छत्तीसगढ़ की चिट्ठी : फर्जीवाड़े की फसल, जवाबदेही की तलाश

Rajesh Lahoti | May 30, 2026, 19:37 IST
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छत्तीसगढ़ में इस सप्ताह फाइलों से लेकर जंगलों तक कई ऐसे खुलासे हुए जिन्होंने सरकारी सिस्टम, राजनीति और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए। कहीं भारतमाला घोटाले में करोड़ों की परतें खुलीं, तो कहीं महतारी योजना से एक लाख हितग्राही बाहर हुए।

इस हफ्ते छत्तीसगढ़ में फाइलों से लेकर जंगलों तक कई परतें खुलीं। कहीं बिना छात्र-शिक्षक वाले कोर्स बंद करने की तैयारी हुई तो कहीं योजनाओं से मृत और अपात्र हितग्राहियों की छुट्टी। भारतमाला मुआवजा घोटाले, बिजली विभाग के कथित कमीशन कांड और सौ करोड़ की जमीन ठगी ने सरकारी सिस्टम को कटघरे में ला खड़ा किया है। उधर हसदेव अरण्य पर भाजपा और कांग्रेस एक-दूसरे को आईना दिखाते रहे, जबकि विधानसभा का सर्वसम्मत संकल्प बेबस नजर आया। कुल मिलाकर यह सप्ताह भ्रष्टाचार, जवाबदेही और राजनीतिक स्मृतिलोप के नाम रहा।



डिग्री की दुकान पर ताला

छत्तीसगढ़ में इस हफ्ते सबसे पहले बारी आई विश्वविद्यालयों की। राजभवन ने तय कर लिया कि अब ऐसे कोर्स नहीं चलेंगे जिनमें न छात्र हैं, न शिक्षक और न भविष्य। वर्षों से कई विश्वविद्यालयों में कुछ पाठ्यक्रम ऐसे चल रहे थे जिनका अस्तित्व सिर्फ प्रॉस्पेक्टस और फाइलों में दिखाई देता था। छात्र ढूंढने पर नहीं मिलते थे और शिक्षक खोजने पर भी नहीं। राज्यपाल ने कुलपतियों को दो महीने में गुणवत्ता सुधार का रोडमैप देने का आदेश देकर साफ कर दिया कि अब डिग्री बांटने के फैक्ट्री मॉडल पर ब्रेक लगने वाला है। नई शिक्षा नीति, रोजगार आधारित पाठ्यक्रम, रिसर्च और नैक ग्रेडिंग की बातें फिर से याद दिलाई गईं। एकीकृत पोर्टल बनाकर विश्वविद्यालयों को भी उसी डिजिटल निगरानी में लाने की तैयारी है जिसमें आजकल बाकी विभाग फंसे हुए हैं।



थाने में कबाड़ियों का सत्कार

जब विश्वविद्यालयों में छात्र नहीं मिले तो बिलासपुर के एक थाने में पुलिस को मेहमान जरूर मिल गए। फर्क सिर्फ इतना था कि ये मेहमान कबाड़ी थे। कोनी थाना परिसर में पुलिसकर्मियों और कबाड़ियों की चाय पार्टी का वीडियो वायरल हुआ तो जनता को पहली बार समझ आया कि कम्युनिटी पुलिसिंग की परिभाषा शायद बदल चुकी है। वीडियो में पुलिसकर्मी और कबाड़ी इतने सहज दिखे कि लोगों को लगा जैसे किसी सामाजिक सद्भाव सम्मेलन का आयोजन चल रहा हो। उधर, वरिष्ठ अधिकारियों को यह दोस्ती कुछ ज्यादा ही आत्मीय लगी। नतीजा यह हुआ कि दो जवान निलंबित हो गए और थाने को सफाई देनी पड़ी। मामला सिर्फ चाय का नहीं था। सवाल यह उठा कि जिन लोगों पर नजर रखनी है, उनसे इतनी नजदीकी क्यों? वायरल वीडियो ने पुराने आरोपों को भी हवा दे दी कि कहीं अवैध कारोबार और कार्रवाई के बीच कोई अदृश्य रिश्ता तो नहीं। उधर सरकार विश्वविद्यालयों में जवाबदेही ढूंढ रही थी, इधर पुलिस विभाग को अपने ही परिसर में जवाब देना पड़ गया।



