बीमारी छिपाई का बहाना नहीं चलेगा, बिना सबूत क्लेम रिजेक्ट नहीं कर सकती बीमा कंपनी
समझें क्या है पूरा मामला...
- देवास के नसरुद्दीन खान का बीमा क्लेम कंपनी ने बिना सबूत के खारिज कर दिया था।
- कंपनी ने आरोप लगाया कि बीमित ने पुरानी बीमारी छिपाई थी।
- भोपाल उपभोक्ता आयोग ने यह आरोप बिना सबूत के गलत माना है।
- आयोग ने 1.63 लाख रुपए 7% ब्याज सहित लौटाने का आदेश दिया है।
- अब बीमा कंपनियों को क्लेम रिजेक्ट करने पर ठोस सबूत देने होंगे।
बीमारी छिपाई, यह बोलना काफी नहीं
बीमा कंपनियां अक्सर क्लेम खारिज करते समय एक आसान रास्ता चुनती हैं। वे कह देती हैं कि बीमित व्यक्ति ने पॉलिसी लेते समय अपनी पुरानी बीमारी छिपाई थी। अब यह बहाना काम नहीं आएगा। भोपाल जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोषण आयोग (बेंच-2) ने साफ कह दिया है कि ऐसे आरोपों के साथ ठोस दस्तावेजी सबूत भी देने होंगे। बिना सबूत के क्लेम रोकना सेवा में कमी माना जाएगा।
क्या था पूरा मामला
देवास के रहने वाले नसरुद्दीन खान ने वर्ष 2020 में चोलामंडलम एमएस जनरल इंश्योरेंस कंपनी से आरोग्य संजीवनी पॉलिसी ली थी। इस पॉलिसी की अवधि 29 जुलाई 2020 से 28 जुलाई 2021 तक थी। इसके लिए उन्होंने चार हजार 554 रुपए का प्रीमियम जमा किया था।
12 जून 2021 को पॉलिसी की अवधि के दौरान उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई। उन्हें भोपाल के फ्यूचर मल्टी स्पेशलिटी हॉस्पिटल एंड ट्रामा सेंटर में भर्ती कराया गया। सात दिन तक इलाज चला और कुल एक लाख 63 हजार156 रुपए का खर्च आया था।
कंपनी ने टाला, फिर खारिज कर दिया
नसरुद्दीन खान ने अस्पताल में भर्ती होते ही बीमा कंपनी को सूचित किया था। सभी जरूरी दस्तावेज भी जमा किए थे। इसके बावजूद कंपनी ने लंबे समय तक कोई फैसला नहीं किया। कई बार फोन और व्यक्तिगत संपर्क के बाद भी भुगतान नहीं हुआ।
आखिरकार 27 जुलाई 2022 को कंपनी ने एक पत्र जारी कर दावा खारिज कर दिया था। कंपनी ने कहा कि प्रस्तुत दस्तावेज गलत और मनगढ़ंत हैं। साथ ही यह आरोप भी लगाया कि बीमित ने पॉलिसी लेते समय पुरानी बीमारी छिपाई थी।
उपभोक्ता आयोग पहुंचे नसरुद्दीन
क्लेम खारिज होने के बाद नसरुद्दीन खान ने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने एक लाख 63 हजार रुपए की क्लेम राशि पर 18% ब्याज, दो लाख रुपए क्षतिपूर्ति और 20 हजार रुपए वाद व्यय की मांग की। उनका कहना था कि उन्होंने कोई जानकारी नहीं छिपाई थी।
बीमा कंपनी ने आयोग में एक और दांव चला। कंपनी ने कहा कि परिवाद देरी से दायर किया गया है इसलिए मान्य नहीं होना चाहिए। साथ ही पुरानी बीमारी छिपाने का आरोप फिर दोहराया है। वहीं, आयोग ने दोनों तर्क ठुकरा दिए हैं।
आयोग ने खंगाले सभी दस्तावेज
आयोग ने मामले में प्रस्तुत सभी दस्तावेज, बिल, जांच रिपोर्ट और डिस्चार्ज समरी (Discharge Summary) की जांच की। इससे साफ हुआ कि परिवादी वाकई बीमार था। साथ ही, अस्पताल में भर्ती हुआ और इलाज कराया था।
खर्च की गई राशि भी दस्तावेजों से प्रमाणित हुई थी। दूसरी तरफ बीमा कंपनी धोखाधड़ी और पुरानी बीमारी छिपाने के आरोप तो लगाती रही, लेकिन उसके समर्थन में एक भी ठोस और विश्वसनीय सबूत नहीं दे पाई।
आयोग का साफ संदेश
आयोग ने कहा कि बीमा अनुबंध अत्यंत सद्भावना (Utmost Good Faith) के सिद्धांत पर टिका होता है। वहीं, जब कंपनी दावा खारिज करती है तो आरोप साबित करना उसी की जिम्मेदारी है। यहां यह जिम्मेदारी पूरी नहीं हुई। इसलिए कंपनी का यह कृत्य सेवा में कमी की श्रेणी में आता है।
आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल देरी के आधार पर उपभोक्ता के अधिकार खत्म नहीं होते। यदि उपभोक्ता लगातार अपने हक के लिए कोशिश करता रहा है, तो देरी को उचित कारण मानकर माफ किया जा सकता है।
कंपनी को देने होंगे इतने पैसे
आयोग ने आदेश दिया कि बीमा कंपनी दो महीने के भीतर नसरुद्दीन खान को एक लाख 63 हजार 156 रुपए 7% वार्षिक ब्याज के साथ अदा करे। इसके अलावा मानसिक, शारीरिक और आर्थिक क्षति के लिए 10 हजार रुपए और वाद व्यय के रूप में पांच हजार रुपए अलग से देने होंगे। आयोग ने यह भी कहा कि अगर तय समय में भुगतान नहीं हुआ, तो पूरी राशि पर 9% वार्षिक ब्याज देना पड़ेगा।
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