बैतूल में बनेगा देश का पहला लैंडस्केप प्रोजेक्ट, बदलेगी आदिवासियों की किस्मत

Aman Vaishnav | Jul 02, 2026, 10:19 IST
बैतूल में बनेगा देश का पहला लैंडस्केप प्रोजेक्ट
बैतूल में 100 करोड़ की लागत से देश का पहला लैंडस्केप प्रोजेक्ट शुरू हो रहा है। प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य जंगलों और वन्यजीवों को सुरक्षित रखना है। साथ ही वनाधिकार पाने वाले हजारों परिवारों की कमाई को बढ़ाना है।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • बैतूल में 100 करोड़ रुपए का लैंडस्केप प्रोजेक्ट तैयार हो रहा है।
  • इसमें जंगल, वन्यजीव, जल और वनाधिकार वाले परिवारों को एक साथ जोड़ा जाएगा।
  • सतपुड़ा से मेलघाट तक का पूरा वन क्षेत्र एक इकाई माना जाएगा।
  • मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र मिलकर यह मॉडल तैयार करेंगे।
  • सफल रहने पर इसे पूरे देश में लागू किया जा सकता है।

बैतूल जिले से एक बड़ी पहल शुरू हो रही है। यहां विकास और पर्यावरण संरक्षण को साथ लेकर चलने की कोशिश हो रही है। इसे लैंडस्केप प्रोजेक्ट नाम दिया गया है।



इस योजना में पहली बार जंगल, वन्यजीव, नदियां और वनाधिकार पाने वाले हजारों परिवार एक ही ढांचे में शामिल किए जाएंगे। अभी तक जंगलों का प्रबंधन अलग-अलग वन मंडलों के हिसाब से होता रहा है। लेकिन जंगल किसी सीमा को नहीं मानते।



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आखिर है क्या यह मॉडल

बता दें कि अब तक हर वन मंडल अपनी अलग योजना बनाता था। इस नई व्यवस्था में सतपुड़ा टाइगर रिजर्व से मेलघाट टाइगर रिजर्व तक के पूरे क्षेत्र को एक साझा पारिस्थितिकी तंत्र माना जाएगा। जंगल, वन्यजीव कॉरिडोर, गांव, खेती और वनाधिकार वाले क्षेत्र एक साथ जोड़े जाएंगे।



इसका मकसद साफ है। जंगल और गांव को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक के तौर पर देखा जाएगा।



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वनवासियों की सबसे बड़ी चुनौती

वन अधिकार अधिनियम लागू होने के बाद हजारों परिवारों को वन भूमि पर अधिकार मिले हैं। इसका मकसद उन्हें सम्मानजनक आजीविका देना था। लेकिन अब चुनौती यह है कि इन परिवारों की आय बढ़े। साथ ही जंगलों पर अतिरिक्त दबाव भी न पड़े। इसी संतुलन को साधने की कोशिश इस प्रोजेक्ट में की जा रही है।



दो राज्यों की साझा योजना

सतपुड़ा और मेलघाट दो अलग राज्यों में हैं। लेकिन पर्यावरण की नजर से दोनों एक ही लैंडस्केप का हिस्सा हैं। क्योंकि बाघ और तेंदुए जैसे वन्यजीव राज्यों की सीमा नहीं पहचानते हैं।



इसलिए मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र मिलकर समन्वित रणनीति बनाएंगे। अभी तक दोनों राज्यों की योजनाएं अलग-अलग बनती रही हैं। अब साझा कार्यप्रणाली पर काम होगा।



पूरा प्रशासन होगा शामिल

यह प्रोजेक्ट सिर्फ वन विभाग तक सीमित नहीं रहेगा। जिला स्तर पर कलेक्टर परियोजना संचालन समिति के अध्यक्ष होंगे। संबंधित डीएफओ सदस्य सचिव की भूमिका निभाएंगे।



कृषि, उद्यानिकी, पशुपालन, ग्रामीण विकास और जल संसाधन विभाग भी इसमें भागीदार बनेंगे। मकसद है सरकारी योजनाओं को जोड़कर ग्रामीणों तक ज्यादा फायदा पहुंचाना।



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तीन वैश्विक संधियों पर आधार

यह योजना तीन बड़ी अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणीय संधियों को ध्यान में रखकर बनाई जा रही है।



  • पहली है जलवायु परिवर्तन से जुड़ी यूएनएफसीसीसी
  • दूसरी है भूमि क्षरण रोकने वाली यूएनसीसीडी
  • तीसरी है जैव विविधता से जुड़ी सीबीडी

इन तीनों लक्ष्यों को जमीन पर उतारने के लिए बनी संस्था जीईएफ (GEF – Global Environment Facility) इस प्रोजेक्ट के लिए करीब 11 मिलियन डॉलर यानी लगभग 100 करोड़ रुपए की मदद दे रही है।



अभी कहां तक पहुंचा काम

जानकारी के अनुसार प्रोजेक्ट अभी शुरुआती चरण में है। पहले कॉन्सेप्ट नोट तैयार किया जा रहा है। इसे भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के सामने रखा जाएगा।



इसके बाद वाशिंगटन स्थित कार्यालय से मंजूरी मिलने पर विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन यानी डीपीआर (DPR – Detailed Project Report) तैयार होगा। नवंबर तक डीपीआर पेश करने का लक्ष्य रखा गया है।



हाल ही में बैतूल में इसे लेकर राष्ट्रीय स्तर की बैठक हुई। इसमें वन लैंडस्केप प्रबंधन से जुड़े विशेषज्ञों और अधिकारियों ने भाग लिया।



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कौन कर रहा है नेतृत्व

इस पूरे प्रोजेक्ट का राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व बैतूल के पूर्व मुख्य वन संरक्षक राकेश भूषण सिन्हा कर रहे हैं। वे फिलहाल संयुक्त राष्ट्र की संस्था एफएओ में सीनियर एडवाइजर हैं।



राकेश भूषण सिन्हा का कहना है कि वन अधिकार कानून लागू होने के बाद जंगलों के आसपास रहने वाले हजारों परिवारों को वन जमीन पर अधिकार मिला है।



राकेश भूषण ने बताया कि इसका मकसद था कि उन्हें सम्मान के साथ रोजगार और बेहतर जिंदगी मिले। अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इन परिवारों की कमाई बढ़े, लेकिन इसके लिए जंगलों पर ज्यादा दबाव भी न पड़े।



वहीं दक्षिण बन मंडल के डीएफओ अरिहंत ने बताया कि इस प्रोजेक्ट का क्रियान्वयन मध्यप्रदेश के नर्मदापुरम, बैतूल और छिंदवाड़ा जिलों के साथ महाराष्ट्र के मेलघाट तक फैले वन्यजीव कॉरिडोर क्षेत्र में प्रस्तावित है।



अगर यह पायलट प्रोजेक्ट सफल रहता है, तो इसे पूरे देश में लागू करने की तैयारी होगी। इससे न सिर्फ जंगल और वन्यजीव सुरक्षित रहेंगे, बल्कि वनाधिकार वाले परिवारों को भी बेहतर जिंदगी मिल सकेगी।



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