भाजपा संगठन में एंट्री नहीं, लेकिन जिलों में रुतबा कायम; दिग्गज नेताओं की बढ़ी बेचैनी
मध्य प्रदेश भाजपा में इन दिनों एक नई सियासी बेचैनी अंदरखाने तेजी से महसूस की जा रही है। प्रदेश के कई बड़े नेता अपने बेटों को राजनीति में स्थापित करने के लिए लंबे समय से कोशिशों में जुटे हैं, लेकिन सत्ता और संगठन दोनों जगह रास्ता साफ नहीं हो पा रहा।
स्थिति यह है कि कई नेता पुत्र संगठन में कोई बड़ा दायित्व हासिल नहीं कर पाए। लेकिन अपने पिता के राजनीतिक प्रभाव के दम पर जिलों और संभागों में प्रशासनिक सिस्टम पर असर बनाए रखने की कोशिश जरूर कर रहे हैं।
ग्वालियर-चंबल से लेकर बुंदेलखंड और विंध्य तक कई नेता पुत्र फिलहाल बैनर, होर्डिंग, जन्मदिन राजनीति और शक्ति प्रदर्शन तक सीमित दिखाई दे रहे हैं। 2023 विधानसभा चुनाव में मौका नहीं मिला, अब 2028 को आखिरी उम्मीद माना जा रहा है।
संगठन में जगह नहीं
भाजपा के कई दिग्गज नेता अब वरिष्ठ राजनीति के दौर में पहुंच चुके हैं। ऐसे में उनकी सबसे बड़ी चिंता राजनीतिक उत्तराधिकारी तैयार करने की है। इसी वजह से कई नेता अपने बेटों को धीरे-धीरे क्षेत्रीय राजनीति में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं।
कहीं युवा मोर्चा के कार्यक्रमों में सक्रियता दिखाई जा रही है, तो कहीं प्रदेश पदाधिकारियों के स्वागत और शक्ति प्रदर्शन के जरिए संदेश देने की कोशिश हो रही है। लेकिन संगठन फिलहाल सीमित अवसरों की नीति पर काम कर रहा है। यही वजह है कि अधिकांश नेता पुत्र इंतजार की कतार में खड़े नजर आ रहे हैं।
भाजपा में अंदरखाने क्यों बढ़ रही बेचैनी?
सबसे बड़ी समस्या यह है कि भाजपा में एक नेता पुत्र को बड़ा मौका देने का मतलब चार अन्य दावेदारों की नाराजगी भी माना जा रहा है। इसी कारण संगठन बेहद संतुलित रणनीति पर चल रहा है। परिणाम यह है कि दिग्गज नेताओं की व्यक्तिगत कोशिशों के बावजूद उनके बेटे सत्ता और संगठन में स्थायी जगह नहीं बना पा रहे। राजनीतिक गलियारों में चर्चा यह भी है कि कई वरिष्ठ नेताओं ने “साइलेंट लॉबिंग” तक की, लेकिन संगठन ने खुलकर रास्ता नहीं दिया।
जिलों में नेता पुत्र का प्रभाव कैसे दिख रहा?
प्रदेश के कई जिलों में यह भी देखने को मिल रहा है कि नेता जी खुद व्यस्त रहते हैं, लेकिन उनके बेटे स्थानीय स्तर पर प्रभाव दिखाने में सक्रिय हैं। कुछ मामलों में प्रशासनिक अधिकारियों तक सीधी पहुंच बनाने की कोशिशें भी सामने आई हैं। हालांकि उनके पास कोई आधिकारिक संगठनात्मक दायित्व नहीं है, फिर भी राजनीतिक पहचान के आधार पर सिस्टम पर प्रभाव बनाए रखने की कवायद जारी है। यही वजह है कि अब सवाल उठने लगे हैं क्या बिना दायित्व के राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ रहा है? क्या प्रशासनिक सिस्टम पर अनौपचारिक दबाव बन रहा है? क्या संगठन से बाहर रहकर भी नेता पुत्र समानांतर शक्ति केंद्र बनाना चाहते हैं?
2023 में नहीं मिला मौका, अब 2028 पर नजर
विधानसभा चुनाव 2023 से पहले कई नेता पुत्रों को उम्मीद थी कि इस बार उनकी राजनीतिक लॉन्चिंग होगी। लेकिन भाजपा ने ज्यादातर सीटों पर पुराने चेहरों पर भरोसा जताया। कई दिग्गज नेताओं ने खुद भी सीट छोड़ने का जोखिम नहीं लिया। नतीजा यह हुआ कि दूसरी पीढ़ी इंतजार करती रह गई। अब पार्टी के अंदर माना जा रहा है कि 2028 विधानसभा चुनाव इन नेता पुत्रों के लिए निर्णायक हो सकते हैं।
ग्वालियर-चंबल से बुंदेलखंड तक एक जैसी तस्वीर
प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में लगभग समान स्थिति दिखाई दे रही है। ग्वालियर-चंबल में कई नेता पुत्र लंबे समय से शक्ति प्रदर्शन, पोस्टर राजनीति और सामाजिक आयोजनों के जरिए अपनी मौजूदगी बनाए हुए हैं।
बुंदेलखंड: बुंदेलखंड में भी कई बड़े नेताओं के बेटे संगठन की सीढ़ियां चढ़ने की कोशिश में हैं, लेकिन बड़ी जिम्मेदारी अब तक नहीं मिली।
विंध्य और महाकौशल: यहां भी नेता पुत्रों की सक्रियता दिखाई देती है, लेकिन राजनीतिक जमीन अभी पूरी तरह तैयार नहीं मानी जा रही।
कौन-कौन हैं कतार में खड़े नेता पुत्र?
मध्य प्रदेश भाजपा में जिन नेता पुत्रों की राजनीतिक एंट्री को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा होती रही है, उनमें ये नाम प्रमुख हैं—
- महाआर्यमन सिंधिया
- कार्तिकेय सिंह चौहान
- देवेन्द्र सिंह तोमर
- सुकर्ण मिश्रा
- अभिषेक भार्गव
- मुदित शेजवार
- समर्थ चिटनिस
- तुष्मुल झा
- आकाश विजयवर्गीय
इनमें कुछ सक्रिय राजनीति में सीमित भूमिका निभा रहे हैं, जबकि कई अब भी बड़े मौके की प्रतीक्षा में हैं।
क्यों अटकी दूसरी पीढ़ी?
पूर्व मंत्री गोपाल भार्गव के बेटे अभिषेक भार्गव लंबे समय से संगठन में सक्रिय हैं। बड़ी राजनीतिक भूमिका अब तक तय नहीं हो पाई। पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा चुनाव हार गए। इससे उनकी अपनी वापसी चुनौतीपूर्ण हो गई। इसका असर बेटे सुकर्ण मिश्रा की राजनीतिक संभावनाओं पर भी पड़ा। नरेन्द्र सिंह तोमर की प्रदेश राजनीति में वापसी के बाद उनके बेटे देवेन्द्र सिंह तोमर की एंट्री फिलहाल आगे खिसकती दिखाई दे रही है।
भाजपा में परिवारवाद पर नया सवाल
भाजपा लंबे समय से परिवारवाद के खिलाफ आक्रामक राजनीति करती रही है। लेकिन अब पार्टी के भीतर भी दूसरी पीढ़ी को स्थापित करने की कोशिशें खुलकर दिखाई देने लगी हैं। कांग्रेस इसी मुद्दे पर भाजपा को घेर रही है। कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि भाजपा मंचों से परिवारवाद का विरोध करती है, लेकिन अंदरखाने वही मॉडल अपनाया जा रहा है।
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