छत्तीसगढ़ की चिट्ठी : एआई, वोट और डिजिटल दंगल... सप्ताहभर छाए रहे बड़े मुद्दे

Rajesh Lahoti | Jun 27, 2026, 18:20 IST
छत्तीसगढ़ की चिट्ठी 2026
इस सप्ताह छत्तीसगढ़ की राजनीति, प्रशासन, जंगल और तकनीक कई बड़े मुद्दों के केंद्र में रहे। एआई से वन संरक्षण, पुलिस पदोन्नति विवाद, आदिवासी राजनीति, अबूझमाड़ में वन कटाई, सरकारी लैबों के निजीकरण और समान नागरिक संहिता पर बनी समिति ने नई बहस छेड़ दी।

एआई का जंगल राज

उदंती-सीतानदी में कभी बाघ जंगल के राजा थे, अब उनकी तलाश में कैमरे, ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जंगल की खाक छान रहे हैं। हालत ऐसी हो गई कि बाघ कम और उनकी तलाश करने वाले गैजेट ज्यादा दिख रहे हैं। सरकार कह रही है कि एआई , सैटेलाइट और आदिवासी ट्रैकर्स मिलकर जंगल की नई सुरक्षा दीवार बना रहे हैं। यानी अब जंगल में बाघ से पहले कैमरा आपको देख लेगा। अच्छी बात यह है कि मालाबार हॉर्नबिल, फ्लाइंग स्क्विरल जैसी दुर्लभ प्रजातियां लौट रही हैं और रहस्यमयी बाघिन पहेली ने भी उम्मीद जगा दी है। यह बात अलग है कि जंगल के बाहर पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलती रही तो अंदर एआई कितनी देर तक पहरा देगा? आखिर बाघ को एल्गोरिद्म नहीं, असली जंगल चाहिए। तकनीक रास्ता दिखा सकती है, लेकिन जंगल बचाने का सॉफ्टवेयर आज भी इंसान के दिमाग में ही इंस्टॉल होना बाकी है।



वर्दी में वेटिंग लिस्ट

छत्तीसगढ़ पुलिस में इन दिनों सबसे लंबी दौड़ अपराधियों की नहीं, प्रमोशन की बताई जा रही है। जिन अधिकारियों ने मैदान में पसीना बहाया, वे सूची का इंतजार कर रहे हैं और जिनकी एंट्री सीधे हुई, उन पर किस्मत ज्यादा मेहरबान बताई जा रही है। नियम कहते हैं कि प्रमोशन वालों का अनुभव पहले गिना जाएगा, लेकिन फाइलें शायद कोई दूसरा कैलेंडर देखती हैं। नतीजा यह कि कई एसआई वर्षों से इंस्पेक्टर बनने की कतार में हैं, जबकि कोटे का गणित हर बार नया फार्मूला निकाल देता है। पुलिस मुख्यालय के लिए यह महज प्रशासनिक प्रक्रिया होगी, लेकिन वर्दी वालों के बीच यह मनोबल का मामला बन चुका है। अपराधी पकड़ने से ज्यादा कठिन अगर कुछ दिख रहा है, तो वह है अपना ही वैधानिक हक पकड़ पाना।



जंगल में वोट की तलाश

छत्तीसगढ़ में चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन राजनीतिक मौसम विभाग ने आदिवासी मानसून की भविष्यवाणी शुरू कर दी है। राहुल गांधी ने कांग्रेस को साफ संदेश दिया है न हसदेव पर आरी चले और न आदिवासी पर लाठी। मतलब अब जल, जंगल और जमीन ही सबसे बड़ा चुनावी घोषणापत्र बनने वाला है। कांग्रेस जानती है कि सत्ता की चाबी अब भी आदिवासी इलाकों की जेब में रहती है। 2018 में यही चाबी मिली थी, 2023 में खो गई। अब उसे फिर तलाशा जा रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार खोज अभियान में आंदोलन, पदयात्रा और हसदेव भी शामिल है। राजनीति में पेड़ कभी सिर्फ पेड़ नहीं होते, वे वोट भी उगाते हैं। इसलिए जंगल की हर हरियाली अब चुनावी रंग भी लिए नजर आएगी।



