अशोकनगर में ग्रामीण ने मांगा हैंडपंप तो मिला कमर दर्द का बेल्ट, जानें पूरा मामला

Sandeep Kumar | May 03, 2026, 20:35 IST
ashoknagar villager
अशोकनगर में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के जनसुनवाई पत्र में एक अजीब गलती सामने आई। पानी की समस्या पर आवेदन देने वाले ग्रामीण को बेल्ट का प्रमाणपत्र मिला, जिससे हड़कंप मच गया।

मध्यप्रदेश के अशोकनगर जिले में प्रशासनिक लापरवाही का एक अनोखा उदाहरण सामने आया है। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के कार्यालय से एक बधाई पत्र भेजा गया, जिसमें ग्रामीण गेंदालाल अहिरवार की पानी की समस्या के समाधान की बजाय उन्हें कमर दर्द का बेल्ट प्रदान करने का उल्लेख था। यह पूरी घटना प्रशासनिक गलतियों और गलत रिपोर्टिंग को लेकर सवाल खड़े कर रही है।



क्या है पूरा मामला ?

4 अप्रैल को कचनार में आयोजित जनसुनवाई शिविर में गेंदालाल अहिरवार ने सिंधिया से पानी की समस्या को लेकर आवेदन दिया था। उन्होंने बस्ती में नवीन हैंडपंप लगवाने की मांग की थी। गेंदालाल को इस आवेदन के बदले 58 नंबर टोकन दिया गया। आवेदन में उन्होंने सिंधिया से जल की समस्या के समाधान की मांग की थी, लेकिन जब केंद्रीय मंत्री का पत्र आया तो गेंदालाल को हैरान कर देने वाला जवाब मिला।



ashoknagarrequested handpump


हैंडपंप का हल नहीं मिला

पत्र में कमर दर्द का बेल्ट देने का उल्लेख था, जबकि गेंदालाल ने तो हैंडपंप की मांग की थी। यह गलती प्रशासन द्वारा सिस्टम की लापरवाही और गलत रिपोर्टिंग के कारण हुई। केंद्रीय मंत्री के पत्र में प्रमाणीकरण के साथ लम्बर बेल्ट की बात कही गई थी, जिससे ग्रामीण को समझ में ही नहीं आया। यह घटना पूरे प्रशासनिक तंत्र पर सवाल खड़े करती है कि जब कोई शिकायत दर्ज की जाती है, तो उसका निराकरण कैसे किया जाता है।



गलत रिपोर्टिंग का मामला

ग्रामीण ने मंत्री से पानी की समस्या के समाधान के लिए आवेदन किया था। लेकिन विभाग ने उनका समाधान नहीं किया। अब इस गलती के लिए प्रशासन को जवाबदेह ठहराया जा रहा है। प्रशासन की तरफ से यह बताया गया कि गेंदालाल अहिरवार ने कमर बेल्ट की मांग की थी, जबकि उनके आवेदन में ऐसा कुछ नहीं था। प्रशासन का कहना था कि यह गलती नाम की समानता के कारण हुई, क्योंकि दो अलग-अलग व्यक्तियों के नाम में समानता थी।



फिर क्यों नहीं दिया गया पानी का हल?

यह घटना प्रशासन की लापरवाही और सिस्टम में बैठे अधिकारियों की कार्यशैली को उजागर करती है। केंद्रीय मंत्री सिंधिया की तरफ से किया गया हस्तक्षेप और जनसुनवाई शिविरों का आयोजन प्रशासन की जवाबदेही को दिखाता है, लेकिन यह उदाहरण यह बताता है कि जब सही तरीके से निगरानी नहीं की जाती है, तो समाधान की प्रक्रिया रुक जाती है।



प्रशासन की भूमिका पर सवाल

अब इस मामले पर सवाल उठने लगे हैं कि कैसे और क्यों यह घातक गलती हुई। क्या यह सिर्फ एक प्रमाणीकरण की गलती थी, या प्रशासनिक प्रणाली में कोई बड़ा गड़बड़झाला है। ग्रामीण को जल संकट के लिए आवेदन देने के बावजूद उनका समाधान नहीं किया गया, बल्कि उन्हें एक कमर बेल्ट का प्रमाण पत्र भेज दिया गया।



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