छत्तीसगढ़ की चिट्ठी: बाघ, बस्तर और सरकारी बहाने
छत्तीसगढ़ की इस चिट्ठी में इस बार बस्तर की बदलती तस्वीर भी है और व्यवस्था की पुरानी चुनौतियां भी। कहीं बस्तर रेजीमेंट के जरिए एक नई पहचान गढ़ने की कोशिश दिखाई दे रही है, तो कहीं एक बाघ 15 महीनों से सरकारी मंजूरियों के जंगल में भटक रहा है। कहीं करोड़ों रुपए के घोटालों की परतें खुल रही हैं, तो कहीं शिक्षक जान जोखिम में डालकर बच्चों तक शिक्षा पहुंचा रहे हैं। एआई के बढ़ते दायरे के बीच ठगी के नए तरीके भी सामने आ रहे हैं और सरकारी कामकाज पर पुराने सवाल भी उठ रहे हैं। कुल मिलाकर इस सप्ताह की छत्तीसगढ़ की चिट्ठी पढ़िए आपको प्रदेश की एक अलग ही तश्वीर नजर आएगी।
बस्तर की नई पहचान
कभी बस्तर का नाम आते ही देश के दिमाग में नक्सलवाद की तस्वीर उभरती थी। अब तस्वीर बदलने की कोशिश शुरू हो गई है। भारतीय सेना में बस्तर रेजीमेंट बनाने का प्रस्ताव रक्षा मंत्रालय की फाइलों में पहुंच चुका है। उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने मांग रखी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जवाब दिया कि प्रस्ताव की जांच चल रही है। नक्सलवाद को लेकर यहां के लोगों में आशंकाएं ही आशंकाएं थी, लेकिन अब उम्मीद इसलिए बड़ी है क्योंकि बस्तर के हजारों युवाओं ने नक्सल विरोधी अभियानों में अपनी बहादुरी साबित की है। अगर यह रेजीमेंट बनती है तो बस्तर की पहचान बंदूक उठाने वालों से नहीं, देश की रक्षा करने वालों से होगी। अब सबकी नजर इस पर है कि फाइल आखिर बैरक तक पहुंचती है या फिर हमेशा की तरह नोटशीटों में ही सलामी देती रहेगी।
15 महीनों से कैद में बाघ
अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस पर बाघों की बढ़ती संख्या के आंकड़े खूब गूंजे, लेकिन बीजापुर का एक बाघ अब भी जंगल लौटने का इंतजार कर रहा है। मार्च 2025 में घायल हुआ, इलाज हुआ, डॉक्टरों ने स्वस्थ बताया, पैर पर पूरा वजन डालने लायक भी घोषित कर दिया। इसके बाद होना यह था कि बाघ जंगल जाता, लेकिन हुआ यह कि फाइलें जंगल से ज्यादा घनी निकल गईं। विशेषज्ञ समिति, अनुमति, पत्राचार और राय लेने के बीच 15 महीने गुजर गए। मजेदार बात यह है कि दूसरी तरफ राज्य बाहर से नए बाघ लाने की तैयारी कर रहा है, जबकि अपना स्वस्थ बाघ सफारी में ही मेहमान बना हुआ है। संरक्षण का मतलब सिर्फ गिनती बढ़ाना नहीं, सही समय पर जंगल वापसी भी है। फिलहाल लगता है कि बाघ दौड़ सकता है, लेकिन सरकारी प्रक्रिया उसे दौड़ने ही नहीं दे रही। जंगल तैयार है, सिर्फ फाइल को रास्ता नहीं मिल रहा।
165 करोड़ का पता तलाशते जांचकर्ता
भिलाई नगर निगम के 165 करोड़ रुपए के एफडी घोटाले की जांच अब हाईकोर्ट की निगरानी में है। वैसे जांच की रफ्तार देखकर लगता है कि पैसा जितनी तेजी से गायब हुआ था, उसे खोजने की चाल उतनी ही आरामदायक रखी गई है। सीबीआई ने अदालत को बताया कि 196 खातों में से वह अब तक सिर्फ 32 तक ही पहुंच पाई है। यानी 164 खाते अब भी जांच एजेंसी से आंख-मिचौली खेल रहे हैं। हाईकोर्ट ने फिर रिपोर्ट मांगी है, यानी कहानी अभी लंबी चलेगी। जनता सोच रही है कि अगर 165 करोड़ का रास्ता खोजने में इतने साल लगेंगे, तो छोटे-मोटे घोटालों का क्या होगा। सरकारी धन सुरक्षित रखने के लिए बनाई गई एफडी आखिर फर्जी दस्तावेजों के जरिए कैसे खाली हो गई, इसका पूरा जवाब अब भी बाकी है। फिलहाल सबसे तेज सिर्फ तारीखें आगे बढ़ रही हैं।
जमीन किसकी, नीलामी किसकी
