मास्टर प्लान मामले में फिलहाल राहत नहीं, कम से कम 5 महीने बंद रखना होंगी दुकानें
मास्टर प्लान मामले में भोपाल के व्यापारियों को फिलहाल राहत मिलने की उम्मीद नहीं है। सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद एमपी सरकार नए रास्ते तलाश रही है।
इसी के लिए शनिवार को चीफ सेक्रेटरी अशोक बर्णवाल ने मीटिंग भी की, लेकिन कानूनों का जाल ऐसा है कि मास्टर प्लान का प्रारूप प्रकाशित करने के बाद भी कम से कम पांच महीने तक दुकानें बंद ही रहेंगी। आइए समझते हैं भोपाल मास्टर प्लान के इस पेचीदा मामले को।
भोपाल-इंदौर के मास्टर प्लान का विवाद आखिर है क्या?
सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद सरकार के पास धारा 19/2 में मास्टर प्लान प्रकाशित करने का विकल्प बचा है। इसके तहत रहवासी इलाके को कॉमर्शियल इलाके में बदला जा सकता है, लेकिन इसमें भी कम से कम पांच महीने का समय लगेगा।
गणित समझिए...
- मध्यप्रदेशसरकार को नए मास्टर प्लान के प्रकाशन के लिए ही कम से कम एक महीना चाहिए।
- इसके बाद दावे-आपत्तियों के लिए 90 दिन का समय देना अनिवार्य है।
- यानी सिर्फ इसी प्रक्रिया में चार महीने से ज्यादा वक्त निकल जाएगा।
- इसका मतलब यह कि व्यापारियों के पास अभी सिर्फ दो ही रास्ते बचते हैं- या तो सुप्रीम कोर्ट सीधे राहत दे या सरकार नया मास्टर प्लान लाकर स्थिति सुलझाए। दोनों ही रास्ते फिलहाल महीनों दूर नजर आ रहे हैं।
मास्टर प्लान बनता कैसे है, पूरा प्रोसेस समझिए
- सर्वे और जरूरत आकलन: टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग शहर की मौजूदा आबादी, भविष्य की अनुमानित आबादी (भोपाल के मामले में 2047 तक), जमीन उपयोग, यातायात और बुनियादी ढांचे का सर्वे करता है।
- प्रारूप (ड्राफ्ट) तैयार करना: आवासीय, व्यावसायिक, औद्योगिक और ग्रीन एरिया जैसे जोन तय करते हुए ड्राफ्ट बनाया जाता है, जिसमें सड़कों, फ्लाईओवर और मेट्रो विस्तार जैसी योजनाएं भी शामिल होती हैं।
- ड्राफ्ट का प्रकाशन: नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम के तहत सरकार आधिकारिक रूप से ड्राफ्ट जारी करती है ताकि आम जनता उसे देख सके।
- दावे-आपत्तियां आमंत्रित करना: प्रकाशन के बाद तय अवधि (आमतौर पर 15 से 30 दिन) में नागरिक, किसान, बिल्डर संगठन (जैसे क्रेडाई) और जनप्रतिनिधि अपनी आपत्तियां-सुझाव दर्ज करा सकते हैं।
- आपत्तियों पर सुनवाई: विभाग के नामित अधिकारी (उप सचिव स्तर पर) सभी दावे-आपत्तियों पर सुनवाई करते हैं और तय करते हैं कि किन बदलावों को शामिल किया जाए।
- संशोधन और अंतिम रूप: सुनवाई में मिले वैध सुझावों के आधार पर ड्राफ्ट में संशोधन कर अंतिम प्रारूप तैयार होता है।
- मुख्यमंत्री और कैबिनेट की मंजूरी: अंतिम ड्राफ्ट नगरीय प्रशासन मंत्री के जरिए मुख्यमंत्री के पास मंजूरी के लिए जाता है, और यहीं अक्सर राजनीतिक कारणों से सबसे ज्यादा समय लग जाता है।
- राजपत्र अधिसूचना (नोटिफिकेशन): मंजूरी के बाद सरकार मास्टर प्लान को गजट में अधिसूचित करती है, जिसके बाद ही यह कानूनी रूप से लागू और बाध्यकारी होता है।
यानी सिर्फ एक स्टेप नहीं टलता रहा, बल्कि आठ पड़ावों वाली पूरी प्रक्रिया ही बरसों से अटकी हुई है।
21 साल, तीन ड्राफ्ट, फिर भी कागजों में ही रहा भोपाल का भविष्य
भोपाल का आखिरी वैध मास्टर प्लान 1995 में बना था जो 31 दिसंबर 2005 तक के लिए वैध था। उसके बाद से शहर बिना नए मास्टर प्लान के ही चल रहा है।
टाइमलाइन पर एक नजर...
