अमित शाह के भोपाल दौरे में सौगातें ही नहीं, MP के सहकारिता मॉडल की भी होगी परीक्षा
2028 से पहले ग्रामीण नेटवर्क भी अहम सवाल
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का 3 अक्टूबर का भोपाल दौरा सिर्फ परियोजनाओं के लोकार्पण और हजारों गोपालकों के सम्मेलन तक सीमित नहीं रहने वाला। करीब डेढ़ साल पहले शाह ने मध्य प्रदेश के गांवों में सहकारी डेयरी नेटवर्क तेजी से बढ़ाने का लक्ष्य सामने रखा था। ऐसे में अब यह दौरा इस बात की भी कसौटी बनेगा कि बड़े विजन के मुकाबले सहकारिता जमीन पर कितनी तेजी से आगे बढ़ी है।
डेढ़ साल बाद फिर भोपाल, अब काम दिखाने की बारी
अमित शाह 2 अक्टूबर की रात भोपाल पहुंचेंगे। करीब 23 घंटे के प्रवास में उनका सबसे बड़ा सार्वजनिक कार्यक्रम भेल दशहरा मैदान में राज्य स्तरीय गोपालक सम्मेलन होगा। यहां 35 हजार से ज्यादा गोपालकों और दुग्ध सहकारी समितियों के सदस्यों के जुटने की तैयारी है।
इस पूरे आयोजन को केवल भीड़ और सौगातों के नजरिए से देखना अधूरा होगा। असल मुद्दा उस सहकारिता मॉडल का है, जिसकी दिशा खुद शाह अप्रैल 2025 में भोपाल से तय कर चुके हैं। तब उन्होंने कहा था कि मध्य प्रदेश के केवल 17 प्रतिशत गांवों में दूध संग्रह की व्यवस्था है।
उनका कहना था कि शुरुआती पांच वर्षों में कम से कम 50 प्रतिशत गांवों में प्राथमिक दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियां स्थापित करने का लक्ष्य रखा जाना चाहिए। यानी 3 अक्टूबर के कार्यक्रम के पीछे एक बड़ा सवाल स्वाभाविक रूप से मौजूद है प्रदेश का सहकारी डेयरी नेटवर्क गांवों तक कितनी तेजी से पहुंच रहा है?
बड़ी योजना, लेकिन जमीनी रफ्तार पर नजर
यहीं इस दौरे का दूसरा पहलू सामने आता है। केंद्र और राज्य सरकार सहकारिता को ग्रामीण अर्थव्यवस्था से सीधे जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। सांची डेयरी (Sanchi dairy ) इसमें महत्वपूर्ण कड़ी है। सरकारी आंकड़ों में मध्य प्रदेश के लिए नई डेयरी सहकारी समितियों के विस्तार का बड़ा लक्ष्य रखा गया है।
उपलब्ध आधिकारिक आंकड़े यह भी बताते हैं कि जुलाई 2026 तक इस दिशा में काम जारी था और लक्ष्य का एक बड़ा हिस्सा आगे पूरा किया जाना था। इसी कारण अब केवल नई समिति बनाने की संख्या पर्याप्त नहीं होगी। यह भी देखना होगा कि बनी हुई समितियों में कितनी वास्तव में सक्रिय हैं, कितना दूध इकट्ठा कर रही हैं और पशुपालकों को उससे कितना आर्थिक लाभ मिल रहा है। यही इस अभियान का माइनस और जवाबदेही वाला हिस्सा है।
16.80 करोड़ का प्लांट देगा नया रास्ता
शाह भोपाल सहकारी दुग्ध संघ परिसर में ₹16.80 करोड़ की लागत से तैयार फर्मेंटेड प्रोडक्ट डेयरी प्लांट का शुभारंभ करेंगे। इसकी दूध प्रसंस्करण क्षमता करीब 40 हजार लीटर प्रतिदिन बताई गई है। सांची का कारोबार केवल तरल दूध बेचने तक सीमित रहने के बजाय दही, छाछ, लस्सी, श्रीखंड और मावा जैसे मूल्यवर्धित उत्पादों की तरफ तेजी से बढ़ सकता है। इससे दुग्ध संघ को बाजार विस्तार का अवसर मिलेगा। लेकिन प्लांट तभी पूरी क्षमता का फायदा दे पाएगा जब उसके पीछे गांवों से नियमित दूध संग्रह का मजबूत नेटवर्क भी खड़ा हो। यही वजह है कि नई मशीनरी के साथ गांव स्तर की सहकारी व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
भेल मैदान में 35 हजार गोपालक
भेल मैदान में 35 हजार से अधिक गोपालकों और सहकारी सदस्यों का एक साथ जुटना अपने आप में बड़ा आयोजन है। इसमें भोपाल के अलावा सीहोर, बैतूल, राजगढ़, हरदा, गुना, अशोकनगर, शाजापुर, विदिशा, रायसेन और नर्मदापुरम जैसे जिलों से भागीदारी प्रस्तावित है।
पशुपालकों को बोनस मिलेगा, गौशालाओं को आर्थिक सहायता दी जाएगी और गोपालक दीदियों का सम्मान होगा। डॉ. भीमराव आंबेडकर कामधेनु योजना के स्वीकृति पत्र भी वितरित किए जाने हैं। यानी सरकार इस मंच के जरिए सहकारिता, पशुपालन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था तीनों को एक साथ सामने रख रही है।
2028 से पहले ग्रामीण नेटवर्क का राजनीतिक महत्व
मध्य प्रदेश में अगला नियमित विधानसभा चुनाव 2028 में होना है। इसलिए सरकार और संगठन के ग्रामीण संपर्क से जुड़े हर बड़े अभियान का राजनीतिक संदर्भ भी रहेगा। हालांकि शाह के इस कार्यक्रम को आधिकारिक तौर पर 2028 की चुनावी रणनीति नहीं कहा गया है। इसलिए इसे चुनावी अभियान घोषित करना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।
फिर भी गोपालकों, किसानों, महिलाओं और गांव स्तर की सहकारी संस्थाओं का बड़ा नेटवर्क सामाजिक और राजनीतिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण है। डेयरी सहकारिता की खासियत यह है कि सरकार का संपर्क किसी एक दिन की सभा तक सीमित नहीं रहता।
समिति सक्रिय हो तो किसान का उससे दूध बिक्री, भुगतान और रोजमर्रा की आर्थिक गतिविधि के जरिए लगातार रिश्ता रहता है। यही नेटवर्क आने वाले वर्षों में सरकार के ग्रामीण मॉडल की ताकत और उसकी कमजोरी दोनों को सामने ला सकता है।
शाह के सामने अब अगला सवाल
3 अक्टूबर को मंच पर उपलब्धियों और नई परियोजनाओं की तस्वीर दिखाई जाएगी। मध्य प्रदेश के सहकारिता मॉडल की असली परीक्षा मंच के बाहर होगी। कितने गांव जुड़े? कितनी समितियां सक्रिय हुईं? दूध संग्रह कितना बढ़ा? पशुपालकों की कमाई पर क्या असर पड़ा?
अप्रैल 2025 में शाह ने जिस बड़े विस्तार की दिशा तय की थी, अब उसी रोडमैप पर हुई प्रगति महत्वपूर्ण हो गई है। इसलिए शाह का भोपाल दौरा केवल सौगातों का कार्यक्रम नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश में सहकारिता के बड़े दावे और उसके जमीनी असर को देखने का भी मौका है।