भोपाल-नागपुर हाईवे के चौड़ीकरण का फैसला अटका, टाइगर कॉरिडोर की शर्तों में फंसा NH-46
भोपाल-नागपुर नेशनल हाईवे (NH-46) का चौड़ीकरण लंबे समय से अटका हुआ है। साथ ही अब यह पूरी तरह वन्यजीव सुरक्षा की शर्तों में उलझ गया है। करोड़ों की स्वीकृति और प्लान तैयार होने के बावजूद काम शुरू नहीं हो पा रहा। सबसे बड़ा सवाल यही है कि सड़क पहले बनेगी या सुरक्षा की शर्तें पूरी होंगी?
क्यों फंसा है पूरा प्रोजेक्ट?
यह हाईवे उस इलाके से गुजरता है जो सतपुड़ा और मेलघाट टाइगर रिजर्व को जोड़ता है। यही वजह है कि यहां हर निर्माण गतिविधि को लेकर कड़ी निगरानी और विवाद दोनों बने हुए हैं।
11 साल से अधूरी कहानी
इटारसी से बैतूल तक 73 किमी का यह प्रोजेक्ट एक दशक से ज्यादा समय से अधूरा है। लागत बढ़ती गई, प्लान बदलते गए, लेकिन सड़क अब भी पूरी नहीं हो सकी।
21 किमी बना सबसे बड़ा बॉटलनेक
इस रूट का 21 किमी हिस्सा सबसे ज्यादा समस्या पैदा कर रहा है। जंगल के बीच सिंगल लेन होने के कारण यहां ट्रैफिक जाम आम बात है।जहां सफर 15 मिनट का होना चाहिए, वहीं 50 मिनट तक लग रहे हैं।
सरकार ने पैसा दिया, काम क्यों नहीं?
केंद्र ने इस परियोजना के लिए 758 करोड़ रुपए मंजूर किए हैं। इसमें 521 करोड़ रुपए सिर्फ टाइगर कॉरिडोर पर खर्च होने हैं। यानी पैसा और प्लान दोनों तैयार हैं, लेकिन जमीन पर काम नहीं दिख रहा।
कैसा है प्रस्तावित समाधान?
टाइगर कॉरिडोर को ध्यान में रखते हुए खास स्ट्रक्चर डिजाइन किया गया है। ऊपर से जानवर गुजरेंगे और नीचे से वाहन निकलेंगे ताकि दोनों की आवाजाही सुरक्षित रहे।
21 किमी में विशेष कॉरिडोर बनेगा। इसमें 10 अंडरपास और 1 ओवरपास होगा। साउंडप्रूफ संरचना बनाई जाएगी। सड़क किनारे फेंसिंग और पौधारोपण भी किया जाएगा।
विवाद कैसे शुरू हुआ?
जब 2014-15 में निर्माण शुरू हुआ, तब पर्यावरण समूहों ने आपत्ति उठाई। उनका कहना था कि यह इलाका टाइगर मूवमेंट का अहम रास्ता है। यहीं से मामला कानूनी प्रक्रिया में चला गया और आज तक वहीं अटका है।
एक तरफ तेज और सुरक्षित हाईवे की जरूरत है, दूसरी तरफ वन्यजीवों का संरक्षण। इसी टकराव में पूरा प्रोजेक्ट फंसा हुआ है।NHAI को सभी पर्यावरणीय शर्तों को पूरा करना होगा और उसे साबित भी करना होगा। इसके बाद ही इस परियोजना को आगे बढ़ने की स्पष्ट दिशा मिल पाएगी।
सबसे बड़ा सवाल
क्या यह प्रोजेक्ट संतुलन का मॉडल बनेगा या फिर देरी का एक और उदाहरण? फिलहाल स्थिति यही बताती है—सड़क तैयार होने से पहले ‘नियमों की मंजूरी’ सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है।
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