तेंदूपत्ता दर बढ़ाने की मांग; बस्तर में तेंदूपत्ता संकट गहराया, सरकार पर निशाना
News in short
- तेंदूपत्ता दर 5 हजार 500 से 7 हजार करने की मांग
- बैंक भुगतान व्यवस्था जमीनी स्तर पर असफल साबित
- दूरस्थ इलाकों में बैंकिंग सुविधाएं बेहद सीमित उपलब्ध
- दो वर्षों में संग्रहण में लगातार गिरावट दर्ज
- नकद भुगतान बहाली से संग्राहकों का भरोसा बढ़ेगा
News in detail
छत्तीसगढ़ के बीजापुर ने तेंदूपत्ता संग्राहकों की समस्याओं को लेकर सरकार पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने मौजूदा दर 5500 रुपए प्रति मानक बोरा को बढ़ाकर 7 हजार करने की मांग की है। उनका कहना है कि बढ़ती महंगाई के बीच वर्तमान दर संग्राहकों के लिए पर्याप्त नहीं है, जिससे लोग इस काम से दूरी बना रहे हैं।
मंडावी ने चेतावनी दी कि यदि तेंदूपत्ता नीति में जल्द सुधार नहीं किया गया, तो आने वाले समय में संग्रहण पूरी तरह ठप हो सकता है।
नकद भुगतान की व्यवस्था पर ज़ोर
उन्होंने यह भी कहा कि एक ओर सरकार ‘नक्सल मुक्त बस्तर’ का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर आदिवासी संग्राहकों की बुनियादी समस्याओं को नजरअंदाज किया जा रहा है। भुगतान व्यवस्था को लेकर भी उन्होंने चिंता जताई। उनके अनुसार बैंक खातों के माध्यम से भुगतान की वर्तमान प्रणाली जमीनी स्तर पर प्रभावी नहीं है, क्योंकि बीजापुर के कई दूरस्थ क्षेत्रों में बैंकिंग सुविधाएं सीमित या अनुपलब्ध हैं। इससे संग्राहकों को भुगतान के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है और उनका रुझान घट रहा है।
उन्होंने मांग की कि पहले की तरह नकद भुगतान की व्यवस्था बहाल की जाए।विधायक ने यह भी बताया कि पिछले दो वर्षों में तेंदूपत्ता संग्रहण में लगातार गिरावट आई है। यदि स्थिति नहीं सुधरी, तो इससे संग्राहकों की आजीविका के साथ-साथ राज्य के राजस्व और वन आधारित अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ेगा।
वर्तमान तेंदूपत्ता नीति के प्रमुख बिंदु
- प्रति मानक बोरा 1500 रुपए बढ़ाकर दर 5500 रुपए तय
- महिला संग्राहकों को ‘चरणपादुका’ (जूते) वितरण
- ‘राजमोहिनी देवी तेंदूपत्ता संग्राहक सामाजिक सुरक्षा योजना’ के तहत 50 करोड़ का प्रावधान
- मेधावी बच्चों को 15 हजार–25 हजार तक छात्रवृत्ति
- देश के कुल उत्पादन में छत्तीसगढ़ की लगभग 20% हिस्सेदारी के माध्यम से खरीदी व्यवस्था संचालित
निष्कर्ष
छत्तीसगढ़ तेंदूपत्ता संग्राहक की समस्याएं अब गंभीर रूप ले रही हैं। विक्रम मंडावी की मांगें जमीनी हकीकत को दर्शाती हैं। यदि दर वृद्धि और भुगतान व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ, तो संग्रहण पर असर पड़ेगा। इससे आदिवासी आजीविका, राज्य राजस्व और वन अर्थव्यवस्था पर व्यापक नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
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