बकरीद के दिन उर्दू के मशहूर शायर बशीर बद्र का निधन, लिखा था- यूं कोई बेवफा नहीं होता...
समझें क्या है पूरा मामला...
- उर्दू के मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र का गुरुवार 28 मई को भोपाल में निधन हो गया।
- 91 साल की उम्र में उन्होंने दोपहर करीब 12 बजे अंतिम सांस ली।
- वे लंबे समय से डिमेंशिया (Dementia) नामक बीमारी से पीड़ित थे।
- याददाश्त जाने के बाद वे लोगों को पहचान भी नहीं पा रहे थे।
उजाले यादों के, अलविदा बशीर बद्र
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, ना जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए। ये नज्म आज सच हो गई। उर्दू शायरी को नई जुबान देने वाले डॉ. बशीर बद्र गुरुवार दोपहर (बकरीद के दिन) भोपाल में इस दुनिया से अलविदा कह गए। 91 साल की उम्र में उन्होंने आखिरी सांस ली।
वे लम्बे समय से डिमेंशिया की बीमारी से जूझ रहे थे। याददाश्त पूरी तरह जा चुकी थी। अपने करीबी लोगों को भी पहचान नहीं पा रहे थे। पिछले कुछ महीनों में उनकी सेहत लगातार खराब चल रही थी।
जिंदगी को सरल शब्दों में बताया
बशीर बद्र की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उन्होंने उर्दू शायरी को आम आदमी के करीब लाया। मुश्किल लफ्जों की बजाय रोजमर्रा की सहज भाषा में उन्होंने गजलें कहीं। मोहब्बत, दर्द, गुरबत और जिंदगी के हर रंग को उन्होंने शेरों में पिरोया।
रिवायती यानी पारंपरिक शायरी के ढर्रे से वे कभी नहीं बंधे। उन्होंने उर्दू गजल को नया लहजा देने का काम किया। उनका यह शेर आज भी समाज का आईना है, लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।
1974 से 1990 का सुनहरा दौर
बशीर बद्र का जन्म 15 फरवरी 1935 को यूपी के अयोध्या में हुआ था। बशीर बद्र ने 1969 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) यानी एएमयू (Aligarh Muslim University) से स्नातकोत्तर की उपाधि ली थी। इसके बाद 12 अगस्त 1974 को वे मेरठ कॉलेज के उर्दू विभाग में बतौर लेक्चरर शामिल हुए और 1990 तक वहां पढ़ाते रहे।
यह सोलह साल का दौर उनकी शायरी का सुनहरा वक्त था। इसी दौर में उनकी गजलें देश-विदेश में पहुंचीं। मुशायरों में उनका नाम सुनते ही महफिलें खिल उठती थीं। उनकी सादगी और गहराई ने उन्हें आम लोगों का शायर बना दिया। उन्हें आधुनिक गजल का उस्ताद माना जाता है। वहीं, साहित्य के क्षेत्र में योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।
वे शेर जो जुबां पर हैं
बशीर बद्र के कई शेर आज भी लोगों की रोजमर्रा की बातचीत में जिंदा हैं। कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं कोई बेवफा नहीं होता जैसी पंक्तियां पीढ़ी दर पीढ़ी दोहराई जाती रही हैं। दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों जैसे शेर इंसानी रिश्तों की गहराई बयान करते हैं।
जिंदगी की बेरुखी को उन्होंने इस तरह कहा, घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे, बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला। यह शेर आज के दौर में भी उतना ही सच लगता है।
शायरी में जिंदगी की छाप
बशीर बद्र ने शायरी को महज कला नहीं, बल्कि जिंदगी का हिस्सा बनाया। उनके शेरों में आम आदमी का दर्द था, उसकी उम्मीद थी और उसकी खामोशी भी। ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं, पांव फैलाऊं तो दीवार में सर लगता है जैसे शेर उन लोगों की आवाज बने जो समाज में दबे-कुचले रहे।
वे चले गए, लेकिन उनकी शायरी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अनमोल विरासत है।
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