- 1995- भोपाल का आखिरी लागू मास्टर प्लान बना, जो 2005 तक वैध रहा।
- नवंबर 2005- शिवराज सिंह चौहान पहली बार मुख्यमंत्री बने, करीब उसी वक्त पुराना मास्टर प्लान खत्म होने की कगार पर था।
- 31 दिसंबर 2005- मास्टर प्लान की अवधि समाप्त हो गई, लेकिन नया प्लान लागू नहीं हो सका और शहर पुराने ढांचे पर ही चलता रहा।
- 2009- शिवराज के पहले कार्यकाल में भोपाल के मास्टर प्लान का पहला ड्राफ्ट तैयार हुआ, लेकिन यह भी लागू नहीं हो पाया।
- 2018- शिवराज का पहला कार्यकाल खत्म हुआ, इसके बाद कमलनाथ सरकार (दिसंबर 2018-मार्च 2020) के संक्षिप्त दौर में भी मास्टर प्लान अटका ही रहा।
- 2020- शिवराज दूसरी बार मुख्यमंत्री बने, दूसरा ड्राफ्ट इसी दौर में सामने आया।
- 2023- तीसरा ड्राफ्ट जारी हुआ, लेकिन जनप्रतिनिधियों, किसानों और अन्य पक्षों की तरफ से 3 हजार से ज़्यादा आपत्तियां आने के बाद मामला फिर उलझ गया।
दिलचस्प बात यह है कि सबसे ज़्यादा आपत्तियां उन्हीं जनप्रतिनिधियों की तरफ से लगाई गईं, जिनके कंधों पर शहर के विकास की जिम्मेदारी थी।
नतीजा यह हुआ कि मास्टर प्लान अटकने का सीधा असर शहर के विस्तार पर पड़ा- कई प्रस्तावित सड़कें नहीं बन पाईं, जबकि दूसरी तरफ अवैध कॉलोनियों और अनियोजित निर्माण का विस्तार बदस्तूर जारी रहा। रहवासी इलाकों में बड़े शॉपिंग कॉम्प्लेक्स और नामी कंपनियों के आउटलेट तक बनकर तैयार हो गए।
अब सरकार ने पुराने ड्राफ्ट को आगे बढ़ाने के बजाय 2047 की अनुमानित आबादी और जरूरतों को ध्यान में रखकर नया मास्टर प्लान तैयार करने का फैसला किया है, जिसमें ट्रैफिक व्यवस्था, सड़कों की चौड़ाई, फ्लाईओवर, मेट्रो विस्तार, तालाबों और भोपाल की पुरातात्विक विरासत के संरक्षण जैसे मुद्दे शामिल किए जाने की बात कही गई है।
सुप्रीम कोर्ट के ताजा रुख के बाद नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने भी कहा है कि ड्राफ्ट तैयार है और मुख्यमंत्री की मंजूरी मिलते ही इसे लागू कर दिया जाएगा। सवाल बस यही है कि यह मंजूरी सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद ही क्यों याद आई?
शिवराज सरकार में मास्टर प्लान की टाइम लाइन...
