News Strike: सवा दो साल में 18 अफसरों पर ‘फास्ट एंड फ्यूरियस एक्शन’, कांग्रेस ने कहा ‘स्टंट’

Harish Divekar | Mar 24, 2026, 07:00 IST
Photograph: (thesootr)
BHOPALA. सीएम मोहन यादव ने सवा दो साल में 18 अफसरों पर कार्रवाई की। कांग्रेस ने इसे 'स्टंट' कहा, जबकि सरकार का दावा है कि अफसरशाही पर कड़ा कदम उठाया गया।

News In Short

  • सीएम ने 18 अफसरों पर कार्रवाई की, विपक्ष ने इसे 'स्टंट' बताया।
  • सीधी और गुना के अफसरों को हटाने का फैसला किया गया।
  • कांग्रेस ने अफसरशाही में सुधार पर सवाल उठाए।
  • सीएम के औचक निरीक्षण ने प्रशासनिक सुधारों को बढ़ावा दिया।
  • प्रशासनिक फैसले सीएम की जिम्मेदारी बन गए हैं, जनप्रतिनिधियों की भूमिका कम हुई।

News In Detail

न्यूज स्ट्राइक।किसी भी जिले में तैनात कलेक्टर या एसपी को एक झटके में हटा देना क्या मजाक लगता है। लापरवाह या असंवेदनशील अफसरों पर कार्रवाई करना क्या महज सरकार का दिखावा है। मध्यप्रदेश सरकार में अफसरशाही का आलम ये है कि जब तक सीएम खुद दखल नहीं देते कोई काम होने की गारंटी ही नहीं मिल पा रही है।



सवा दो साल में सीएम मोहन यादव को एक दो बार नहीं 18 अफसरों पर फास्ट एंड फ्यूरियस एक्शन लेना पड़ा है। जब ऐसा होता है तब विपक्ष को भी इन कार्रवाइयों पर निशाना कसने का मौका मिल जाता है।



सीएम मोहन का ताबड़तोड़ एक्शन, 2 अफसर हटाए

सीएम मोहन यादव ने बीते चौबीस घंटे में दो ऐसे ताबड़तोड़ एक्शन लिए हैं जिसने अफसरशाही में हलचल मचा दी है। बड़े प्रशासनिक फेरबदल को अंजाम देते हुए सीएम ने सीधी कलेक्टर स्वरोचित सोमवंशी और गुना एसपी अंकित सोनी को हटा दिया है। बताया जा रहा है कि उनके खिलाप शिकायतें और प्रशासनिक लापरवाहियों से जुड़ी शिकायतें मिलने के बाद सीएम ये फैसला लेने पर मजबूर हुए।



सीएम मोहन यादव अचानक सीधी जिल में पहुंचे थे। उन्हें देखते हुए आम लोगों सहित जनप्रतिनिधियों ने भी शिकायतों का अंबार लगा दिया था। सीएम के पास ये मैसेज एकदम क्लियर पहुंच गया कि प्रशासनिक स्तर पर सही एक्शन नहीं लिए जा रहे हैं। जिसके बाद कलेक्टर को हटाने का फैसला किया।



गुना का मामला थोड़ा अलग है यहां एक मामले में एसपी अंकित सोनी की भूमिका कुछ संदिग्ध लगी। जिसके बाद उन्हें हटाने के निर्देश जारी कर दिए गए। ये तो बात हुई आईएएस और आईपीएस अफसरों की। मोहन यादव ने सीधी के जिला सहकारी बैंक से भी कुछ शिकायते मिलने के बाद सीएम ने बैंक महाप्रबंधनक पीएस धनवाल को निलंबित कर दिया।



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सीएम के एक्शन पर विपक्ष ने किया सवाल

ये एक घटना है जिसे देखने के दो अलग-अलग चश्मे हो सकते हैं। एक चश्मा ये जाहिर करता है कि प्रदेश में जनप्रतिनिधियों की लाख लापरवाही या सुस्ती के बावजूद सीएम मोहन यादव अफसरशाही पर लगाम कसने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं। जो काम सीएम को सीधी जाकर करना पड़ा। वो बहुत आसान हो सकता था



अगर क्षेत्र के विधायक, सांसद या जनता से जुड़ा कोई और नेता चुस्ती से इन बातों पर नजर रखता। समय रहते सरकारी और प्रशासनिक जिम्मेदारों तक इसकी खबर पहुंचाता, लेकिन अफसरों की मनमर्जी तब तक चलती रही जब तक सीएम खुद एक्टिव नहीं हुए।



इस घटना को देखने का दूसरा चश्मा कुछ अलग ही नजरिया पेश करता है। ये चश्मा अमूमन विपक्ष के पास ही होता है और जो लोग उससे सहमत होते हैं इस चश्मे से दिखने वाली बातों को ही सही मानते हैं। ये चश्मा इस पूरी घटना को एक स्क्रिप्टेड या सोचे समझे इवेंट के रूप में दिखाता है। खुद कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने घटना को इसी तरह से पेश भी किया है।



जीतू पटवारी का सवाल: सुधार या स्टंट?

