मां लिव-इन में, बच्चे पहुंचे कोर्ट; कहा- हमारा क्या कसूर, हमें दोनों का प्यार चाहिए
माता-पिता के विवाद में फंसे बच्चे
जानकारी के अनुसार बच्चों के माता-पिता के बीच करीब दो साल से विवाद चल रहा है। मामला अब कोर्ट तक पहुंच चुका है। मां की ओर से अलग रहने और वैवाहिक विवाद से जुड़ी कार्यवाही की गई है। वहीं पिता की ओर से पत्नी के साथ रहने को लेकर न्यायिक प्रक्रिया जारी है।
दोनों पक्षों के विवाद के बीच अब बच्चों ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। बच्चों का कहना है कि माता-पिता के झगड़े में उनकी कोई गलती नहीं है। वे चाहते हैं कि उनके भविष्य और पढ़ाई पर इस विवाद का असर न पड़े।
मां दूसरे व्यक्ति के साथ लिव-इन में
बच्चों की ओर से अदालत में दिए गए आवेदन में कहा गया है कि उनकी मां इस समय दूसरे व्यक्ति के साथ लिव-इन में रह रही हैं। बच्चों ने इच्छा जताई है कि उनकी मां वापस परिवार के साथ रहें।
बच्चों ने यह भी कहा है कि वे मां से अलग नहीं रहना चाहते। साथ ही वे अपने पिता का प्यार और सहारा भी चाहते हैं। बच्चों की ओर से अदालत से ऐसा आदेश देने की मांग की गई है जिससे उनका पारिवारिक जीवन सुरक्षित रह सके।
अभी पिता के साथ रह रहे दोनों बच्चे
जानकारी के अनुसार दोनों बच्चे फिलहाल अपने पिता के साथ रह रहे हैं। पिता पहले ड्राइवर का काम करते थे। अब वे मजदूरी करके बच्चों की परवरिश कर रहे हैं।
बच्चों की तरफ से कहा गया है कि उन्हें पिता का साथ मिल रहा है। इसके बावजूद वे मां की कमी महसूस कर रहे हैं। इसी वजह से उन्होंने अदालत के सामने अपनी इच्छा रखी है।
कोर्ट से कहा- हमें दोनों का प्यार चाहिए
बच्चों की ओर से अधिवक्ता शिवम उपाध्याय ने न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी आमला की अदालत में आवेदन पेश किया है। आवेदन में बच्चों की पढ़ाई, भविष्य और मानसिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए उचित संरक्षण देने की मांग की गई है।
बच्चों की ओर से कहा गया है कि उन्हें मां और पिता दोनों का प्यार चाहिए। वे नहीं चाहते कि माता-पिता के बीच चल रहे विवाद का असर उनके बचपन पर पड़े।
तीसरे व्यक्ति के दखल पर भी आपत्ति
आवेदन में बच्चों ने अपने पारिवारिक जीवन में किसी तीसरे व्यक्ति के हस्तक्षेप पर भी आपत्ति जताई है। बच्चों का कहना है कि माता-पिता के रिश्ते का विवाद उनका नहीं है।
उन्होंने अदालत से ऐसी व्यवस्था करने की मांग की है जिससे उनका परिवार और पढ़ाई दोनों प्रभावित न हों।
बच्चों की इच्छा पर विचार कर सकता है कोर्ट
मामले में संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम 1890 की धारा 17(3) का भी उल्लेख किया गया है। इसके तहत अगर कोई नाबालिग अपनी इच्छा के बारे में समझदारी से राय देने की स्थिति में है तो अदालत उसकी इच्छा पर विचार कर सकती है।
हालांकि बच्चों की इच्छा ही अंतिम फैसला नहीं होती। अदालत बच्चे के हित, परिस्थितियों और अन्य पहलुओं को ध्यान में रखकर निर्णय करती है।
28 सितंबर के आदेश का भी जिक्र
दस्तावेज में 28 सितंबर 2026 की तारीख का भी उल्लेख है। इसमें बच्चों के पारिवारिक जीवन, शिक्षा और हितों को ध्यान में रखते हुए उचित आदेश और संरक्षण की मांग की गई है।
मामले में बच्चों की ओर से रखी गई बात का केंद्र माता-पिता के विवाद का फैसला नहीं है। उनका कहना है कि वे दोनों का प्यार चाहते हैं और ऐसा माहौल चाहते हैं जिसमें उनका बचपन और पढ़ाई सुरक्षित रह सके।
अब कोर्ट के फैसले पर नजर
माता-पिता के विवाद के बीच बच्चों का पक्ष अब अदालत के सामने है। आगे कोर्ट दस्तावेजों, परिस्थितियों और बच्चों के हित को ध्यान में रखते हुए फैसला करेगा।
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि माता-पिता के विवाद के बीच बच्चों के भविष्य और भावनात्मक सुरक्षा को कैसे बचाया जाए।
यह खबर क्यों जरूरी है
यह मामला दिखाता है कि माता-पिता के विवाद का सबसे ज्यादा असर बच्चों पर पड़ता है। कानून में बच्चे की समझदार राय को सुना जाना इस बात का संकेत है कि न्यायपालिका बच्चों के हित को गंभीरता से लेती है। यह मामला समाज को भी यह सोचने पर मजबूर करता है कि पारिवारिक कलह में बच्चों की भावनात्मक सुरक्षा को कैसे प्राथमिकता दी जाए। संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम जैसे प्रावधानों की जानकारी आम लोगों के लिए भी उपयोगी है।