चंदा कम, सवाल ज्यादा: BJP ने समेटा निधि अभियान, जिलों पर ऑडिट का शिकंजा
News In Short
- बीजेपी ने आजीवन सहयोग निधि अभियान समय से पहले बंद किया।
- 62 जिलों से फंडिंग डिटेल और बैंक रिकॉर्ड मांगी गई।
- 20 हजार से अधिक चंदा देने वालों का पूरा प्रोफाइल जरूरी है।
- अधूरी जानकारी देने पर जिलों को फंड में कटौती की चेतावनी।
- पार्टी ने संपत्तियों और खर्चों पर भी सख्त निगरानी रखी।
News In Detail
मध्य प्रदेश भाजपा अपने आजीवन सहयोग निधि अभियान को समेटने का फैसला किया है। जिलों को साफ निर्देश दे दिए गए हैं—जितनी राशि जुटी है, तुरंत भोपाल जमा करो और पूरा हिसाब दो। साथ ही 20 हजार से ज्यादा चंदा देने वालों की डिटेल, बैंक रिकॉर्ड और पैन तक मांगा गया है। अभियान की रफ्तार कमजोर रहने और फाइनेंशियल गड़बड़ियों की आशंका के बीच यह कदम उठाया गया है।
अचानक ब्रेक क्यों लगा?
हर साल जोर-शोर से चलने वाला यह अभियान इस बार फीका पड़ गया। पार्षदों से लेकर स्थानीय कार्यकर्ताओं तक, अपेक्षित उत्साह नहीं दिखा। वार्ड स्तर पर एक-एक लाख जुटाने का टारगेट था, लेकिन कई जगह यह लक्ष्य अधूरा ही रह गया।
अब सीधे ‘हिसाब दो’ मोड में संगठन
प्रदेश कार्यालय ने सभी 62 जिलों को स्पष्ट आदेश दिया है कि जो पैसा इकट्ठा हुआ है, उसकी पूरी जानकारी के साथ जमा कराएं। रसीद बुक (कट्टे) का भी पूरा हिसाब मांगा गया है, यहां तक कि खाली कट्टे भी वापस बुला लिए गए हैं।
मुख्य तथ्य...
- आजीवन सहयोग निधि अभियान समय से पहले बंद।
- 62 जिलों से पूरी फंडिंग डिटेल मांगी गई।
- 20 हजार से अधिक चंदा देने वालों का पूरा प्रोफाइल जरूरी।
- पैन नंबर, बैंक डिटेल, चेक नंबर तक अनिवार्य।
- अधूरा हिसाब देने वाले जिलों को फंड में कटौती की चेतावनी।
- 15 मई तक ऑडिट रिपोर्ट और बैंक स्टेटमेंट जमा करना अनिवार्य।
चेक सिस्टम बना ‘चैलेंज’
इस बार नकद की जगह चेक से फंडिंग ली गई, जिससे पारदर्शिता तो बढ़ी, लेकिन दिक्कतें भी सामने आईं। सूत्र बताते हैं कि कई चेक बाउंस हो गए, जिनकी अलग से एंट्री तो हो रही है, लेकिन इसे सार्वजनिक नहीं किया गया।
मार्च क्लोजिंग ने भी बिगाड़ा खेल
मार्च के फाइनेंशियल क्लोजिंग के चलते व्यापारी और उद्योगपति भी खुलकर योगदान नहीं दे पाए। चेक देने में देरी और अकाउंटिंग की सख्ती ने अभियान की रफ्तार और धीमी कर दी।
जिलों पर ‘प्रेशर’: नहीं दिया हिसाब तो कटेगा हिस्सा
पार्टी ने साफ कर दिया है कि जो जिले मई तक पूरा हिसाब नहीं देंगे, उन्हें उनके हिस्से का 25% फंड नहीं मिलेगा। कुछ जिले ऐसे सामने आए हैं, जिन्होंने पिछले साल का हिसाब तक जमा नहीं किया।
संपत्तियों पर भी सख्त नजर
सिर्फ फंड ही नहीं, पार्टी ने जिलों की संपत्तियों की भी रिपोर्ट तलब कर ली है। किराए पर दी गई संपत्तियों को खाली कराने, बैंक खातों की जानकारी देने और हर खर्च का हिसाब देने को कहा गया है।
एक तरह से ‘फाइनेंशियल ऑडिट मोड’ में BJP प्रदेश संगठन अब पूरी तरह कंट्रोल मोड में दिख रहा है। फंडिंग से लेकर संपत्तियों तक, हर चीज पर नजर रखी जा रही है ताकि कोई ढिलाई या गड़बड़ी न बचे।
उत्साह से ज्यादा अबजवाबदेही पर जोर
इस पूरे घटनाक्रम से साफ है कि इस बार मध्य प्रदेश बीजेपी ने फंड जुटाने से ज्यादा फोकस पारदर्शिता और जवाबदेही पर रखा है। अभियान भले ही जल्दी खत्म हो गया, लेकिन इसके बाद शुरू हुई सख्ती आने वाले समय में संगठन की कार्यप्रणाली को और कड़ा बनाने का संकेत दे रही है।
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