अफसरों पर इस एक्शन के बाद मोहन यादव ने ट्वीट कर इसकी पूरी जानकारी दी थी। जिस पर जीतू पटवारी ने भी ट्वीट किया और लिखा कि ये फैसला सुधार है या एडमिनिस्ट्रेटिव स्टंट है या फिर दिखावा है।



जीतू पटवारी का ट्वीट में लिखना है कि असल में प्रशासनिक अराजकता को दबाने छुपाने के लिए ऐसा किया जाता है। उन्होंने ये सवाल भी उठाया है कि लापरवाही क्यों चलती रही और फिर सक्रियता का पुराना नाटक क्यों किया गया। उन्होंने ये सुझाव भी दिया है कि ये समय छोटे मोटे सस्पेंशन का नहीं है बल्कि बड़ी प्रशासनिक समीक्षा का है।



क्या जनप्रतिनिधि सीएम पर निर्भर हो गए?

अब ये आप पर है कि आप किस चश्मे से इस घटना को देखते हैं और अपनी राय कायम करते हैं, लेकिन ये सवाल जरूर पूछे जाने चाहिए कि जनप्रतिनिधि वाकई क्या इतने सुस्त हो चुके हैं कि हर एक्शन लेने की जिम्मेदारी सीएम की हो चुकी है।



क्षेत्र के जनप्रतिनिधि या विभाग के मंत्री अपने मातहत आने वाले अधिकारियों की लगाम कसकर क्यों नहीं रख पा रहे हैं। क्यों हर बार सख्त एक्शन लेने के लिए सीएम को ही मैदान में उतरना पड़ता है या क्विक एक्शन लेना पड़ता है।



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सवा दो साल में 18 अफसरों पर एक्शन

महज सवा दो साल में सरकार को करीब 18 बार ऐसे फैसले लेने पड़े हैं। इससे पहले 24 जनवरी को ही अशोक नगर कलेक्टर आदित्य सिंह को हटाया गया था। उन पर आनंदपुर साहिब ट्रस्ट के खिलाफ जांच में रिश्वत लेने के आरोप थे। उनकी जगह साकेत मालवीय को जिले की कमान सौंपी गई।



इंदौर के दूषित पानी कांड के बाद दो जनवरी को सख्त कार्रवाई करनी पड़ी। इस मामले में 23 मौतों के बाद इंदौर नगर निगम कमिश्नर दिलीप यादव को हटा दिया गया। नगर निगम के अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया को भी मंत्रालय में पदस्थ कर दिया गया। इसके अगले ही दिन क्षितिज जैन को निगम कमिश्नर का पद सौंपा गया।



मऊगंज में तनाव: कलेक्टर और एसपी बदले

अब सीधे मार्च 2025 की बात करते हैं। 15 मार्च 2025 को मऊगंज के गड़रा गांव में तनाव इतना बढ़ा कि एक पुलिसकर्मी की ही जान ले ली गई। जिस पर तुरंत एक्शन लेते हुए 18 मार्च को सरकार ने कलेक्टर और एसपी दोनों को बदल दिया।



तत्काल कलेक्टर अजय श्रीवास्तव को हटाकर संजय कुमार जैन को जिले की प्रशासनिक कमान सौंपी गई। एसपी रसना ठाकुर को पीएचक्यू पदस्थ किया गया उनकी जगह दिलीप कुमार सोनी को एसपी बनाया गया।



ये याद दिला दें कि गड़रा गांव में सनी द्विवेदी नाम के युवक की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई थी। जिसे बचाने गई पुलिस टीम पर भी हमला किया गया था। जिसमें पुलिसकर्मी की मौत हो गई थी और कई घायल भी हुए थे।



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सागर में हादसा: कलेक्टर, एसपी हटाए गए

अगस्त 2024 में सागर जिले में ऐसा ही एक्शन लेना पड़ा। यहां शाहपुर में एक मकान गिर गया। जिसमें नौ बच्चों की मौत हो गई। घटना की गंभीरता को देखते हुए कलेक्टर दीपक आर्य और एसपी अभिषेक तिवारी को हटा दिया। इनके साथ ही एसडीएम संदीप सिंह भी हटा दिए गए।



