छत्तीसगढ़ की चिट्ठी : कहीं फटकार, कहीं मेहरबानी

Rajesh Lahoti | Jun 06, 2026, 20:00 IST
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इस सप्ताह छत्तीसगढ़ में कई अजब-गजब घटनाक्रम देखने को मिले। मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में कुर्सियों की कमी और विधानसभा अध्यक्ष के गुस्से ने प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर दिया। वहीं किसानों के लिए खाद पर नए टोकन सिस्टम की शुरुआत हलचल पैदा कर रही हैं।

छत्तीसगढ़ में इस सप्ताह बड़ा अजब-गजब सीन देखने को मिला। बेमेतरा में मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में कुर्सियां गायब रहीं तो विधानसभा अध्यक्ष का गुस्सा मंच पर दिखाई दिया। किसानों के लिए खाद पर टोकन व्यवस्था का नया प्रयोग शुरू होने जा रहा है, जबकि पीएससी और शराब से जुड़े घोटालों ने फिर प्रशासनिक गलियारों की बेचैनी बढ़ा दी। दूसरी ओर साड़ी खरीदी और भ्रष्टाचार जांच के नए नियमों ने पारदर्शिता पर नए सवाल खड़े कर दिए। कुल मिलाकर छत्तीसगढ़ की चिट्ठी में मुद्दे जरूर कुछ अलग है, लेकिन व्यवस्था पर उठने वाले सवाल वही है।



भीड़ गायब या कुर्सियों का विरोध

बेमेतरा में मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना का मंच इस सप्ताह विवाह से ज्यादा व्यवस्था के रिश्तों की परीक्षा लेता नजर आया। दूल्हा-दुल्हन सात फेरे ले रहे थे, लेकिन प्रशासन और प्रोटोकॉल के बीच संबंध टूटते दिखे। मुख्यमंत्री, विधानसभा अध्यक्ष, दोनों उपमुख्यमंत्री और पूरा मंत्रिमंडल मौजूद था, मगर कुर्सियां शायद किसी और कार्यक्रम में शामिल होने चली गई थीं। विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह का गुस्सा भी आखिरकार मंच पर वरमाला की तरह सार्वजनिक हो गया। आमतौर पर कम बोलने वाले रमन सिंह ने कलेक्टर और एसपी को ऐसी फटकार लगाई कि कार्यक्रम की सबसे चर्चित घटना सामूहिक विवाह नहीं, सामूहिक नाराजगी बन गई। मुख्यमंत्री का स्वागत पीछे से हुआ, मंत्री कुर्सियां तलाशते रहे और प्रशासन व्यवस्था खोजता रहा। ढाई घंटे तक इंतजार चलता रहा, जैसे सरकारी फाइलों की आत्मा सभागार में उतर आई हो। दिलचस्प बात यह है कि जिस कार्यक्रम में विधायक दीपेश साहू खुद विवाह बंधन में बंध रहे थे, वहां व्यवस्थाएं भी शायद बारात के साथ कहीं रास्ता भटक गईं। सोशल मीडिया पर खाली कुर्सियां वायरल हुईं तो लोगों ने पूछा कि आखिर भीड़ नहीं आई या कुर्सियों ने भी विरोध दर्ज करा दिया।



चमत्कारी आंकड़ें और सच

हर साल 5 जून को हम पौधे लगाते हैं, फोटो खिंचवाते हैं और अगले दिन वही पौधा पानी के इंतजार में लोकतंत्र का चौथा खंभा बन जाता है। इस बार एनसीआरबी की रिपोर्ट ने पर्यावरण दिवस के उत्सव में थोड़ा यथार्थ घोल दिया। रिपोर्ट बताती है कि पर्यावरणीय अपराधों में राजस्थान देश में दूसरे नंबर पर पहुंच गया है। मध्यप्रदेश भी पीछे नहीं है। वहीं छत्तीसगढ़ में मामलों में 99 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई है। आंकड़ा इतना चमत्कारी है कि लोग पूछ रहे हैं कि अपराध कम हुए हैं या शिकायतें। हमारी सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हवा शुद्ध चाहिए, पानी साफ चाहिए, लेकिन पेड़ सामने नहीं चाहिए। सड़क चौड़ी चाहिए, लेकिन जंगल बचा रहना चाहिए। खनन भी चाहिए, नदी भी साफ चाहिए। पर्यावरण अपराधों में शोर प्रदूषण से लेकर जंगल कटाई, अवैध खनन और जल प्रदूषण तक सब शामिल हैं। लेकिन असली अपराध शायद यह है कि पर्यावरण को लेकर हमारी चिंता केवल सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित रह गई है। धरती अब कराहने लगी है। फर्क सिर्फ इतना है कि उसकी आवाज डीजे के शोर में सुनाई नहीं दे रही।



