छात्रों को व्यवसायिक शिक्षा देने के नाम पर समग्र शिक्षा फंड के 22 करोड़ खर्च,बच्चों को सिखाई बैंकिंग
Raipur. छत्तीसगढ़ में समग्र शिक्षा के फंड में अलग ही खेल चल रहा है। इसका 60 फीसदी पैसा केंद्र सरकार से स्कूलों की बेहतरी के लिए आता है। लेकिन इस फंड का उपयोग देखकर तो ऐसा लगता है कि बेहतरी किसी और कि ही हो रही है। समग्र शिक्षा के तहत 3 साल में 22 करोड़ स्कूली बच्चों को व्यवसायिक शिक्षा देने के लिए बनाई गई व्यवसायिक प्रयोगशाला के नाम पर खर्च दिए गए। हैरानी की बात ये है कि व्यवसायिक शिक्षा छठवीं से आठवीं तक के छात्रों को दी गई। इनको फाइनेंशियल बैंकिंग और मीडिया एंटरटेनमेंट जैसी चीजें सिखाई गईं। सवाल ये है कि जिन बच्चों को ठीक से हिंदी पढ़नी नहीं आती उनको बैंकिंग क्या आएगी। तो फिर ये कहाँ गया फंड, यही बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है।
छत्तीसगढ़ में समग्र शिक्षा फंड पर सवाल:
छत्तीसगढ़ में समग्र शिक्षा अभियान के तहत खर्च किए गए करोड़ों रुपये अब सवालों के घेरे में हैं। स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए बनाए गए इस फंड का उपयोग किस तरह किया गया इसे लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। बीते तीन वर्षों में करीब 22 करोड़ रुपये व्यवसायिक शिक्षा के नाम पर खर्च किए गए। लेकिन जिस तरह के विषय छोटे बच्चों को पढ़ाए गए उसने पूरे मामले को संदेह के घेरे में ला दिया है।
1285 सरकारी स्कूलों में व्यवसायिक प्रशिक्षण दिया गया और इसके लिए 2071 प्रशिक्षकों की भर्ती। तीन साल में समग्र शिक्षा के लिए करोड़ों का फंड खर्च किया गया। समग्र शिक्षा योजना के तहत मिलने वाले कुल फंड का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार द्वारा दिया जाता है। इस राशि का उद्देश्य स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं सुधारना, शिक्षण स्तर बेहतर करना और छात्रों को व्यावहारिक ज्ञान देना होता है। लेकिन प्रदेश में इस फंड के उपयोग को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
व्यवसायिक प्रयोगशाला में इतनी राशि हुई खर्च :
साल 2022-23 - 7 करोड़ रुपए
साल 2023-24 - 6 करोड़ रुपए
साल 2024-25 - 9 करोड़ रुपए
छठवीं से आठवीं के बच्चों को व्यवसायिक प्रशिक्षण :
समग्र शिक्षा के तहत स्कूली बच्चों को व्यवसायिक प्रशिक्षण दिया जाता है। व्यवसायिक शिक्षा (Vocational education) के 15 ट्रेड बनाए गए हैं। जानकारी के मुताबिक कक्षा 6वीं से 8वीं तक के छात्रों को व्यवसायिक शिक्षा देने के नाम पर फाइनेंशियल बैंकिंग, मीडिया और एंटरटेनमेंट जैसे विषय पढ़ाए गए। एक तरफ सरकार के स्कूलों में कहीं शिक्षक नहीं हैं तो कहीं छात्र नहीं हैं तो दूसरी तरफ स्कूल एजुकेशन बेहतर करने की जगह किसी और नाम पर पैसा खर्च किया जा रहा है। यानी जिन बच्चों को ठीक से हिंदी पढ़नी नहीं आती, गणित के सवाल नहीं बनते और अंग्रेजी को काला अक्षर भैंस बराबर है उनको बैंकिंग,इलेक्ट्रानिक्स और हार्डवेयर सिखाया जा रहा है। या यूं कहें कि इन नाम पर पैसा खर्च किया जा रहा है लेकिन वो जा कहीं और रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस उम्र के बच्चों के लिए ये विषय न तो व्यावहारिक हैं और न ही उनकी बुनियादी शैक्षणिक जरूरतों के अनुरूप। खासकर तब जब कई छात्रों को अभी तक भाषा और गणित की मूलभूत समझ ही पूरी तरह विकसित नहीं हो पाई है।
इन ट्रेड में व्यवासायिक प्रशिक्षण :
. बैंकिंग फाइनेंशियल सर्विसेज
. मीडिया एंड इंटरटेनमेंट
. टूरिज्म एंड हॉस्पिटैलिटी
. इलेक्ट्रॉनिक्स एंड हार्डवेयर
. आटोमोटिव
. रिटेल
. एग्रीकल्चर
. टेलीकम्युनिकेशन
. ब्यूटी एंड वेलनेस
. आईटी-आईटीईएस
. हेल्थ केयर
. कंस्ट्रक्शन
. प्लंबिंग
. होम फर्निशिंग
. पॉवर
तीन साल में इतनी राशि इस पर हुई खर्च :
बच्चों को व्यवसायिक शिक्षा - 3 करोड़
यूथ एंड ईको क्लब - 27 करोड़
खिलौनों का शिक्षा शास्त्र - 2 करोड़ रुपए
किसे मिला फायदा :
शिक्षा से जुड़े जानकारों का कहना है कि प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर सबसे पहले बच्चों की बुनियादी पढ़ाई मजबूत करना जरूरी होता है। ऐसे में कठिन विषयों को पाठ्यक्रम में शामिल करना न केवल अनुपयोगी है बल्कि इससे संसाधनों की बर्बादी भी होती है। यही कारण है कि अब यह सवाल उठ रहा है कि आखिर इस फंड का वास्तविक लाभ किसे मिला। इस पूरे मामले में पारदर्शिता की कमी भी सामने आ रही है। यह भी जांच का विषय है कि खर्च की गई राशि का वास्तविक उपयोग किस प्रकार हुआ और उसका छात्रों के सीखने के स्तर पर क्या असर पड़ा।
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