भाजपा का सहयोग सेल या सत्ता का नया दरबार? संगठन की मंशा पर उठने लगे सवाल

Ramanand Tiwari | May 29, 2026, 22:07 IST
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मध्य प्रदेश भाजपा ने कार्यकर्ताओं की समस्याएं सुनने के लिए सहयोग सेल शुरू किया। अब यह सत्ता तक पहुंच बनाने का माध्यम बनता दिख रहा है। ट्रांसफर, पोस्टिंग, राजनीतिक सिफारिश और भ्रष्टाचार मामलों की मांगें बढ़ रही हैं।

मध्य प्रदेश भाजपा ने कार्यकर्ताओं की समस्याएं सुनने के लिए सहयोग सेल शुरू किया था। अब यह सत्ता तक पहुंच बनाने का माध्यम बनता दिख रहा है। राजस्व विवाद, ट्रांसफर-पोस्टिंग, राजनीतिक सिफारिश और भ्रष्टाचार मामलों की मांगें सेल की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती हैं। संगठन इसे कार्यकर्ता संवाद मंच कहता है। अंदरखाने में इसे पावर एक्सेस सेंटर के रूप में देखा जाता है।



कार्यकर्ताओं की मदद के नाम पर खुला सिफारिश सिस्टम?

भाजपा प्रदेश कार्यालय में दिसंबर 2025 में शुरू किए गए सहयोग सेल का मकसद जमीनी कार्यकर्ताओं की समस्याओं का समाधान बताकर पेश किया गया था। मुख्यमंत्री मोहन यादव और प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की पहल पर शुरू इस व्यवस्था में रोज एक मंत्री और संगठन पदाधिकारी बैठते हैं। लेकिन कुछ ही महीनों में तस्वीर बदलती नजर आने लगी। अब यहां जनसमस्याओं से ज्यादा ट्रांसफर-पोस्टिंग और सेटिंग वाले आवेदन पहुंचने लगे हैं। सूत्रों का दावा है कि कई कार्यकर्ता अपने रिश्तेदारों और करीबियों के तबादले कराने के लिए राजनीतिक दबाव का इस्तेमाल करने लगे हैं।



BJP


राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कार्यकर्ता सहायता मॉडल सत्ता संपर्क केंद्र में बदल रहा है। भाजपा ने इस सेल को सिर्फ प्रदेश कार्यालय तक सीमित नहीं रखा। हर महीने मंत्रियों और संगठन पदाधिकारियों का ड्यूटी चार्ट तैयार कर बूथ स्तर तक भेजा जा रहा है। अब हर कार्यकर्ता जानता है कि किस दिन कौन मंत्री उपलब्ध रहेगा। विपक्ष इसे लेकर हमला बोल रहा है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि इससे प्रशासनिक प्रक्रिया पर राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है। सरकारी सिस्टम पार्टी रेफरल मॉडल में बदल सकता है।



कांग्रेस समर्थक भी पहुंचे भाजपा के सहयोग दरबार में

स्थिति इतनी बढ़ गई कि दूसरे दलों से जुड़े लोग भी खुद को भाजपा कार्यकर्ता बता आवेदन देने लगे। सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस से जुड़े कुछ लोग भी अपनी समस्याएं लेकर सहयोग सेल तक पहुंचे। संगठन ने नियम बदल दिए। अब आवेदन के साथ जिला अध्यक्ष, विधायक, सांसद या प्रदेश पदाधिकारी की अनुशंसा जरूरी है। इससे सवाल उठता है कि क्या आम व्यक्ति बिना राजनीतिक पहचान अपनी बात रख पाएगा।



भ्रष्टाचार केस वापस लेने तक की मांग!

सहयोग सेल से जुड़ी सबसे चौंकाने वाली जानकारी उन आवेदनों को लेकर सामने आई, जिनका सीधा संबंध प्रशासनिक प्रभाव से था। सूत्र बताते हैं कि एक रिटायर्ड अधिकारी ने पार्टी की समिति में पद मांगा। वहीं एक सरकारी अधिकारी ने अपने खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार मामले को खत्म कराने की गुहार लगाई। बताया गया कि अधिकारी का तर्क था कि केस खत्म हो जाए तो वह पार्टी के लिए और सक्रियता से काम कर सकेगा। इन घटनाओं ने सहयोग सेल की विश्वसनीयता और उसकी सीमाओं पर गंभीर बहस खड़ी कर दी है।



संगठन के अंदर भी बढ़ी बेचैनी

भाजपा के भीतर चर्चा तेज हो गई है कि सहयोग सेल पावर मैनेजमेंट सिस्टम बन रहा है। कुछ नेताओं का मानना है कि राजनीतिक पहुंच से प्रशासनिक फैसले प्रभावित हुए तो शासन पर असर पड़ेगा। इससे पार्टी की छवि भी प्रभावित हो सकती है।



प्रशिक्षण शिविरों में मोबाइल बैन

इधर बीजेपी संगठन ने प्रशिक्षण शिविरों में मोबाइल फोन पर सख्ती बढ़ा दी है। अब कार्यकर्ताओं के साथ वरिष्ठ नेताओं को भी मोबाइल लेकर प्रवेश की अनुमति नहीं होगी। इसके पीछे वजह हाल ही में वायरल हुई तस्वीरें बताई जा रही हैं। कुछ फोटो में कार्यकर्ता स्विमिंग पूल में नजर आए, जबकि कुछ तस्वीरों में नेताओं के साथ अनौपचारिक माहौल दिखाई दिया। संगठन ने इसे अनुशासनहीनता माना है। लेकिन राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह कदम डैमेज कंट्रोल के लिए उठाया गया है?



भाजपा के सामने सबसे बड़ा सवाल

भाजपा लगातार खुद को कार्यकर्ता आधारित पार्टी बताती रही है। सहयोग सेल में सिफारिश और राजनीतिक प्रभाव वाले आवेदन बढ़ गए हैं। इससे पार्टी के कार्यकर्ता मॉडल पर सवाल उठ रहे हैं। अगर मंच ट्रांसफर, पोस्टिंग और केस मैनेजमेंट का माध्यम बनता है तो विपक्ष को हमला करने का मौका मिलेगा।



हर महीने करीब 1000 आवेदन

दिसंबर 2025 में भाजपा सहयोग सेल शुरू हुआ। हर महीने करीब 1000 आवेदन पहुंचते हैं। ट्रांसफर और पोस्टिंग के आवेदन तेजी से बढ़े। दूसरे दलों के लोग भी आवेदन देने लगे। अब सिफारिश पत्र अनिवार्य कर दिया गया। कुछ लोग भ्रष्टाचार केस खत्म कराने की मांग करते हैं। प्रशिक्षण शिविरों में मोबाइल फोन बैन किया गया।



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