आपका मोबाइल छीन रहा बच्चे की आवाज, भोपाल में रोज मिल रहे 4 नए केस

Anjali Dwivedi | Apr 02, 2026, 15:36 IST
child speech delay
एम्स की स्टडी के मुताबिक, दो साल तक के हर 35 में से एक बच्चे का भाषा विकास कम पाया गया है। इन बच्चों का स्क्रीन टाइम आठ घंटे तक है, जिससे वे सामान्य शब्द भी नहीं बोल पा रहे हैं।

News In Short

  • 2 साल तक के हर 35 में से 1 बच्चे का भाषा विकास प्रभावित हैं।
  • प्रभावित बच्चों का मोबाइल स्क्रीन टाइम रोजाना 8 घंटे तक पाया गया।
  • भोपाल में प्रतिदिन 3 से 4 बच्चे स्पीच डिले की समस्या लेकर आ रहे हैं।
  • मोबाइल का वन-वे संवाद बच्चों के दिमाग पर बुरा असर डाल रहा है।
  • 2 साल तक के बच्चों के लिए स्क्रीन पूरी तरह बंद रखना जरूरी है।

News In Detail

भोपाल. दो साल तक के बच्चों में भाषा का विकास तेजी से गिर रहा है। एम्स (AIIMS) की हालिया स्टडी ने डराने वाले आंकड़े पेश किए हैं। रिसर्च के अनुसार, हर 35 में से एक बच्चा स्पीच डिले का शिकार है। रिसर्च में इन बच्चों का स्क्रीन टाइम 8 घंटे तक पाया गया है।



बच्चों में स्पीच डिले क्या होता है?

बच्चों में स्पीच डिले का मतलब है उम्र के हिसाब से भाषा और बोलने के कौशल का सामान्य से धीमे विकसित होना। जब बच्चा संकेतों, शब्दों या वाक्यों के माध्यम से संचार करने में असमर्थ होता है या देरी करता है, तो इसे स्पीच डिले कहते हैं। यह आमतौर पर 18 महीने से 3 साल के बीच पहचाना जा सकता है।



हर रोज पहुंच रहे 3-4 नए मामले

एक्सपर्ट्स के मुताबिक अब रोज औसतन 3-4 ऐसे बच्चे अस्पताल पहुंच रहे हैं। ये बच्चे भाषा के विकास में देरी और सोशल इंटरेक्शन की कमी से जूझ रहे हैं। एम्स और बीएमएचआरसी के डॉक्टरों ने इसे गंभीर बताया है। हालांकि अब इसकी जागरूकता बढ़ रही है कि बच्चे स्पीच डिले के शिकार हो रहे हैं।



सिर्फ राइम्स बोल पा रहा तीन साल का आरण

तीन साल का आरण (बदला हुआ नाम) एक बड़ा उदाहरण है। वह दिन में 6-7 घंटे मोबाइल पर कविताएं (Rhymes) देखता था। नतीजा यह हुआ कि वह अंग्रेजी कविताएं तो गुनगुना लेता था। लेकिन मम्मा-पापा जैसे सामान्य शब्द नहीं बोल पाता था। नाम पुकारने पर भी वह कोई रिस्पॉन्स नहीं देता था।



वन-वे संवाद से दिमाग के विकास पर लग रहा ब्रेक

मोबाइल पर बच्चा सिर्फ देखता है, वह जवाब नहीं देता। इसे वन-वे इंटरेक्शन कहते हैं। जबकि दिमाग का विकास टू-वे संवाद से होता है। यह ज्यादातर सिंगल फैमिली में माता-पिता के व्यस्त होने के कारण होता है। पेरेंट्स बच्चों को शांत रखने के लिए मोबाइल थमा देते हैं। इससे उनका सामाजिक दायरा (Social Sphere) सिमट गया है।



इन लक्षणों को नजरअंदाज न करें

पेरेंट्स को बच्चों के व्यवहार पर गौर करना चाहिए। अगर बच्चा आंखों में आंखें डालकर बात नहीं करता तो सतर्क हो जाएं। नाम पुकारने पर प्रतिक्रिया न देना भी बड़ा संकेत है। अकेले खेलना और अचानक चुप हो जाना रेड फ्लैग लक्षण हैं। इसके लिए गूगल पर 'M-CHAT-R/F' टेस्ट भी कर सकते हैं।



क्या थेरेपी से संभव है सुधार

अगर समस्या दिखे, तो स्पीच थेरेपी के एक्सपर्ट्स तुरंत की सलाह लें। इसके अलावा ऑक्यूपेशनल और बिहेवियरल थेरेपी भी कारगर है। भोपाल में एम्स और हमीदिया अस्पताल में इसके इलाज की अच्छी सुविधा है। वहां पीडियाट्रिक न्यूरोडेवलपमेंट क्लीनिक और अर्ली इंटरवेंशन सेंटर मौजूद हैं।



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