अफवाह की आरी

अबूझमाड़ में इन दिनों सबसे तेजी से अगर कुछ बढ़ रहा है तो वह है अफवाह का बाजार। चर्चा यह फैली कि जंगल काटो, खेती शुरू करो और पट्टा पा लो। बस फिर क्या था, पेड़ों की सांसें अटक गईं, जबकि कानून साफ कहता है कि आज जंगल काटकर कल मालिक नहीं बना जा सकता। सेटेलाइट से लेकर रिकॉर्ड तक सब गवाही देते हैं। विडंबना यह है कि जिस जंगल का पूरा सर्वे आज तक नहीं हुआ, वहां तेजी से पेड़ काटकर जमीं समतल की जा रही है। अधिकारी भी मान रहे हैं कि कार्रवाई आसान नहीं है। यानी जंगल कट रहा है और फाइलें सोच रही हैं। अबूझमाड़ सिर्फ जमीन नहीं, देश के फेफड़े कहलाते हैं। अफवाह अगर कानून से बड़ी हो जाए तो सबसे पहले जंगल हारता है और आखिर में इंसान।



लैब गई लीज पर

सरकारी अस्पतालों में अब इलाज सरकारी रहेगा, लेकिन जांच निजी कंपनी के हवाले रहेगी। सरकार का तर्क है कि व्यवस्था सुधरेगी, कर्मचारी पूछ रहे हैं जब मशीनें हमारी, भवन हमारे और स्टाफ भी हमारा, तो फिर 240 करोड़ का टिकट किस बात का। नई व्यवस्था में लैब टेक्नीशियन से लेकर मेडिकल छात्रों तक सबके मन में सवाल हैं। रोजगार का गणित भी बिगड़ने की आशंका है। स्वास्थ्य विभाग इसे सुधार बता रहा है। कर्मचारी इसे धीरे-धीरे निजीकरण की ओर बढ़ता कदम मान रहे हैं। कुल मिलाकर मरीज को अभी भी रिपोर्ट समय पर मिलने की उम्मीद है, लेकिन कर्मचारियों को अपने भविष्य की रिपोर्ट का इंतजार है। सरकारी व्यवस्था का इलाज निजी नुस्खे से होगा या नहीं, इसकी असली जांच अभी बाकी है।



डिजिटल दंगल

राजनीति अब चौपाल से ज्यादा मोबाइल स्क्रीन पर लड़ी जा रही है। बीजेपी ने इसे समय रहते समझ लिया है, इसलिए अब बूथ स्तर तक डिजिटल योद्धा तैयार किए जाएंगे। कार्यकर्ताओं को ऑनलाइन क्लास, परीक्षा और सर्टिफिकेट मिलेगा। यानी अब पोस्ट, रील और ट्वीट भी संगठनात्मक योग्यता माने जाएंगे। पहले नेता भाषण की तैयारी करते थे, अब कैमरे का एंगल भी देखेंगे। फर्जी खबर पहचानने से लेकर सरकार की ब्रांडिंग तक सबका बाकायदा पाठ पढ़ाया जाएगा। आने वाले चुनाव में हो सकता है कि किसी पोस्ट की पहुंच किसी पदयात्रा से ज्यादा असर दिखा दे। राजनीति का नया नारा शायद यही हो जो ट्रेंड करेगा, वही आगे बढ़ेगा।



कमेटी से कानून तक

छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता की यात्रा फिलहाल कानून से ज्यादा समिति के भरोसे शुरू हुई है। सरकार ने हाई लेवल कमेटी बना दी है और अब विवाह, तलाक, विरासत से लेकर दत्तक ग्रहण तक हर पहलू पर मंथन होगा। यानी फिलहाल कानून नहीं, सलाह का दौर चलेगा। राजनीति में यूसीसी हमेशा गर्म विषय रहा है, इसलिए समिति की रिपोर्ट आने से पहले ही बहस शुरू होना तय है। सरकार कह रही है कि सभी पक्षों से राय ली जाएगी। विपक्ष भी अपनी राय देने से पीछे नहीं रहेगा। कुल मिलाकर अभी सिर्फ कमेटी बनी है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसकी गूंज कानून बनने से पहले ही सुनाई देने लगी है। छत्तीसगढ़ में यूसीसी की असली परीक्षा अदालत में नहीं, जनमत में होगी।





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