छत्तीसगढ़ की चिट्ठी: कोयले से लेकर कानून तक हर तरफ घमासान, सवाल ज्यादा दिखे, जवाब कम
छत्तीसगढ़ में इस हफ्ते कई रंग देखने को मिले। रायगढ़ में पेलमा कोल माइंस की जनसुनवाई वायरल वीडियो के बाद टाल दी गई, तो कांकेर के माचपल्ली एनकाउंटर पर प्रशासनिक जांच ने नए सवाल खड़े कर दिए। रायपुर में वीआईपी मोबाइल चोरी पर पुलिस की रफ्तार देखकर आम आदमी अपने गुम फोन याद करने लगा। उधर एमपी में ब्लैकलिस्टेड सोम डिस्टिलरीज पर छत्तीसगढ़ में भी शिकंजा कसने की तैयारी शुरू हो गई। वहीं, शिक्षा विभाग ने ऑफिसों में जमे अटैच शिक्षकों को स्कूल लौटने का अल्टीमेटम थमा दिया। अभनपुर में गबन के आरोपी पूर्व सरपंचों पर जेल की तलवार लटकी, तो महासमुंद गैस घोटाले में छोटे अफसरों की गिरफ्तारी के बीच बड़े खिलाड़ियों पर सवाल गूंजते रहे। कुल मिलाकर, इस हफ्ते छत्तीसगढ़ में फाइलें भी गरम रहीं और राजनीति भी।
जनसुनवाई से पहले गिफ्ट सुनवाई
रायगढ़ के तमनार में पेलमा कोल माइंस की जनसुनवाई टल गई है। वजह वही पुरानी। जनसुनवाई से ठीक पहले सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हुए, जिनमें ग्रामीणों को कथित तौर पर छाते, पेटियां और क्रिकेट किट बांटते लोग दिखाई दिए। आरोप सीधे एसईसीएल और उससे जुड़ी कंपनियों पर लगे। यानी कोयला निकलने से पहले रिश्ते मजबूत करने की कोशिश। मामला गरमाया तो छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल ने 19 मई की जनसुनवाई फिलहाल स्थगित कर दी। प्रशासन ने वजह तैयारी की कमी बताई, लेकिन इलाके में चर्चा यह है कि तैयारी शायद जनता की नहीं, माहौल की अधूरी रह गई थी। वहीं, वीआईपी मूवमेंट के दौरान कोई भी अपनी किरकिरी नहीं कराना चाहता था। करीब 2077 हेक्टेयर में फैली इस परियोजना से पेलमा समेत कई गांव प्रभावित होंगे। ग्रामीणों का डर वही पुराना है विस्थापन, प्रदूषण, सूखते जलस्रोत और राख से ढका आसमान। तमनार पहले ही कोयला और उद्योगों के धुएं से परेशान है, ऐसे में लोग पूछ रहे हैं कि विकास आएगा या फिर एक और बलिदान क्षेत्र बनेगा? दिलचस्प बात यह है कि पेलमा परियोजना पहले भी जमीन अधिग्रहण और ग्रामसभा सहमति को लेकर विवादों में रही है। फिलहाल विरोध की आंच देखकर प्रशासन ने कुछ दिन का ब्रेक लगाकर अगले महीने की 8 तारीख जनसुनवाई के लिए तय कर दी है और फैले हुए रायते को नए सिरे से समेटने की तैयारी की जा रही है।
मुठभेड़ पर भरोसा या भरोसे की मुठभेड़
बस्तर में नक्सली मुठभेड़ों की खबरें नई नहीं हैं, लेकिन इस बार माचपल्ली एनकाउंटर के बाद प्रशासन ने जिस तरह 11 बिंदुओं वाली दंडाधिकारी जांच बैठाई है, उसने जंगल से ज्यादा हलचल दफ्तरों में पैदा कर दी है। कांकेर कलेक्टर ने पखांजूर एसडीएम को 15 दिन में रिपोर्ट देने को कहा है। यानी अब गोलियों के साथ कागज भी चलेंगे। 