फर्जी दस्तावेज से SECL में नौकरी पाने वाले की याचिका खारिज
NEWS IN SHORT
- फर्जी दस्तावेज से SECL में नौकरी पाने वाले की याचिका खारिज।
- हाई कोर्ट ने कहा- धोखाधड़ी से मिली नौकरी शुरुआत से शून्य।
- आरोपी ने खुद से कम उम्र के व्यक्ति को नाना बताया।
- अज्ञात शिकायत पर हुई विभागीय जांच में खुली जालसाजी की पोल।
- पुख्ता सबूत मिलने पर SECL प्रबंधन ने कर्मी को किया बर्खास्त।
NEWS IN DETAIL
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने फर्जी दस्तावेजों और गलत पहचान के सहारे नौकरी हथियाने वाले एक कर्मचारी को करारा झटका दिया है। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ (सिंगल बेंच) ने याचिका को सिरे से खारिज करते हुए एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की। हाई कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि धोखाधड़ी और जालसाजी के दम पर हासिल की गई नौकरी शुरुआत से ही शून्य (Void ab initio) मानी जाती है, इसलिए ऐसे मामलों में कोई राहत नहीं दी जा सकती।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) के कोरबा स्थित सेंट्रल वर्कशॉप का है। यहां 'साहेब' नाम का एक व्यक्ति आर्मेचर वाइंडर के पद पर कार्यरत था। दरअसल, वर्ष 1996 में कुम्दा गांव में जमीन अधिग्रहण किया गया था। साहेब ने भूमि विस्थापित कोटे (जमीन के बदले नौकरी) के तहत नौकरी हासिल की थी।
नौकरी पाने के लिए उसने दावा किया था कि जमीन के मूल मालिक पवन (गोंड जनजाति) उसके नाना हैं। साहेब ने इस संबंध में प्रबंधन के पास सहमति पत्र और शपथ पत्र भी जमा कराए थे। इस आधार पर उसे नियुक्त कर दिया गया और उसने लगभग एक दशक (10 साल) तक सेवा भी दे दी।
अज्ञात शिकायत से खुला राज
करीब दस साल की नौकरी के बाद SECL मुख्यालय को एक अज्ञात शिकायत मिली। इस शिकायत में आरोप लगाया गया था कि साहेब ने फर्जी दस्तावेजों के सहारे यह नौकरी पाई है। शिकायत को गंभीरता से लेते हुए जब विभागीय जांच शुरू की गई, तो बेहद चौंकाने वाले खुलासे हुए।
जाति और निवास में हेरफेर: जांच में पता चला कि साहेब असल में गोंड जनजाति का नहीं, बल्कि 'अहीर यादव' जाति से ताल्लुक रखता है। इसके अलावा, वह छत्तीसगढ़ का मूल निवासी भी नहीं है।
उम्र का अनोखा विरोधाभास: रिकॉर्ड की स्क्रूटनी के दौरान सबसे हैरान करने वाली बात यह सामने आई कि साहेब जिस व्यक्ति (पवन) को अपना नाना बता रहा था, वह सरकारी रिकॉर्ड में उम्र में खुद साहेब से छोटा निकला। भला कोई नाती अपने नाना से उम्र में बड़ा कैसे हो सकता है? इस तकनीकी विरोधाभास ने जालसाजी की पोल खोलकर रख दी।
मूल मालिक के बयान ने बढ़ाई मुश्किलें
विभागीय जांच के दौरान जमीन के असली मालिक पवन ने अपने बयान दर्ज कराए। पवन ने साफ तौर पर कहा कि वह साहेब नाम के किसी भी व्यक्ति को नहीं जानता और न ही उसने नौकरी के लिए कोई सहमति पत्र या अनापत्ति प्रमाण पत्र दिया है। पवन ने स्पष्ट किया कि साहेब उसका नाती नहीं है।
बर्खास्तगी की कार्रवाई: इन पुख्ता सबूतों और आरोपों के सिद्ध होने के बाद, SECL प्रबंधन ने कड़ा रुख अपनाते हुए 27 अक्टूबर 2018 को साहेब को सेवा से बर्खास्त (Dismiss) कर दिया था।
हाई कोर्ट से भी नहीं मिली राहत
प्रबंधन द्वारा की गई इस बर्खास्तगी की कार्रवाई के खिलाफ साहेब ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और याचिका दायर कर अपनी नौकरी वापस मांगी थी। लेकिन हाई कोर्ट ने मामले की गंभीरता, जालसाजी और तथ्यों के विरोधाभास को देखते हुए माना कि पूरी नियुक्ति ही झूठ की बुनियाद पर टिकी थी। अदालत ने याचिका को पूरी तरह खारिज करते हुए साफ कर दिया कि धोखाधड़ी से हासिल किए गए पदों को कानूनन जायज नहीं ठहराया जा सकता।
निष्कर्ष
इस मामले से स्पष्ट होता है कि जालसाजी और धोखाधड़ी की बुनियाद पर खड़ा साम्राज्य कभी भी ढह सकता है। भले ही आरोपी ने एक दशक तक नौकरी कर ली, लेकिन सच्चाई सामने आने पर उसे कानूनन शून्य ही माना गया। हाई कोर्ट का यह कड़ा रुख व्यवस्था में पारदर्शिता और ईमानदारी बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है।
यह खबरें भी पढ़ें...
SECL Recruitment 2026: 10वीं पास के लिए 1 हजार पदों पर भर्ती, जानें चयन प्रक्रिया