पंडवानी गायिका तीजन बाई का निधन : पीएम मोदी और सीएम साय ने जताया शोक
Raipur। छत्तीसगढ़ की लोककला पंडवानी को देश-दुनिया तक पहुंचाने वाली पद्म विभूषण सम्मानित प्रख्यात लोकगायिका तीजन बाई अब हमारे बीच नहीं रहीं। उन्होंने आज रविवार तड़के करीब 3:15 बजे रायपुर एम्स में अंतिम सांस ली। वे लंबे समय से बीमार चल रही थीं और उनका इलाज जारी था।
तीजन बाई के निधन से छत्तीसगढ़ ही नहीं, पूरे देश के कला और संस्कृति जगत में शोक की लहर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय समेत कई नेताओं और सांस्कृतिक हस्तियों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी है।
पंडवानी को दुनिया के मंच तक पहुंचाया
तीजन बाई ने पंडवानी को केवल लोकगायन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे मंचीय अभिव्यक्ति की ताकत बना दिया। उनकी दमदार आवाज, तेज भाव-भंगिमा और तंबूरा लेकर खड़े होकर प्रस्तुति देने की शैली ने महाभारत की कथाओं को जीवंत कर दिया।
वे छत्तीसगढ़ की उस लोक परंपरा की सबसे प्रभावशाली आवाज बनीं, जिसे उन्होंने भारत से बाहर भी पहचान दिलाई। उनके कारण पंडवानी को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सम्मान मिला और छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति विश्व मानचित्र पर मजबूत पहचान बना सकी।
गनियारी गांव से वैश्विक पहचान तक का सफर
तीजन बाई का जन्म भिलाई के पास गनियारी गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम हुकुमचंद परधा और माता का नाम सुखवाती बाई था। बचपन से ही उनकी रुचि लोककथा और गायन में थी।
बताया जाता है कि उन्होंने बहुत कम उम्र में पंडवानी गायन शुरू कर दिया था। महज 13 साल की उम्र में उन्होंने 10 रुपए के पारिश्रमिक पर पहला मंचीय प्रदर्शन किया। यही शुरुआत आगे चलकर उन्हें देश की सबसे बड़ी लोक कलाकारों में शामिल करने वाली साबित हुई।
पुरुषों के वर्चस्व को दी चुनौती
तीजन बाई का सफर आसान नहीं था। उस दौर में पंडवानी गायन में पुरुषों का दबदबा माना जाता था। महिलाएं आमतौर पर बैठकर वेदमती शैली में प्रस्तुति देती थीं।
तीजन बाई ने इस परंपरा को तोड़ा। उन्होंने कापालिक शैली अपनाई और हाथ में तंबूरा लेकर खड़े होकर गायन किया। उनके इस फैसले ने उन्हें अलग पहचान दी। इसी साहस ने उन्हें पंडवानी की सबसे सशक्त कलाकारों में शामिल कर दिया।
इंदिरा गांधी के सामने प्रस्तुति से मिली पहचान
तीजन बाई की प्रतिभा से प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर बेहद प्रभावित हुए थे। उन्होंने उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने प्रस्तुति देने का अवसर दिलाया। इस प्रस्तुति के बाद तीजन बाई को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली।
इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। भारत के अलग-अलग राज्यों से लेकर विदेशों तक उन्होंने पंडवानी की प्रस्तुति दी और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को नई ऊंचाई दी।
पीएम मोदी और सीएम साय ने जताया शोक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीजन बाई के निधन को कला और संस्कृति जगत के लिए अपूरणीय क्षति बताया। उन्होंने कहा कि तीजन बाई ने अपनी भव्य प्रस्तुति से छत्तीसगढ़ की लोककला को विश्वभर में विशिष्ट पहचान दिलाई।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि तीजन बाई ने छत्तीसगढ़ का नाम देश और दुनिया में रोशन किया। प्रदेश उनके योगदान को हमेशा याद रखेगा। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु, अमित शाह, योगी आदित्यनाथ, रमन सिंह और भूपेश बघेल समेत कई नेताओं ने भी उनके निधन पर दुख जताया।
सम्मान से सजा जीवन
तीजन बाई को लोककला में योगदान के लिए कई बड़े सम्मान मिले। उन्हें पद्म श्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। ये सम्मान केवल एक कलाकार की उपलब्धि नहीं थे, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति की राष्ट्रीय स्वीकृति भी थे।
बीमारी से जूझते हुए ली अंतिम सांस
जीवन के अंतिम वर्षों में तीजन बाई स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही थीं। बताया जाता है कि बेटे के निधन के बाद वे गहरे सदमे में थीं। वर्ष 2024 में उन्हें लकवा भी आया था। हाल के दिनों में फेफड़ों में पानी भरने, निमोनिया और लो ब्लड प्रेशर की शिकायत के बाद उन्हें रायपुर एम्स में भर्ती कराया गया था।
इलाज के दौरान रविवार तड़के उन्होंने अंतिम सांस ली। उनकी आवाज भले ही शांत हो गई हो, लेकिन पंडवानी में उनका योगदान हमेशा जीवित रहेगा।
अमर रहेगी पंडवानी की यह आवाज
तीजन बाई ने संघर्षों के बीच अपनी कला को साधा और समाज की बंदिशों को तोड़कर इतिहास रचा। उन्होंने दिखाया कि लोककला केवल परंपरा नहीं, बल्कि पहचान और आत्मसम्मान की आवाज भी होती है। पंडवानी की यह अमर गायिका आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा बनी रहेंगी।
Important Facts
पद्म विभूषण सम्मानित पंडवानी गायिका तीजन बाई का निधन हुआ।
उन्होंने रायपुर एम्स में सुबह करीब 3:15 बजे अंतिम सांस ली।
तीजन बाई लंबे समय से बीमार चल रही थीं।
उन्हें फेफड़ों में पानी, निमोनिया और लो ब्लड प्रेशर की शिकायत थी।
तीजन बाई ने पंडवानी को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।
उन्होंने महाभारत की कथाओं को पंडवानी शैली में जीवंत किया।
उनका जन्म भिलाई के पास गनियारी गांव में हुआ था।
उनके पिता का नाम हुकुमचंद परधा और माता का नाम सुखवाती बाई था।
उन्होंने करीब 13 साल की उम्र में पहला मंचीय प्रदर्शन किया था।
तीजन बाई ने पुरुष प्रधान पंडवानी परंपरा को चुनौती देकर कापालिक शैली अपनाई।
उन्हें पद्म श्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था।
पीएम मोदी, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु और सीएम विष्णुदेव साय ने निधन पर शोक जताया।
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