13 अप्रैल को छोटेबेठिया इलाके में पुलिस और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ हुई थी, जिसमें एक महिला माओवादी के मारे जाने की बात सामने आई। आमतौर पर ऐसी घटनाओं के बाद प्रेस नोट आता है। फोटो जारी होते हैं और मामला आगे बढ़ जाता है, लेकिन इस बार प्रशासन खुद पूछ रहा है- क्या नक्सली पहले से घात लगाए थे? पुलिस किस रणनीति से निकली थी? मौके पर क्या परिस्थितियां थीं? ग्रामीण क्या कहते हैं? यानी इस बार सिर्फ पुलिस का वर्जन ही अंतिम सत्य नहीं माना जाएगा। जांच में पोस्टमार्टम रिपोर्ट से लेकर एफआईआर, ग्रामीणों की गवाही और मौके से जब्त सामान तक सब खंगाला जाएगा। बस्तर में यह सवाल लंबे समय से उठता रहा है कि हर मुठभेड़ उतनी सीधी नहीं होती जितनी प्रेस रिलीज में दिखाई देती है। शायद यही वजह है कि प्रशासन इस बार तकनीकी खिड़कियां बंद रखना चाहता है। फिलहाल माचपल्ली में गोलियां शांत हैं, लेकिन कागजी बारूद सुलग चुका है।
वीआईपी का मोबाइल राष्ट्रीय संपत्ति
छत्तीसगढ़ में अगर आपका मोबाइल चोरी हो जाए, तो पहले अपनी हैसियत चेक कर लीजिए। कारण, यहां फोन की कीमत नहीं, मालिक की पहचान मायने रखती है। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और बीजेपी विधायक धरमलाल कौशिक का मोबाइल क्या छीना गया, पूरी पुलिस कमिश्नरेट ऐसे दौड़ी जैसे देश की साइबर सुरक्षा खतरे में पड़ गई हो। 30 पुलिसकर्मी, 2डीसीपी, 150 कैमरे और 8 घंटे के भीतर आरोपी गिरफ्तार। यानी मोबाइल नहीं, मानो मिसाइल लांच कोड गायब हो गया था। अब दूसरी तस्वीर देखिए। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में 1.53 लाख से ज्यादा मोबाइल चोरी या गुम हो चुके हैं। उनमें से हजारों लोग महीनों से सिर्फ शिकायत नंबर संभालकर बैठे हैं। उनका फोन आज तक लोकेशन ऑन नहीं कर पाया। यही फर्क है वीआईपी और कॉमनमैन के कानून में। आम आदमी का फोन चोरी हो तो जवाब मिलता है-देखते हैं। वीआईपी का फोन चोरी हो जाए तो शहर का सीसीटीवी नेटवर्क भी देशभक्ति में जाग जाता है।
एमपी में ब्लैकलिस्टेड… छत्तीसगढ़ में वेलकम बैक
जिस सोम डिस्टिलरीज पर मध्यप्रदेश में शिकंजा कस चुका है, वही नेटवर्क छत्तीसगढ़ में आराम से कारोबार करता रहा। अब आबकारी विभाग अचानक एक्टिव हुआ है और सिस्टर कंसर्न कंपनियों को नोटिस भेज रहा है। यानी सालों तक सब अनजान थे, लेकिन अब सबको रिश्तेदारी दिखाई दे रही है। मामला सिर्फ एक कंपनी का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है, जहां नाम बदलते हैं, डायरेक्टर वही रहते हैं और कारोबार चलता रहता है। आबकारी आयुक्त ने खुद माना कि कई कंपनियों में डायरेक्टर कॉमन हैं। तो फिर सवाल भी वाजिब है-जब यह जानकारी अब मिल सकती है, तो पहले क्यों नहीं मिली? मध्यप्रदेश में कंपनी पर फर्जी एक्साइज परमिट और अवैध शराब परिवहन जैसे गंभीर आरोप लगे। लाइसेंस भी गया। हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली, लेकिन छत्तीसगढ़ में उसी समूह की कंपनियां सप्लायर रजिस्ट्रेशन और लैंडिंग प्राइस प्रक्रिया में शामिल होती रहीं। यानी पड़ोसी राज्य में ब्लैकलिस्टेड यहां बिजनेस पार्टनर। अब महाधिवक्ता ने राय दे दी है, नोटिस भी जारी हो गए हैं। लेकिन असली सवाल विभाग पर ही है। वैसे देखा जाए तो शराब कारोबार में अक्सर बोतल बदलती है, ब्रांड बदलता है, लेकिन नेटवर्क वही रहता है। फिलहाल छत्तीसगढ़ में भी यही चर्चा है कि क्या यह सिर्फ नोटिस वाला तूफान है, या इस बार सचमुच आबकारी विभाग कोई साहसी निर्णय लेगा।