रायपुर के डुंडेरा की 3270 वर्गमीटर जमीन इन दिनों पहचान के संकट से गुजर रही है। गृह निर्माण मंडल कह रहा है कि जमीन उसकी है, कब्जा उसका है और मामला हाईकोर्ट में है। दूसरी तरफ उसी जमीन की ई-नीलामी की तैयारी भी सामने आ गई। अब सवाल यह नहीं कि खरीदार कौन है, बल्कि यह है कि बेच कौन रहा है। मंडल ने संभावित खरीदारों को चेतावनी भी दे दी कि बाद में कानूनी मुसीबत आई तो जिम्मेदारी आपकी होगी। यानी खरीदने से पहले खुद जांच कर लीजिए कि जमीन सरकारी है, निजी है या अदालत की मेहमान। हमारे यहां कभी-कभी जमीन से ज्यादा मजबूत उसके दावेदार निकल आते हैं। अब हाईकोर्ट तय करेगा कि असली मालिक कौन है। तब तक खरीददारों को भी हमारी सलाह यही है कि विवादित जमीन के सपनों पर फिलहाल एडवांस न दें।
15 दिन की जांच 6 महीने तक चली
कोरबा के डीएमएफ फंड की शिकायत पर सरकारी मशीनरी ने कार्रवाई का ऐसा नमूना पेश किया कि समयसीमा भी शर्मिंदा हो जाए। जांच समिति को 15 दिन में रिपोर्ट देने का आदेश मिला, लेकिन रिपोर्ट आने में करीब छह महीने लग गए। आखिरकार जब रिपोर्ट शासन तक पहुंच गई तो उस पर कार्रवाई के लिए कोई तत्परता नहीं दिखाई गई। यानी शिकायत घूमती रही, फाइल चलती रही, समिति बैठती रही और सच शायद किसी अलमारी में आराम करता रहा। डीएमएफ का पैसा खनन प्रभावित लोगों के विकास के लिए होता है, इसलिए सवाल उठना वाजिब है कि जांच में आखिर समिति ने क्या पाया है उसे सबके सामने रखा जाए ना की अलमारी में। सरकारी जांच में अक्सर समयसीमा सिर्फ कैलेंडर पर टिक लगाने के लिए ही होती है। कहीं ऐसा ना हो कि इस रिपोर्ट को देखने के लिए फिर लोगों को आरटीआई का सहारा लेना पड़े।
पहले पुल, फिर ऐप
कांकेर के कोयलीबेड़ा में शिक्षक रोज डोंगी से उफनती नदी पार कर स्कूल पहुंच रहे हैं, लेकिन उनसे उम्मीद है कि ऑनलाइन उपस्थिति समय पर लगे। यानी पहले जान बचाइए, फिर नेटवर्क खोजिए और उसके बाद ऐप में हाजिरी भी भरिए। बारिश के मौसम में कांकेर के वायरल वीडियो ने दिखा दिया कि शिक्षा सिर्फ किताबों से नहीं, साहस से भी चल रही है। बरसात में शिक्षक पहले बाइक, फिर नाव, फिर पैदल और फिर बाइक का सफर तय करते हैं। दूसरी तरफ साहब लोग पूछ लेते हैं लेट क्यों हुए?’ हालांकि वीडियो वायरल होने के बाद विभाग ने समाधान खोजने का भरोसा दिया है। उम्मीद है कि अगली बरसात तक शिक्षकों को नाव चलाने के बजाय सिर्फ पढ़ाने की जिम्मेदारी ही निभानी पड़े।
एआई का जंगलराज
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब सिर्फ फोटो बनाने तक सीमित नहीं रहा। आरोप है कि कुछ लोगों ने एआई की मदद से वन अधिकार पट्टे भी बनाने शुरू कर दिए। कोटा और लोरमी में 400 से 500 आदिवासियों से कथित तौर पर 30-30 हजार रुपए लेकर ऐसे पट्टे थमा दिए गए जो सरकारी रिकॉर्ड में हैं ही नहीं। डीएफओ शुरुआती जांच में दस्तावेजों को फर्जी बता चुके हैं, लेकिन कार्रवाई अब भी जंगल की पगडंडी जैसी धीमी है। सवाल यह भी है कि अगर दस्तावेज इतने असली दिख रहे थे तो सिस्टम की नजर से कैसे बच गए। वन अधिकार कानून भरोसा देने के लिए बना था, लेकिन अब उसी भरोसे की कीमत वसूले जाने के आरोप हैं। एआई ने तकनीक दी, लेकिन इंसानी लालच ने उसे ठगी का औजार बना दिया। अब देखना यह है कि जांच असली दोषियों तक पहुंचती है या फिर फर्जी पट्टों की फाइल की तरह गायब हो जाएगी।
बारिश ने रंग नहीं, राज धो दिया
कटघोरा में 14 लाख रुपए की अटल बिहारी वाजपेयी प्रतिमा पहली तेज बारिश में ही चर्चा का विषय बन गई। आरोप लगा कि कांस्य बताई गई प्रतिमा की परत उतरते ही अंदर सीमेंट दिखाई देने लगा। हंगामा बढ़ा तो जांच हुई और सबसे पहले उप अभियंता निलंबित हो गए। यानी मूर्ति का रंग उतरा और कार्रवाई का रंग चढ़ गया। अगर भुगतान, गुणवत्ता जांच और मंजूरी कई स्तरों पर हुई थी तो जिम्मेदारी सिर्फ एक अधिकारी की ही क्यों ? सरकारी निर्माण में अक्सर यही होता है कि पूरी इमारत कई लोगों की होती है, लेकिन मलबा किसी एक के हिस्से आता है। इस पुरे मामले की बीजेपी ने भी कलेक्टर से शिकायत की। दरअसल इस मामले में बीजेपी नेता, ठेकेदार और विभाग के आला अफसर भी शामिल है, लेकिन ठीकरा कमजोर पर फोड़ दिया गया है।
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