अब टोकन के खेल में उलझा किसान

धान बेचने के लिए टोकन, राशन के लिए टोकन और अब खाद के लिए भी टोकन। ऐसा लगता है कि छत्तीसगढ़ में खेती नहीं, टोकन आधारित अर्थव्यवस्था विकसित हो रही है। सरकार का कहना है कि यूरिया की कालाबाजारी रोकने और वास्तविक किसानों तक खाद पहुंचाने के लिए टोकन सिस्टम लागू किया जाएगा। सुनने में यह व्यवस्था उतनी ही सुंदर लगती है जितनी सरकारी विज्ञापनों में हरी-भरी फसलें दिखाई देती हैं, लेकिन किसान पूछ रहा है कि खेत में खाद डालूं या पहले मोबाइल पर टोकन की स्थिति देखूं? कृषि विभाग दावा कर रहा है कि गोदाम भरे हुए हैं। लाखों टन खाद उपलब्ध है। फिर भी नई व्यवस्था की जरूरत पड़ रही है। इससे किसानों को पुराने दिनों की याद आ गई है, जब हर समस्या का समाधान एक नई व्यवस्था हुआ करती थी। जमाखोरी रोकने के लिए कार्रवाई भी हो रही है। दुकानें सील हो रही हैं, नोटिस जारी हो रहे हैं। लेकिन किसान का अनुभव कहता है कि संकट आने पर सबसे पहले वही लाइन में खड़ा मिलता है, जबकि जमाखोर अक्सर व्यवस्था के किसी वीआईपी गेट से निकल जाते हैं। अब देखना यह है कि टोकन किसानों को खाद दिलाता है या खाद के लिए एक नया टोकन संकट पैदा करता है।



पीएससी का भूत अभी जिंदा है

छत्तीसगढ़ पीएससी घोटाला एक ऐसी कहानी बन चुका है, जिसका हर अध्याय खत्म होने से पहले ही एक और नया पात्र सामने आ जाता है। इस सप्ताह सीबीआई की टीम पूर्व सचिव जेके ध्रुव के घर पहुंची तो युवाओं को लगा कि शायद कहानी का अगला पन्ना खुलने वाला है। प्रदेश के लाखों युवाओं के लिए यह सिर्फ एक घोटाला नहीं, टूटा हुआ भरोसा है। जिन परीक्षाओं को मेहनत और प्रतिभा का मैदान होना चाहिए था, वे रिश्तेदारी रसूख के आरोपों से घिर गईं। टॉप सूची से लेकर डिप्टी कलेक्टर और डीएसपी जैसी नियुक्तियों तक सवाल उठे। सीबीआई की दबिश ने यह संकेत दिया है कि जांच अभी खत्म नहीं हुई है। कई आरोपी जेल में हैं, कुछ बाहर हैं। युवाओं को सबसे ज्यादा हैरानी इस बात पर है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता का नया विषय सामान्य अध्ययन नहीं, बल्कि संबंध अध्ययन बन गया था। हर नई कार्रवाई के साथ उम्मीद जागती है कि शायद अब सच्चाई सामने आएगी, लेकिन यह मामला इतना लंबा खिंच चुका है कि अभ्यर्थियों की उम्र बढ़ रही है और न्याय की प्रतीक्षा भी।



ओवरटाइम आखिर किसने किया

छत्तीसगढ़ में इन दिनों ओवरटाइम की नई परिभाषा लिखी जा रही है। एसीबी-ईओडब्ल्यू की चार्जशीट कहती है कि शराब निगम में करीब 183 करोड़ रुपए अतिरिक्त भुगतान हुए, लेकिन इतना ओवरटाइम आखिर किया किसने है। सरकारी कर्मचारी वर्षों से यह शिकायत करते रहे हैं कि उन्हें अतिरिक्त काम का पैसा नहीं मिलता, लेकिन यहां तो बोनस, ओवरटाइम, एक्स्ट्रा वर्क डे और सर्विस चार्ज के नाम पर करोड़ों की बारिश होती रही। मजेदार बात यह है कि एमडी बदलते रहे, जांच एजेंसियां आती रहीं, लेकिन भुगतान का सिलसिला चलता रहा। सबसे दिलचस्प तथ्य यह है कि निगम का चेयरमैन मुख्य सचिव होता है। ऐसे में यह समझ नहीं आ रहा हैं कि क्या 183 करोड़ रुपए किसी फाइल के कोने में छिपे हुए थे या सभी लोग उन्हें अदृश्य समझ रहे थे? जांच एजेंसियां दावा कर रही हैं कि नकदी, चेक और भुगतान की पूरी सीरीज थी। यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह सिर्फ वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि प्रशासनिक निगरानी की भी बड़ी विफलता मानी जाएगी।



