबाड़, जिम्मेदार मौन
NEWS IN SHORT
- राजनांदगांव में पांच करोड़ की सिटी बसें हुईं पूरी तरह कबाड़।
- कोरोना काल के बाद सड़कों से गायब हुईं सभी सिटी बसें।
- जिला अर्बन कमेटी के पास नहीं है बसों की कोई जानकारी।
- इतनी बड़ी लापरवाही पर भी अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।
- पुरानी बसें ठप, अब प्रशासन कर रहा ई-बस चलाने की तैयारी।
NEWS IN DETAIL
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में खाड़ी युद्ध के संकट और ईंधन की बढ़ती कीमतों को देखते हुए देशवासियों से पेट्रोल-डीजल की बचत करने की अपील की थी। उन्होंने नागरिकों से व्यक्तिगत वाहनों की जगह सार्वजनिक परिवहन (पब्लिक ट्रांसपोर्ट) का उपयोग करने को कहा था। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि राजनांदगांव जैसे शहरों में इस अपील पर अमल करना आम जनता के लिए मुमकिन ही नहीं है, क्योंकि शहर में सार्वजनिक परिवहन सेवा पूरी तरह से दम तोड़ चुकी है।
5 करोड़ का बजट, नतीजा शून्य
आज से करीब दस साल पहले राजनांदगांव की जनता को सुलभ, सस्ती और सुरक्षित यातायात सुविधा देने के उद्देश्य से एक महत्वाकांक्षी योजना शुरू की गई थी। इसके तहत लगभग 5 करोड़ रुपए की भारी-भरकम लागत से 20 सिटी बसें खरीदी गई थीं। शुरुआत में कुछ रूटों पर इन बसों का संचालन हुआ भी, जिससे लगा कि शहर की सूरत बदलेगी। लेकिन जिला प्रशासन की सुस्ती और बस संचालकों की मनमानी के कारण यह व्यवस्था पटरी से उतर गई।
कोरोना काल के बाद से गायब हुईं बसें
रही-सही कसर कोरोना संक्रमण काल ने पूरी कर दी। लॉकडाउन के दौरान बंद हुई इन बसों का पहिया ऐसा थमा कि वे दोबारा सड़कों पर लौट ही नहीं सकीं। वर्तमान स्थिति यह है कि:
नया बस स्टैंड: यहाँ पड़ताल करने पर सिर्फ आधा दर्जन (6) बसें धूल खाती और सड़ती हुई पाई गईं।
पाताल भैरवी मंदिर हाईवे: यहाँ हाईवे के किनारे दो बसें लावारिस हालत में खड़ी देखी जा सकती हैं।
लापता बसें: बाकी की 12 बसें कहाँ गायब हैं, इसका कोई अता-पता नहीं है।
कमेटी को ही नहीं खबर
इन कीमती बसों के रखरखाव और संचालन की जिम्मेदारी 'जिला अर्बन कमेटी' के पास थी। लेकिन हैरत की बात यह है कि इस जिम्मेदार कमेटी को खुद नहीं मालूम कि करोड़ों की सरकारी संपत्ति (बसें) इस वक्त कहाँ हैं। लापरवाही का आलम यह है कि इतने बड़े नुकसान के बाद भी अब तक न तो कोई कार्रवाई हुई है और न ही किसी अधिकारी की जवाबदेही तय की गई है।
ई-बसों की नई तैयारी, पर पुराने ढर्रे का क्या?
एक तरफ जहाँ पुरानी गाड़ियां कबाड़ में तब्दील हो चुकी हैं, वहीं अब प्रशासन द्वारा शहर में 'ई-बसों' (Electric Buses) को चलाने की नई तैयारी शुरू कर दी गई है। कागजी योजनाएं तो शानदार हैं, लेकिन स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जब तक पुरानी लापरवाही की जांच नहीं होती और प्रबंधन दुरुस्त नहीं किया जाता, तब तक नई ई-बसों का भविष्य भी पुराना जैसा ही होने की आशंका बनी रहेगी।
फिलहाल, राजनांदगांव की जनता महंगे पेट्रोल और ऑटो चालकों की मनमानी झेलने को मजबूर है, और पीएम मोदी की 'पब्लिक ट्रांसपोर्ट अपनाने' की अपील यहाँ के प्रशासनिक खोखलेपन के आगे बेअसर साबित हो रही है।
निष्कर्ष
सरकारी उदासीनता और संचालकों की मनमानी से राजनांदगांव में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था पूरी तरह ठप है। करोड़ों की बसें कबाड़ हो चुकी हैं और जिम्मेदार मौन हैं। जब तक पुराने प्रबंधन की जवाबदेही तय नहीं होती, तब तक नई ई-बसों जैसी योजनाएं भी कागजों तक ही सीमित रहने की आशंका है।
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