इस घटना के बाद ये खुलासा भी हुआ कि एसपी अभिषेक तिवारी खुद ही पांच महीने पहले से तबादला चाहते थे। उन्हें केंद्र में प्रतिनियुक्ति का आदेश मिल चुका था, लेकिन मप्र सरकार उन्हें रिलीव नहीं कर रही थी। क्या पता उनकी लापरवाही या काम में गंभीरता कम, इसी वजह से हुई हो। ऐसे केस में असल जिम्मेदार किसे माना जाए। इस पर भी मंथन जरूरी है।



हरदा ब्लास्ट और शाजापुर वीडियो पर कार्रवाई

फरवरी 2024 में हरदा की पटाखा फैक्ट्री में हुए ब्लास्ट के बाद पहले एसपीसंजीव कुमार कंचन और फिर कलेक्टर ऋषि गर्ग को हटा दिया गया। इस घटना में करीब 13 लोगों की मौत हुई थी और 75 के घायल होने की खबर आई थी।



2 जनवरी 2024 को वायरल हुए एक वीडियो की वजह से शाजापुर कलेक्टर किशोर कन्याल को हटाना पड़ा था। कलेक्टर साहब ट्रक ड्राइवर्स की हड़ताल के बीच उनके साथ मीटिंग कर रहे थे। जिसमें उन्होंने ड्राइवर को उसकी औकात पर ताना मारा। उनका ये वीडियो वायरल हुआ। जिसे काफी इनसेंसिटिव यानी कि असंवेदनशील माना गया। जिसके बाद उन्हें पद से हटाना पड़ा।



जून 2024 में 50 से ज्यादा गोवंश की हत्या और उनकी डेडबॉडी फेंकने के मामले में सिवनी कलेक्टर क्षितिज सिंघल और एसपी राकेश कुमार को हटाने का फैसला लिया गया।



गुना बस हादसा: सीएम ने लिया सख्त एक्शन

गुना में बस में आग लगने वजन से एक दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। ये घटना 27 दिसंबर 2023 की है। तब सीएम की कुर्सी संभाले मोहन यादव को भी बमुश्किल 15 दिन का वक्त हुआ था। इसके बाद सीएम ने घटना के अगले ही दिन कलेक्टर तरुण राठी और एसपी विजय कुमार खत्री को बदल दिया था।



तत्कालीन परिवहन आयुक्त संजय कुमार झा पर भी गाज गिरी थी। साथ ही आरटीओ रवि बरेलिया, चीफ म्युनिसिपल ऑफिसर बीडी कतरोली को सस्पेंड कर दिया गया। कटनी जिले में भी एसपी अभिजीत रंजन और सीएसपी के बीच विवाद बढ़ने के बाद अभिजीत रंजन को पीएचक्यू अटैच कर दिया गया। ये एक्शन सीएसपी के तहसीलदार पति से शिकायत मिलने के बाद हुआ था।



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हटाने का फैसला, सीएम या सीएस का अधिकार

प्रशासनिक या लॉ एंड ऑर्डर से जुड़े किसी भी अधिकारी को हटाने का फैसला सीएम या सीएस के पास होता है। सीएम या मुख्य सचिव से मिले निर्देश के बाद सामान्य प्रशासनिक विभाग या गृह विभाग उस अधिकारी के संबंध में निर्देश जारी करता है, लेकिन इसका ये कतई मतलब नहीं होता कि अफसर के संबंध में जिले का कोई जनप्रतिनिधि कुछ कर ही नहीं सकता।



सीधे जनता से जुड़े जनप्रतिनिधि समय रहते सरकार के सामने अपनी शिकायत और जनता की परेशानी रख सकते हैं। जिसके बाद एक्शन लेना न लेना सरकार या प्रशासनिक मुखिया के हाथ में होता है।



बड़ा सवाल: क्या जनप्रतिनिधि जनता से दूर हैं?

जिस तरह से सीएम को ऑन स्पॉट शिकायतें सुनकर ये फैसले लेने पड़ रहे हैं। उसे देखते हुए क्या ये नहीं माना जा सकता कि जिले के जनप्रतिनिधि भी जनता से उतना ही दूर हैं जितना बंद कमरों में बैठे अधिकारी। वोटर्स से सीधा कनेक्शन होगा तो समस्या दूर करने के लिए सीएम के औचक निरीक्षण होने तक इंतजार करने की नौबत ही नहीं आएगी।



ऑन स्पॉट फैसले होते हैं तो ग्लोरीफाई भी ही जाते हैं। ऐसे फैसला लेने वालों की वाहवाही भी होती है। जाहिर तौर पर ये एक अच्छे और एक्टिव सीएम की निशानी तो हो सकती है, लेकिन इसकी आड़ में जनप्रतिनिधियों की सुस्ती को भी नहीं छुपाया जा सकता।





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