बैंक गारंटी में उलझी योजनाएं: इंतजार में टूट रहे युवा, किसान और मजदूरों के सपने
ऐसे समझें क्या है पूरा मामला...
- सबसे ज्यादा रोजगार, कृषि और श्रम विभाग की योजनाएं अटकीं
- विभागों से स्वीकृति फिर भी हितग्राही को महीनों नहीं मिलता लोन
- गारंटर न मिलने और दस्तावेजों के लिए लगवाए जा रहे चक्कर
- अनुदान की आस में विभाग और बैंक के बीच भटक रहे हितग्राही
- बैंकों से समन्वय में विभाग और प्रशासन पर तय नहीं जवाबदेही
सरकार की स्वरोजगार और आत्मनिर्भर योजनाएं ऋण न मिलने से उलझी हुई हैं। सरकार युवा, किसान और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और स्वरोजगार से जोड़ने के दावे कर रही है। जबकि बैंक गारंटी के बिना लोन ही नहीं दे रहीं।
जिला प्रशासन भी बैंक और हितग्राहियों के बीच सामंजस्य नहीं बैठा पा रहा है। नतीजा सरकार की कल्याणकारी योजनाएं लक्ष्य से कोसों दूर हैं।
बैंक गारंटी पड़ रही भारी
बैंक गारंटी और लोन की देरी ने आत्मनिर्भर बनाने वाली योजनाओं का दम घोंट दिया है। समीक्षा बैठकें हुईं, आदेश निकले, फाइलें दौड़ीं लेकिन हितग्राहियों को बैंक से रुपया नहीं मिला।
रोजगार, कृषि और श्रम विभाग की सबसे ज्यादा योजनाएं बैंकों में अटकी हैं। स्वीकृति पत्र मिल जाता है। लेकिन बैंक आगे की प्रक्रिया नहीं बढ़ाते। गारंटर, सिविल स्कोर, प्रोजेक्ट रिपोर्ट के नाम पर महीनों तक केस अटके रहते हैं। अंत में हितग्राही थककर बैठ जाते हैं।
हर साल टूट रहे हजारों सपने...
1. युवाओं से भी हुआ छलावा
इंदौर में मुख्यमंत्री युवा स्वरोजगार योजना के तहत 2024 में डीआईसी ने विनिर्माण और सेवा क्षेत्र के लिए करीब 300 केस स्वीकृत किए थे। छह महीने तक 40 फीसदी केस गारंटी और प्रोजेक्ट वेरिफिकेशन में अटके रहे।
जिनकी फाइल आगे बढ़ी उनमें बैंक ने कोलैटरल यानी गारंटर मांग लिया। उधर उम्मीद लगाए बैठ जिन युवाओं ने पहले ही शेड किराए पर ले लिया था अब वे दोहरा संकट झेल रहे हैं।
2. उलझकर रह गए किसान
भोपाल में 2023-24 में मध्य प्रदेश कृषि अधोसंरचना कोष से गोदाम, कोल्ड स्टोर के लिए किसानों को 3% ब्याज पर लोन मंजूर हुआ। बैंक ने केस पहुंचते ही भूमि बंधक और डीपीआर के नाम पर 4 से 8 महीने लगा दिए।
महीनों तक केस अटके रहने से सीजन बीत गया और किसानों को रबी सीजन की फसल महीनों बाद कम कीमत पर बेंचकर घाटा उठाना पड़ा। उधर उनके प्रोजेक्ट की लागत भी बढ़ गई।
3. लाभ से दूर हुए मजदूर
जबलपुर जिले में मुख्यमंत्री श्रमिक सेवा योजना के तहत 2024 में ई-रिक्शा, सिलाई मशीन, टूल किट के लिए ऋण प्रकरण स्वीकृति किए गए थे। ये उपकरण श्रमिकों को बैंक के जरिए अनुदान पर दिए जाने थे।
जब केस बैंकों में पहुंचे तो बैंक प्रबंधन ने मजदूरों से गारंटर और सिविल रिकॉर्ड मांग लिया। बस यही से ज्यादातर प्रकरण उलझकर रह गए और योजना के 70 फीसदी हितग्राही लाभ नहीं ले पाए।
चक्कर काट रहे हितग्राही
सरकारी योजना के ऋण प्रकरणों में ज्यादातर हितग्राहियों के अनुभव कड़वे हैं। बैंक कभी दस्तावेज अधूरे बताकर टालते हैं तो कभी दूसरी कमियां गिना देते हैं। जब कुछ कमी नहीं मिलती हो गारंटर का पेंच उलझा दिया जाता है।
इधर विभाग कहते हैं उन्होंने अपना काम कर दिया, बैंक सहयोग नहीं कर रहे। वहीं सरकार की स्वीकृति के बावजूद हितग्राही बैंक और विभाग के बीच उलझ जाता है। दस्तावेजी कार्रवाई में उसकी जेब खाली हो जाती है।
स्वीकृति में तेजी, रुपया देने में सुस्ती
सरकारी विभाग और बैंकों के बीच सामंजस्य की बेहद कमी है। बैंकों की बेरुखी की स्थिति में अधिकारी हितग्राहियों से पल्ला झाड़ लेते हैं। ऐसे में हितग्राही खुद को ठगा महसूस करते हैं और इसी वजह से योजना के लाभ से वंचित रह जाते हैं। इधर सरकार योजना के आवेदनों के आंकड़े गिनाकर वाहवाही बटोर लेती है। बस हितग्राही ही खाली हाथ रह जाता है।
FAQ
- लोन क्यों नहीं मिल रहा है?
बैंक गारंटर, CIBIL स्कोर और प्रोजेक्ट रिपोर्ट मांग रहे हैं। कई हितग्राहियों के पास ये दस्तावेज नहीं हैं। इसी वजह से फाइलें महीनों से लंबित हैं। - सबसे ज्यादा कौन सी योजनाएं प्रभावित हैं?
मुख्यमंत्री युवा स्वरोजगार योजना, कृषि अधोसंरचना कोष और मुख्यमंत्री श्रमिक सेवा योजना। इनमें स्वीकृति के बाद भी पैसा खाते में नहीं आ रहा। - इसका समाधान क्या है?
विशेषज्ञों का मानना है कि 15 दिन में लोन निपटारा, गारंटी मुक्त लोन और एकल खिड़की सिस्टम बनाना होगा। तभी योजना का लाभ जमीनी स्तर तक पहुंचेगा।
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