स्पेशल एजुकेटर भर्ती फंसी, गलती छिपाने अभ्यर्थियों का भविष्य दांव पर
समझें क्या है पूरा मामला
- स्पेशल एजुकेटर की भर्ती अटकी
- विज्ञापन में टीईटी का जिक्र नहीं
- फाइनल लिस्ट के 29 नाम बाहर
- SC-HC का आदेश, विभाग खामोश
स्कूल शिक्षा विभाग की एक बड़ी चूक अब सैकड़ों अभ्यर्थियों पर भारी पड़ रही है। विभाग ने 50 स्पेशल एजुकेटर पदों के लिए भर्ती निकाली। आवेदन मंगाए गए। चयन प्रक्रिया शुरू हुई। लेकिन विज्ञापन में टीईटी की अनिवार्यता का कहीं जिक्र नहीं था। उम्मीदवारों ने उसी आधार पर आवेदन किया। प्रक्रिया में शामिल हुए। बाद में जब मामला आगे बढ़ा तो विभाग को अपना भूला हुआ नियम याद आ गया।
अभ्यर्थियों ने याद दिलाया, तब जागा विभाग
भर्ती आगे बढ़ी तो दस्तावेज सत्यापन की प्रक्रिया शुरू हुई। हर पद के लिए दो उम्मीदवार बुलाए गए। इसी दौरान विभाग को सुप्रीम कोर्ट का आदेश याद आया। आदेश में शिक्षकों के लिए टीईटी अनिवार्य बताया गया है। इसके बाद अधिकारियों ने नया खेल शुरू किया। काउंसिलिंग पत्र में अचानक टीईटी की शर्त जोड़ दी गई। सवाल यही है कि जो शर्त विज्ञापन में नहीं थी, वह बीच प्रक्रिया में कैसे आ गई?
सुप्रीम कोर्ट का आदेश स्पष्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हालिया आदेश में शिक्षकों के लिए टीईटी को अनिवार्य माना है। इसका असर पूरे देश पर है। छत्तीसगढ़ में भी इसके अनुरूप आदेश जारी हुए हैं। बिना टीईटी प्रमोशन तक पर रोक लगाई गई है। यानी विभाग को पहले दिन से यह नियम पता था। फिर विज्ञापन में इसका उल्लेख क्यों नहीं किया गया? यही सबसे बड़ा सवाल है।
21 को नौकरी, 29 को बाहर
नया नियम लागू होने के बाद विभाग ने केवल 21 अभ्यर्थियों को नियुक्ति दे दी। फाइनल सूची के 50 नामों में सिर्फ 21 उम्मीदवार टीईटी योग्य निकले। बाकी 29 अभ्यर्थी टीईटी शर्त पूरी नहीं करते थे। इसके बाद विभाग ने उनके नियुक्ति आदेश रोक दिए। यहीं से भर्ती विवाद में फंस गई।
योग्य उम्मीदवार भी दर-दर भटक रहे
सबसे बड़ा नुकसान उन अभ्यर्थियों का हुआ जो टीईटी पास हैं। दस्तावेज सत्यापन में शामिल हुए। पात्र भी हैं। लेकिन उन्हें भी मौका नहीं मिल रहा। विभाग न अपात्रों को हटाने का फैसला कर पा रहा है, न पात्रों को नियुक्ति दे पा रहा है। नतीजा साफ है। 29 पद खाली पड़े हैं। भर्ती ठप है।
कोर्ट के डर से जकड़ी फाइल
सूत्र बताते हैं कि अधिकारी कानूनी जोखिम से डर रहे हैं। यदि टीईटी पास उम्मीदवारों को नियुक्ति दी गई तो चयन सूची वाले कोर्ट जाएंगे। यदि चयन सूची को बचाया गया तो पात्र उम्मीदवार अदालत पहुंचेंगे। इसी डर ने पूरी भर्ती को फाइलों में कैद कर दिया है। फैसला कोई नहीं ले रहा।
कोर्ट बोला, विभाग सोता रहा
कुछ टीईटी योग्य अभ्यर्थी अदालत पहुंच चुके हैं। कोर्ट ने विभाग को समाधान निकालने कहा है। लेकिन हालात जस के तस हैं। न नई सूची आई। न नियुक्ति आदेश निकले। अभ्यर्थी सचिव और संचालक के चक्कर काट रहे हैं। लेकिन उन्हें बार-बार उसी अधिकारी के पास भेजा जा रहा है जिस पर मामले को दबाने के आरोप लग रहे हैं।
विशेष बच्चों की पढ़ाई पर भी असर
यह सिर्फ भर्ती विवाद नहीं है। इसका असर विशेष बच्चों की शिक्षा पर भी पड़ रहा है। स्पेशल एजुकेटर उन्हीं बच्चों के लिए नियुक्त किए जाते हैं जिन्हें अतिरिक्त शैक्षणिक सहयोग की जरूरत होती है। राष्ट्रीय नीति ऐसे बच्चों पर विशेष ध्यान देने की बात करती है। लेकिन छत्तीसगढ़ में पद खाली पड़े हैं। बच्चे इंतजार कर रहे हैं। विभाग खामोश है।
गलती अफसरों की, कीमत अभ्यर्थी चुका रहे
पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल अब भी अनुत्तरित है। यदि टीईटी अनिवार्य था तो विज्ञापन में क्यों नहीं लिखा गया? यदि शर्त जरूरी थी तो आवेदन से पहले स्पष्ट क्यों नहीं की गई? विभाग की लापरवाही ने 29 पद रोक दिए। पात्र अभ्यर्थियों को भटका दिया। और विशेष बच्चों को उनके शिक्षक से दूर कर दिया। अब सवाल सिर्फ भर्ती का नहीं है। सवाल जवाबदेही का है। आखिर इस गड़बड़ी का जिम्मेदार कौन है?
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