- 2020 - दूसरा ड्राफ्ट प्रयास 2005 के बाद दूसरी बार मास्टर प्लान का ड्राफ्ट 2020 में तैयार किया गया, लेकिन प्रशासनिक और सियासी अड़चनों के चलते यह भी आगे नहीं बढ़ पाया।
- 2 जून 2023 - तीसरा और सबसे विस्तृत ड्राफ्ट (मास्टर प्लान-2031) शिवराज सरकार के अंतिम वर्ष में सरकार ने मास्टर प्लान का ड्राफ्ट 2 जून 2023 को जारी किया।
- जुलाई 2023 - आपत्तियों की बाढ़ ड्राफ्ट जारी होने के 30 दिन के भीतर कुल 3,005 आपत्तियां और सुझाव मिले, जिनमें बड़ा तालाब किनारे की बसाहट और बाघ एरिया जैसे रहवासी क्षेत्रों को लेकर आपत्तियां प्रमुख थीं।
- 9 अगस्त - 5 सितंबर 2023 - आपत्तियों पर सुनवाई नगरीय विकास एवं आवास विभाग के उप सचिव केवीएस चौधरी कोलसानी ने दावे-आपत्तियों पर सुनवाई की। जिसके आखिरी चरण में हुजूर विधायक रामेश्वर शर्मा, कांग्रेस नेता नरेश ज्ञानचंदानी और किसानों समेत क्रेडाई (बिल्डर यूनियन) ने कृषि भूमि को कैचमेंट एरिया में शामिल करने जैसे मुद्दों पर जमकर आपत्ति और हंगामा किया।
- 13 दिसंबर 2023 - शिवराज का कार्यकाल समाप्त इस ड्राफ्ट पर अंतिम फैसला होने से पहले ही सत्ता परिवर्तन हो गया और मोहन यादव नए मुख्यमंत्री बने। यही ड्राफ्ट बाद में फरवरी 2024 में नई सरकार द्वारा (पांचवीं बार) रद्द कर 2047 की आबादी के हिसाब से नए सिरे से बनाने का फैसला लिया गया।
चेन्नई की एक बिल्डिंग से शुरू हुआ मामला, भोपाल तक कैसे पहुंचा
दरअसल यह पूरा विवाद भोपाल से शुरू भी नहीं हुआ था। इसकी जड़ें चेन्नई के एक मामले में हैं, जहां एक शख्स ने बिना इजाजत इमारत खड़ी कर ली और अधिकारी पूरी बिल्डिंग बनने तक कुछ नहीं कर पाए। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो कोर्ट को समझ आया कि यह सिर्फ चेन्नई की नहीं, पूरे देश की समस्या है।
8 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु से जुड़े इस मामले की सुनवाई करते हुए देश के सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की राजधानियों को आवासीय क्षेत्रों के व्यावसायिक इस्तेमाल के खिलाफ कार्रवाई करने और 4 अगस्त तक अनुपालन रिपोर्ट देने के निर्देश दिए।
कोर्ट की टिप्पणी थी कि "रहने की जगह, व्यापार का अड्डा नहीं बन सकती," और सभी राजधानियों के नगर निगम आयुक्तों को सर्वे कर हलफनामा दाखिल करने को कहा गया।
चूंकि यह आदेश तकनीकी रूप से सिर्फ राजधानियों पर लागू होता है, इसलिए मध्य प्रदेश में फिलहाल सिर्फ भोपाल पर सीधा असर दिख रहा है- इंदौर, जबलपुर या ग्वालियर पर नहीं। लेकिन घरों में चल रही दुकानों की यह समस्या राज्य के लगभग हर बड़े शहर में कमोबेश एक जैसी ही है।
इंदौर के विजय नगर, पलासिया और जबलपुर के नेपियर टाउन व राइट टाउन जैसे पॉश रिहाइशी इलाकों में भी बेरोक-टोक कमर्शियल कॉम्प्लेक्स चल रहे हैं। अगर शिकायत हुई तो यही कार्रवाई वहां भी शुरू हो सकती है। भुवनेश्वर जैसे दूसरे शहरों में भी इसी आदेश के आधार पर सीलिंग शुरू हो चुकी है।
भोपाल में दुकानों पर अचानक ताले क्यों लगने लगे?
