कोरबा अपहरण-हत्याकांड : छत्तीसगढ़ सरकार को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस
NEWS IN SHORT
- सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ अपहरण-हत्या मामले में राज्य सरकार को नोटिस जारी किया
- कोरबा के छह वर्षीय मासूम का अपहरण और हत्या का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा
- ट्रायल कोर्ट का आजीवन कारावास का आदेश रद्द, आरोपी को हाई कोर्ट ने बरी किया
- सुप्रीम कोर्ट ने चार सप्ताह में शपथ पत्र सहित जवाब पेश करने का निर्देश दिया
- जांच प्रक्रिया में कमियों के चलते परिस्थितिजन्य साक्ष्य अधूरे पाए गए
NEWS IN DETAIL
Bilaspur। छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले का 13 साल पुराना अपहरण और हत्या का मामला अब सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में आ गया है। यह मामला उस समय सामने आया था जब एक छह वर्षीय मासूम का अपहरण कर लिया गया और फिरौती के बाद उसकी हत्या कर दी गई थी। पीड़ित पक्ष ने बिलासपुर हाई कोर्ट के डिवीजन बेंच के फैसले को चुनौती दी और सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की। कोर्ट ने राज्य सरकार और अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह के भीतर शपथ पत्र के साथ जवाब पेश करने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जस्टिस संजय करोल और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की डिवीजन बेंच में हुई। याचिकाकर्ता ने विलंब से SLP दायर करने के लिए माफी मांगी, जिसे कोर्ट ने मानवीय आधार पर स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने याचिका को सुनवाई के लिए मंजूरी देते हुए कहा कि राज्य सरकार को पर्याप्त समय दिया जाए ताकि वे सभी तथ्य प्रस्तुत कर सकें।
घटना का इतिहास और प्रारंभिक जांच
मामला 16 मई 2013 का है, जब मुकेश कुमार बैरागी ने अपने छह वर्षीय बेटे भूपेश अलीसा अप्पू के लापता होने की रिपोर्ट उरगा पुलिस स्टेशन में दर्ज कराई। अगले दिन, 17 मई 2013 को शाम सात बजे, अज्ञात व्यक्ति ने बच्चे के दादा को फोन कर दस लाख रुपये की फिरौती की मांग की।
जांच के दौरान पता चला कि कॉल में इस्तेमाल किया गया सिम कार्ड जाली दस्तावेजों के आधार पर जारी किया गया था। पुलिस ने आरोपी अरुण कुमार वैष्णव को पकड़कर गिरफ्तार किया और उस पर आईपीसी की धारा 363 और 364 के तहत एफआईआर दर्ज की।
जांच में सामने आया कि आरोपी ने आर्थिक तंगी और परिवार को अपमानित करने की मंशा से मासूम का अपहरण किया, फिरौती की मांग की और गला घोंटकर हत्या कर दी। शव को एक स्टोर रूम में छिपा दिया गया, और पंचनामा तैयार कर पोस्टमार्टम के बाद शव परिवार को सौंपा गया।
ट्रायल कोर्ट का फैसला
प्रारंभिक सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी पाया और उसे आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई। धारा 363 के तहत सात साल का कठोर कारावास और जुर्माना, धारा 364ए के तहत आजीवन कारावास, धारा 302 के तहत आजीवन कारावास और धारा 201 के तहत पांच साल का कठोर कारावास आरोपी को भुगतना था। इस फैसले के बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा, जहां आरोपी ने सजा को चुनौती दी।
हाई कोर्ट का आदेश और विवाद
बैरागी ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को अवैध और मनमाना बताते हुए हाई कोर्ट में चुनौती दी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि निचली अदालत ने अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए साक्ष्यों की विश्वसनीयता और प्रमाणिकता पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। अभियोजन पक्ष का दावा था कि शव आरोपी के इशारे पर बरामद हुआ, लेकिन इस दावे का समर्थन करने के लिए कोई ठोस इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए।
याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि कॉल डिटेल और सिम से संबंधित आवश्यक दस्तावेज़ एकत्र नहीं किए गए, जिससे परिस्थितिजन्य साक्ष्य अधूरे रह गए। निचली अदालत ने इन कमियों को नजरअंदाज किया और आरोपी को दोषी ठहराया, जबकि उच्च न्यायालय ने इस फैसले को रद्द कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट की डिवीजन बेंच का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट की डिवीजन बेंच जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस ए.के. प्रसाद की अध्यक्षता में मामले की सुनवाई हुई। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जांच प्रक्रिया में कई खामियां हैं, जैसे शव बरामद होने का समय दर्ज न करना और आवश्यक दस्तावेज तैयार न करना। इन कमियों ने अभियोजन पक्ष के मामले की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह पैदा किया।
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य पूरी तरह स्थापित नहीं किए गए और आरोपी को संदेह का लाभ मिलना चाहिए। इस आधार पर निचली अदालत द्वारा पारित दोषसिद्धि और आजीवन कारावास का आदेश रद्द कर दिया गया। आरोपी को आईपीसी की धारा 363, 364ए, 302 और 201 के तहत आरोपों से बरी किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह चार सप्ताह के भीतर शपथ पत्र और सभी आवश्यक जवाब प्रस्तुत करे। साथ ही अदालत ने राज्य के अधिवक्ताओं को याचिका की प्रति सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री में एक सप्ताह के भीतर दाखिल करने का आदेश दिया।
टाइमलाइन
16 मई 2013-6 वर्षीय भूपेश अलीसा अप्पू लापता, माता-पिता ने रिपोर्ट दर्ज कराई।
17 मई 2013 (शाम 7 बजे)-अज्ञात व्यक्ति ने दादा को फोन कर 10 लाख रुपए की फिरौती मांगी।
17 मई 2013-आरोपी अरुण कुमार वैष्णव गिरफ्तार; FIR IPC 363, 364 दर्ज।
जांच में खुलासा -आरोपी ने अपहरण किया, फिरौती मांगी और हत्या कर शव स्टोर रूम में छिपाया।
पोस्टमार्टम -शव परिवार को सौंपा गया।
ट्रायल कोर्ट -आरोपी दोषी, IPC 363, 364A, 302, 201 के तहत आजीवन कारावास और जुर्माना।
हाई कोर्ट -ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द, आरोपी बरी।
सुप्रीम कोर्ट -SLP स्वीकार; राज्य सरकार को 4 सप्ताह में शपथ पत्र सहित जवाब देने का नोटिस जारी।
निष्कर्ष
यह मामला भारतीय न्याय व्यवस्था में महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है, जिसमें यह दिखाया गया कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य की विश्वसनीयता और संदेह का लाभ किस प्रकार सुनिश्चित किया जाता है। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई आगे चार सप्ताह में होगी
जब राज्य सरकार और प्रतिवादी पक्ष अपने जवाब पेश करेंगे। इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि किसी भी मामले में न्याय सुनिश्चित करने के लिए जांच प्रक्रिया, साक्ष्य संग्रह और दस्तावेजों की पूर्णता अत्यंत आवश्यक है।
मामले में शामिल सभी पक्ष अब सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत आगे की सुनवाई का इंतजार कर रहे हैं। इस घटना ने न्यायपालिका और नागरिक सुरक्षा के बीच संतुलन, अभियोजन पक्ष की जिम्मेदारी और पीड़ित परिवारों के हक के महत्व को उजागर किया है।
FAQ
- मामला कब हुआ और बच्चा कितने साल का था?
मामला 16 मई 2013 को हुआ था, और बच्चे की उम्र 6 वर्ष थी। - आरोपी कौन था और क्या सजा हुई थी?
आरोपी अरुण कुमार वैष्णव था। ट्रायल कोर्ट ने उसे दोषी ठहराया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी और जुर्माना भी लगाया गया था। हाई कोर्ट ने बाद में आदेश रद्द कर आरोपी को बरी किया। - सुप्रीम कोर्ट ने क्या कदम उठाया है?
सुप्रीम कोर्ट ने SLP स्वीकार की और राज्य सरकार को चार सप्ताह में शपथ पत्र सहित जवाब देने का नोटिस जारी किया है।
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