जांच चाहिए तो पहले मंजूरी लाइए

सरकार ने फैसला किया है कि अब क्लास-1 अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच शुरू करने से पहले मुख्यमंत्री की मंजूरी लेनी होगी। सरकार इसे पारदर्शिता बता रही है, जबकि आलोचक इसे सुरक्षा कवच कह रहे हैं। नई व्यवस्था का तर्क है कि बेवजह जांच और उत्पीड़न रोका जाए। अब सवाल यह है कि अगर जांच शुरू करने से पहले ही मंजूरी की कई मंजिलें पार करनी पड़ेंगी तो भ्रष्टाचार विरोधी अभियान की रफ्तार कितनी बचेगी? सरकारी आदेशों में समय सीमा भी तय कर दी गई है। 45 दिन, 90 दिन और विभिन्न स्तरों की स्वीकृतियां। कागज पर सब कुछ व्यवस्थित दिखाई देता है। मगर जनता का अनुभव कहता है कि भ्रष्टाचार से लड़ाई में सबसे ज्यादा ताकत अक्सर फाइलों के पास होती है। सरकार का दावा है कि इससे जवाबदेही बढ़ेगी। विपक्ष पूछ रहा है कि जवाबदेही बढ़ेगी या सुरक्षा? प्रशासनिक गलियारों में दोनों पक्ष अपनी-अपनी व्याख्या कर रहे हैं। फिलहाल इतना तय है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई अब पहले से ज्यादा नियमबद्ध होगी। बस यह देखना बाकी है कि नियम कार्रवाई को तेज करते हैं या रास्ता लंबा दिखाते हैं।



खर्चा-पानी ने पहुंचाया जेल

सरकारी दफ्तरों में खर्चा-पानी शब्द इतना लोकप्रिय है कि कई लोग इसे सरकारी शब्दकोश का हिस्सा मानने लगे हैं। हालांकि सरगुजा के एक बाबू के लिए यही शब्द तीन साल की जेल का कारण बन गया। पेंशन और ग्रेच्युटी की फाइल अटकी हुई थी। शिकायतकर्ता दफ्तरों के चक्कर लगा रहा था। पहले तीन हजार रुपए लिए गए, फिर आठ हजार की मांग हुई और आखिर सौदा सात हजार में तय हुआ, लेकिन इस बार सामने आम आदमी नहीं एसीबी थी। बाबू ट्रैप हुआ, गिरफ्तारी हुई और छह साल बाद अदालत ने सजा भी सुना दी। मामला रकम का नहीं, मानसिकता का है। पेंशन पाने वाला व्यक्ति अपने हक के लिए भटकता रहे और बाबू खर्चा-पानी मांगता रहे, यही व्यवस्था की सबसे बड़ी बीमारी है। भ्रष्टाचार का लाभ तुरंत मिल सकता है, लेकिन उसका हिसाब कभी भी खुल सकता है। हालांकि जनता यह भी पूछ रही है कि सात हजार पर तीन साल जेल है, तो करोड़ों के मामलों में न्याय की घड़ी कब बजेगी?



भरोसे का प्रश्नपत्र

नीट परीक्षा अब मेडिकल प्रवेश परीक्षा कम और सुरक्षा अभियान ज्यादा लगने लगी है। इस बार प्रश्नपत्र एयरफोर्स के विमानों से आएंगे। प्रशासन मॉकड्रिल करेगा। कंट्रोल रूम बनेंगे। सुरक्षा के कई घेरे होंगे। एक समय था जब परीक्षा केंद्र तक पहुंचना ही छात्रों की सबसे बड़ी चिंता होती थी। अब छात्र सोचते हैं कि पेपर सुरक्षित रहेगा या नहीं। यही वजह है कि सरकार इस बार किसी भी जोखिम से बचना चाहती है। 21 जून को योग दिवस भी है। यानी प्रशासन के सामने दो चुनौतियां हैं। एक तरफ लोग प्राणायाम करेंगे, दूसरी तरफ अभ्यर्थी अपने भविष्य की सांसें संभालेंगे। मुख्य सचिव ने खुद तैयारियों की कमान संभाली है। एयरफोर्स से पेपर आएंगे, सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद रहेगी और छात्रों की काउंसलिंग भी होगी। सुनकर लगता है कि परीक्षा नहीं, कोई संवेदनशील सैन्य अभियान चल रहा है, लेकिन इन सब प्रयासों से छात्रों का भरोसा लौटता है तो यह तैयारी सार्थक मानी जाएगी, क्योंकि किसी भी परीक्षा का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्नपत्र विश्वास ही होता है।



खो गया सरकारी साड़ी का सच

छत्तीसगढ़ में सरकारी साड़ी सिर्फ पहनने की चीज नहीं रही, बल्कि एक पूरा रहस्य बन गई। 9.7 करोड़ रुपए की खरीदी, 6.3 मीटर की जगह 5 मीटर की साड़ियां और जांच रिपोर्ट का रहस्यमय मौन। विभाग ने माना कि सात जिलों में गड़बड़ी हुई। साड़ियां छोटी निकलीं, गुणवत्ता पर सवाल उठे, रंग छूटे और धागे निकले, लेकिन दो महीने बाद भी जिम्मेदार कौन है, इसका जवाब फाइलों में ही कहीं खो गया है। सबसे दिलचस्प बात यह रही कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को मीडिया से बात न करने की सलाह दी गई। करोड़ों का भुगतान हो चुका है। जांच हो चुकी है। गड़बड़ी की पुष्टि भी हो चुकी है। बस कार्रवाई का अब तक पता नहीं है। विभाग कह रहा है कि साड़ियां बदल दी जाएंगी, लेकिन जिसकी जिम्मेदारी थी उसका क्या होगा ? क्या उसे भी बदला जाएगा ?



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