17 जुलाई को भोपाल नगर निगम (BMC) ने रिहाइशी इलाकों में चल रही दुकानों, क्लिनिक और होटलों को नोटिस भेजना शुरू किया। जिनमें सबसे ज्यादा अरेरा कॉलोनी और बावड़िया कलां में गए। नोटिस साफ था- 10 दिन में या तो दुकान बंद करो, या मकान को वापस सिर्फ रहने लायक बना दो।
10 दिन बाद, 1 अगस्त को कार्रवाई शुरू हुई। सबसे पहले रोहित नगर में एक टैटू स्टूडियो और एक स्किन क्लिनिक सील हुए, फिर सलैया के होटल राज महल पर ताला लगा। इसे देखकर घबराहट में आस-पास की करीब 200 दुकानें खुद ही बंद हो गईं। व्यापारी सड़क पर उतर आए।
सुनवाई में BMC ने सफाई दी कि अवैध निर्माण और व्यावसायिक उपयोग के खिलाफ कार्रवाई करना चाहते हैं, लेकिन अलग-अलग स्तरों पर आ रही बाधाओं की वजह से असरदार कार्रवाई नहीं हो पा रही।
कोर्ट ने इस पर दो-टूक कहा कि कानून के पालन में कोई ढिलाई या राजनीतिक हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं होगा, सरकार की कमेटी को खारिज कर दिया और 5 हफ्ते में जवाब मांगा।
रिहाइशी मकानों में इतनी दुकानें बनीं कैसे, सरकार ने चलने क्यों दिया?
इसकी सबसे बड़ी वजह वही 21 साल पुराना मास्टर प्लान और सालों तक चली सरकारी ढिलाई है। भोपाल का आखिरी मास्टर प्लान 2005 में खत्म हुआ, लेकिन इस दौरान शहर की आबादी और दुकानें दोनों कई गुना बढ़ीं, जबकि नई कमर्शियल जमीन उतनी नहीं बढ़ी।
नतीजा यह हुआ कि लोगों ने धीरे-धीरे अपने घरों की निचली मंजिलों और गैराज में ही दुकान, क्लिनिक और शोरूम खोलने शुरू कर दिए। रिपोर्ट्स के मुताबिक अकेले भोपाल के रिहाइशी इलाकों में आज 30-50 हजार के बीच ऐसी कमर्शियल दुकानें चल रही हैं।
दिलचस्प यह है कि यह सब चोरी-छिपे नहीं हुआ। दुकानदार कमर्शियल दर पर बिजली बिल और प्रॉपर्टी टैक्स भरते रहे, नगर निगम से ट्रेड लाइसेंस और जीएसटी रजिस्ट्रेशन भी मिलता रहा।
यानी एक हाथ से सरकार इनसे कमाई करती रही, और दूसरे हाथ से अब यही कारोबार अवैध बताया जा रहा है। नगर निगम कमर्शियल प्रॉपर्टी टैक्स, सॉलिड वेस्ट चार्ज और ट्रेड लाइसेंस फीस के जरिए इन्हीं रिहाइशी इलाकों से हर साल करोड़ों रुपए का राजस्व वसूलता रहा है।
गुरुवार को कांग्रेस ने भोपाल में नगर निगम मुख्यालय का घेराव कर पुतला फूंका और मांग रखी कि अगर कॉलोनियों में व्यवसाय करना अवैध है, तो नगर निगम सालों से कमर्शियल टैक्स क्यों वसूल रहा था, यह राशि तुरंत वापस की जाए।
दूसरी तरफ, रहवासी संगठन (संयुक्त रहवासी संघर्ष समिति) का कहना है कि उनकी लड़ाई किसी वैध व्यापारी के खिलाफ नहीं है, बल्कि सिर्फ इतनी है कि आवासीय घोषित भूखंडों पर व्यावसायिक गतिविधियां नियम के मुताबिक ही हों, वरना शहर का नियोजित विकास बिगड़ जाएगा। ट्रैफिक, पार्किंग, शोर और सुरक्षा जैसी दिक्कतों का हवाला देकर ही रहवासियों ने पहले हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।
सिर्फ 2 दुकानें सील हुईं, दावा किया 100 का- माजरा क्या है?