भारतमाला में काली कमाई का राजमार्ग

भारतमाला परियोजना में सरकारी धन को मुआवजे के रूप में कैसे ठिकाने लगाया गया है वो अभी भी धीरे-धीरे सामने आ रहा है। इस सप्ताह सामने आई रिपोर्ट में नान घोटाले के आरोपी रोशन चंद्राकर और उनके परिवार पर करोड़ों के मुआवजे का खेल खेलने के आरोप लगे। कहानी फिल्मों जैसी है। परियोजना की घोषणा हुई, जमीन खरीदी गई, नामांतरण हुआ, टुकड़े हुए और फिर करोड़ों का मुआवजा बरसने लगा। कहीं कागजों में पेड़ उग गए, कहीं जमीन की कीमतें अचानक बढ़ गईं। सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ एक परिवार ने करीब पांच करोड़ रुपए का लाभ उठा लिया। सबसे दिलचस्प प्रकरण 149 पेड़ों का है। रजिस्ट्री के समय पेड़ नहीं थे, लेकिन मुआवजे के समय इतने पेड़ खड़े हो गए कि लगभग 19 लाख रुपये का भुगतान हो गया। अगर यही रफ्तार रही तो पर्यावरण विभाग को वृक्षारोपण अभियान बंद कर सीधे मुआवजा फाइलें लगानी चाहिए। अब ईडी जांच कर रही है और दस्तावेज खंगाले जा रहे हैं।



फोटो भेजो, नहीं तो मानेंगे नहीं

जब मुआवजे के कागजों में पेड़ उगने लगे तो मुख्य सचिव विकासशील ने तय किया कि अब सरकारी कामों की निगरानी तस्वीरों से होगी। 21 जिलों के कलेक्टरों की बैठक में साफ निर्देश दिए गए कि हर सप्ताह परियोजनाओं की जियोटैग फोटो अपलोड करनी होगी। सरकार को शायद यह समझ आ गया है कि फाइलों में सड़कें, पुल और भवन बहुत तेजी से बन जाते हैं, लेकिन जमीन पर उनकी रफ्तार कुछ और होती है। इसलिए अब सिर्फ रिपोर्ट नहीं, फोटो सबूत भी देना होगा। वर्किंग वुमेन हॉस्टल से लेकर मोबाइल टॉवर और सिंचाई परियोजनाओं तक सबकी निगरानी होगी। निर्माण एजेंसियों को भी चेतावनी मिल गई है कि अब सिर्फ कार्य प्रगति पर है लिख देने से काम नहीं चलेगा। यह आदेश दरअसल पूरे सिस्टम की मानसिकता पर टिप्पणी है। वर्षों तक प्रगति रिपोर्टों में विकास दौड़ता रहा और जनता उसे खोजती रही। अब सरकार कह रही है पहले फोटो दिखाओ, फिर विश्वास करेंगे। प्रशासनिक भाषा में इसे मॉनिटरिंग कहते हैं। आम भाषा में इसे पहले प्रमाण, फिर भुगतान कहा जा सकता है।