फिर ब्लैकबोर्ड पर वापसी
छत्तीसगढ़ में वर्षों से ऑफिसों में अटैच होकर बाबूगिरी कर रहे शिक्षकों को अब सरकार ने वापस स्कूल भेजने का फैसला कर लिया है। डीपीआई का आदेश आते ही शिक्षा विभाग में वैसी बेचैनी फैल गई है, जैसी परीक्षा के दिन बिना पढ़े छात्र में फैलती है। सरकार ने साफ कहा है कि 5 जून 2025 के बाद के सभी अटैचमेंट खत्म माने जाएंगे। यानी जो शिक्षक वर्षों से एसी ऑफिस में फाइलें पलट रहे थे, उन्हें अब फिर से भरी गर्मी में बच्चों की कॉपियां पलटनी पड़ सकती हैं।असल में प्रदेश के कई स्कूलों में स्थिति यह थी कि पद स्कूल में थे, लेकिन शिक्षक विभागीय कार्यालयों में विशेष सेवा दे रहे थे। गांव के बच्चे माटसाब का इंतजार करते रहे और माटसाब मीटिंग, फाइल और नोटशीट में व्यस्त रहे। अब डीपीआई ने सभी संभागीय अधिकारियों से तत्काल रिपोर्ट मांगी है। इससे पहले जब विधानसभा में सवाल उठा तो विभाग को याद आया था कि शिक्षक आखिर पढ़ाने के लिए नियुक्त हुए थे, नोटिंग करने के लिए नहीं। विधानसभा ख़त्म हुए टाइम हो गया, लेकिन असर अब हो रहा है। हालांकि आदेश के बाद कई शिक्षकों की परेशानी भी बढ़ गई है। वर्षों से शहरों में अटैच होकर काम कर रहे लोगों की पूरी जीवनशैली बदल सकती है। कुछ संगठन विरोध की तैयारी में हैं। फिलहाल सरकार ग्राउंड पोस्टिंग मूड में है। अब देखना यह है कि कितने ऑफिस मास्टर सचमुच ब्लैकबोर्ड तक लौटते हैं।
पैसा जमा करो नहीं तो जेल यात्रा
अभनपुर में प्रशासन ने 11 पूर्व सरपंचों को ऐसा अल्टीमेटम दिया है, जिसने पंचायत गलियारों में सन्नाटा फैला दिया है। पैसा जमा करो, नहीं तो 30 दिन की जेल जाओ। यानी अब सरकारी रकम को आसानी से हजम करना सरपंचों के लिए बेहद मुश्किल हो रहा है। इन पूर्व सरपंचों पर आरोप है कि कार्यकाल के दौरान शासकीय राशि का गबन हुआ और बार-बार नोटिस के बावजूद पैसा वापस जमा नहीं किया गया। प्रशासन ने पहले नोटिस भेजे, फिर संपत्ति जब्ती की कार्रवाई की, लेकिन जब रकम नहीं लौटी तो अब जेल वारंट जारी हो गया। दिलचस्प बात यह है कि कुछ मामलों में रकम 20 हजार से शुरू होकर 5 लाख 90 हजार तक पहुंचती है। यानी पंचायत विकास योजनाओं में विकास आखिर किसका हुआ, यह अब प्रशासन ही पूछ रहा है। ग्रामीण इलाकों में अक्सर यह धारणा बन गई थी कि सरपंच का कार्यकाल खत्म, तो हिसाब भी खत्म। लेकिन इस कार्रवाई ने संकेत दे दिया है कि फाइलें धीरे चलें, पर कभी-कभी मंजिल तक पहुंच ही जाती हैं।अब पंचायतों में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि क्या बाकी पुराने मामलों की फाइलें भी खुलेंगी?
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