यहीं से सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच का बड़ा फर्क सामने आता है। नगर निगम ने सुप्रीम कोर्ट में बताया था कि करीब 100 दुकानें सील हुई हैं, लेकिन जांच में सिर्फ 2 दुकानें ही सील मिलीं- रोहित नगर का टैटू स्टूडियो और सलैया का होटल राज महल।
बाकी जिन्हें बंद दिखाया गया था, वे या तो खुद बंद हुई थीं, या सिर्फ उनका कागजी पंचनामा बना था, असल में ताला नहीं लगा था। जो 2 दुकानें सच में सील हुई थीं, सुनवाई से एक दिन पहले उनके भी ताले टूटे मिले। होटल राज महल के मैनेजर के मुताबिक, स्थानीय नेताओं के भरोसे पर होटल दोबारा खोल दिया गया।
इससे भी बड़ा सवाल यह उठा कि कुछ जगहों पर कार्रवाई हुई ही नहीं। अरेरा कॉलोनी में बैंक के ऊपर चलने वाले एक कैफे की बिल्डिंग सिर्फ रहने के लिए मंजूर थी, फिर भी वहां सीलिंग नहीं हुई।
रिकॉर्ड में इस प्रॉपर्टी से खेल मंत्री विश्वास सारंग के परिवार के कुछ सदस्यों के नाम जुड़े मिले। इसी तरह एक शोरूम के ऊपर चलने वाले डिजाइनर बुटीक को सिर्फ मौखिक चेतावनी दी गई, जबकि नीचे के शोरूम मालिक पर कार्रवाई हुई। यह बुटीक एक प्रभावशाली मंत्री की बहू से जुड़ा बताया जाता है।
जब मीडिया ने इस चुनिंदा कार्रवाई पर सवाल उठाए तो BMC अधिकारियों का जवाब था कि ऊपर की मंजिलों पर कमर्शियल गतिविधि की शिकायत नहीं मिली थी, इसलिए सिर्फ नीचे कार्रवाई की गई। इसी को लेकर रहवासियों ने प्रदर्शन भी किया।
आगे क्या होगा, आम आदमी के लिए इसके मायने क्या हैं?
आने वाले हफ्तों में कोर्ट, सरकार और मास्टर प्लान- ये तीन चीजें ही तय करेंगी कि आगे क्या होगा। कार्रवाई फिर शुरू होगी, लेकिन अब सीधे कोर्ट की निगरानी में।
सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ वकील एके सिन्हा को इस केस का एमिकस क्यूरे (कोर्ट का सहायक वकील) बनाया है, जो सीधे लोगों की शिकायतें सुन रहे हैं।
15 सितंबर की अगली सुनवाई में साफ होगा कि सरकार अपनी रिपोर्ट में क्या दिखाती है, और क्या मंत्री-परिवारों से जुड़े मामलों पर भी कार्रवाई होती है, या सिर्फ कागजी आंकड़े पेश किए जाते हैं।
गौरतलब है कि हाल ही में सरकार ने महानगर क्षेत्र नियोजन एवं विकास नियम-2026 लागू कर भोपाल और इंदौर-उज्जैन के विकास प्राधिकरणों को खुद मास्टर प्लान बनाने और संशोधित करने का अधिकार दे दिया है, ताकि बार-बार मंत्रालय से मंजूरी न लेनी पड़े।
इंदौर में अभी सीलिंग जैसी बड़ी कार्रवाई खबरों में नहीं है, लेकिन वहां भी पुराने मास्टर प्लान की अवधि खत्म हुए करीब 5 साल बीत चुके हैं और नया मास्टर प्लान अब तक जारी नहीं हुआ है, जिससे शहर के आसपास के गांवों की जमीनों पर विकास को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
इस पूरे विवाद की जड़ मास्टर प्लान ही है। जब तक भोपाल के लिए नया प्लान नहीं आता, यह लड़ाई बार-बार लौटेगी- कोर्ट आदेश देगा, व्यापारी कहेंगे विकल्प नहीं था, रहवासी राहत मांगेंगे, और सरकार फिर कोई कमेटी बनाकर समय निकालने की कोशिश करेगी।
मूल रूप से यह टकराव कानूनी सख्ती और 20 साल से लटके शहरी नियोजन के बीच फंसे आम व्यापारियों की कहानी है, और यह हाल राज्य के लगभग हर शहर का है।
ये खबरें भी पढ़ें...
बिना मंजूरी के भोपाल और इंदौर-उज्जैन महानगर क्षेत्र खुद बदल सकेंगे मास्टर प्लान
मास्टर प्लान में पिछड़ गए भोपाल-इंदौर, सीहोर-विदिशा जैसे शहरों ने मारी बाजी
मध्य प्रदेश में 10 जिलों का मास्टर प्लान इसी साल, बड़वानी का जारी
अरेरा कॉलोनी में आवासीय भूखंडों पर खुली दुकान, होटल, रेस्तरां कराए बंद