महतारी वंदन में सफाई अभियान

महतारी वंदन पर जब बार-बार सवाल उठने लगे तो उधर महिला एवं बाल विकास विभाग ने लाभार्थियों की गिनती शुरु कर दी। इसका असर ये हुआ कि बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया और देखते ही देखते महतारी वंदन योजना में शामिल सवा लाख नाम सूची से बाहर कर दिए गए। करीब एक लाख मृत हितग्राही और 27 हजार अपात्र लाभार्थी सामने आए। किसी को सरकारी नौकरी मिल गई थी, किसी ने दो-दो आवेदन कर दिए थे और कुछ लोग पात्रता की सीमा से बाहर थे। अब ई-केवाईसी के जरिए पूरी सूची की सफाई हो रही है। फर्जीवाड़े की हद तो सभी जानते ही हैं। सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों की बदौलत सनी लिओनी भी छत्तीसगढ़ में महतारी वंदन के एक हजार रुपए ले चुकी है। खैर, यह अच्छी बात है कि ये साफ सफाई अभियान शुरू हुआ। सरकार को वो राशि भी वसूलनी चाहिए जो मृत और अपात्र लोगों के नाम पर जारी हुई और अधिकारियों और कर्मचारियों की जेब में गई। सफाई जरूरी थी, क्योंकि योजना का पैसा उन्हीं तक पहुंचना चाहिए जिनके लिए वह बनाई गई है।



सौ करोड़ की जंगल कहानी

अगर आपको लगता है कि फर्जीवाड़े की सीमा यहीं खत्म हो गई, तो रायगढ़ का सौ करोड़ वाला मामला पढ़िए। आरोप है कि भूमाफियाओं ने महाराष्ट्र की बिजली कंपनी को 500 एकड़ जंगल की जमीन बेच दी और करीब 100 करोड़ का खेल हो गया। कहानी में जंगल है, आदिवासी हैं, पटवारी हैं, तहसीलदार हैं, वन अधिकारी हैं और कथित तौर पर पूरा गिरोह है। सबसे रोचक तथ्य यह है कि जिस जमीन का राजस्व रिकॉर्ड तक नहीं था, उसका भौतिक सत्यापन भी हो गया और रजिस्ट्री भी। ऐसा लगता है कि जमीन नहीं, कल्पना शक्ति बेची गई और खरीदार ने उसके लिए सौ करोड़ रुपए भी दे दिए। अब महाराष्ट्र सरकार जांच करा रही है। मामला सिर्फ जमीन का नहीं है। मामला यह भी है कि कैंपा फंड का पैसा कहां जा रहा है और जंगल बचाने के नाम पर कौन-कौन मालामाल हो रहा है। कुल मिलाकर जंगल से ज्यादा घना रहस्य फाइलों के भीतर नजर आ रहा है।



हसदेव और राजनीति का स्मृतिलोप

अब बात करते हैं छत्तीसगढ़ के चर्चित जंगल हसदेव अरण्य है की, जहां राजनीति और पर्यावरण की लड़ाई फिर गर्म हो गई है। मजेदार बात यह है कि 2022 में भाजपा और कांग्रेस दोनों ने विधानसभा में सर्वसम्मति से कोल ब्लॉक रद्द करने का प्रस्ताव पारित किया था। आज दोनों एक-दूसरे पर वही आरोप लगा रहे हैं जिनका समर्थन कभी साथ मिलकर किया था। जब कांग्रेस सत्ता में थी तो भाजपा पेड़ कटाई पर सवाल पूछ रही थी। अब भाजपा सत्ता में है तो कांग्रेस वही सवाल पूछ रही है। जंगल वहीं है, पेड़ वहीं हैं, हाथी वहीं हैं, बस बयान बदल गए हैं। हसदेव की कहानी बताती है कि विधानसभा के संकल्प राजनीतिक रूप से शक्तिशाली हो सकते हैं, लेकिन कानूनी रूप से हमेशा निर्णायक नहीं होते। नतीजा यह हुआ कि प्रस्ताव पास हुआ, पत्र भेजे गए, बहसें हुईं और पेड़ कटाई का विवाद भी जारी रहा। मतलब निष्कर्ष यही है कि इस सप्ताह प्रदेश में सबसे ज्यादा चर्चा जवाबदेही की रही। कहीं कोर्सों की जांच हुई, कहीं लाभार्थियों की, कहीं परियोजनाओं की, कहीं जमीनों की और कहीं नेताओं के पुराने बयानों की। फर्क सिर्फ इतना है कि कुछ जगह रिकॉर्ड सुधर रहे हैं और कुछ जगह रिकॉर्ड अभी भी पीछा नहीं छोड़ रहे।



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