सरकारी कॉलेजों में जनभागीदारी समितियां गायब, विकास रुका या राजनीतिक इंतजार?
ऐसे समझें क्या है पूरा मामला...
- प्रदेश के 40 जिलों के करीब 473 सरकारी कॉलेजों में समितियां खाली।
- करीब एक वर्ष से अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्तियां लंबित।
- नए कोर्स, अतिथि शिक्षक और विकास कार्यों के प्रस्ताव प्रभावित।
- सरकार के कार्यकाल में अब करीब दो वर्ष का समय शेष।
- देर से होने वाली नियुक्तियों की उपयोगिता पर उठ रहे सवाल।
मध्य प्रदेश के शासकीय महाविद्यालय पिछले करीब एक साल से जनभागीदारी समितियों के बिना संचालित हो रहे हैं। अध्यक्ष और सदस्यों की राजनीतिक नियुक्तियां नहीं होने से कॉलेजों में विकास कार्य, नए कोर्स, अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति और कई प्रशासनिक फैसले प्रभावित बताए जा रहे हैं। विधानसभा चुनाव से पहले अब यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या नियुक्तियां सिर्फ राजनीतिक इंतजार का हिस्सा बनकर रह गई हैं?
विकास से ज्यादा राजनीतिक नियुक्तियों की चर्चा
जनभागीदारी समिति का उद्देश्य कॉलेजों के विकास में स्थानीय समाज की भागीदारी बढ़ाना था। लेकिन वर्तमान में अधिकांश सरकारी कॉलेज बिना नियमित समिति के काम कर रहे हैं।
राजनीतिक नियुक्तियां लंबित रहने से विकास कार्यों की रफ्तार धीमी पड़ी है। वहीं भाजपा के जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच भी यह चर्चा तेज है कि उन्हें जिम्मेदारी आखिर कब मिलेगी।
देर से बनी समितियां कितना बदल पाएंगी हालात?
राजनीतिक हलकों में अब यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि समितियों का गठन सरकार के कार्यकाल के अंतिम चरण में किया जाता है तो क्या वे कॉलेजों के लिए कोई ठोस काम कर पाएंगी या फिर यह प्रक्रिया केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगी।
कई अहम फैसले फाइलों में अटके
जनभागीदारी समिति नहीं होने से अनेक प्रस्ताव लंबित बताए जा रहे हैं। इनमें नए भवन, प्रयोगशालाओं का विस्तार, उपकरणों की खरीद, अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति, खेल सुविधाओं का विकास और नए पाठ्यक्रम शुरू करने जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं। कई कॉलेज सीमित प्रशासनिक अधिकारों के सहारे काम चला रहे हैं।
फिलहाल कौन संभाल रहा व्यवस्था?
जहां समिति का अध्यक्ष नहीं है, वहां संबंधित जिले के कलेक्टर या उनके नामित अधिकारी उपाध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
हालांकि प्रशासनिक व्यस्तताओं के कारण नियमित बैठकें नहीं हो पा रहीं। इसका असर निर्णय प्रक्रिया पर भी दिखाई दे रहा है और कई प्रस्ताव अभी तक मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं।
1997 में शुरू हुई थी जनभागीदारी व्यवस्था
सरकारी महाविद्यालयों में स्थानीय सहभागिता बढ़ाने के उद्देश्य से वर्ष 1997 में जनभागीदारी समिति की व्यवस्था लागू की गई थी।
समिति में सामान्य परिषद, प्रबंध समिति और वित्त समिति शामिल होती हैं। अध्यक्ष का मनोनयन शासन करता है, कलेक्टर उपाध्यक्ष और महाविद्यालय के प्राचार्य सचिव होते हैं। प्रत्येक समिति में औसतन 20 सदस्य शामिल किए जाते हैं।
कोरोना के बाद नहीं लौट सकी व्यवस्था
उच्च शिक्षा विभाग से जुड़े सूत्रों के अनुसार कोरोना काल के बाद अधिकांश कॉलेजों में नई राजनीतिक नियुक्तियां नहीं हो सकीं। इसके बाद से कई समितियां निष्क्रिय बनी हुई हैं और विकास से जुड़े फैसले लगातार टलते रहे हैं।
जनभागीदारी समिति की प्रमुख जिम्मेदारियां...
- महाविद्यालय के विकास की योजना तैयार करना।
- जनसहयोग और अन्य स्रोतों से संसाधन जुटाना।
- अतिथि शिक्षकों एवं कर्मचारियों की नियुक्ति करना।
- भवन, प्रयोगशाला और खेल सुविधाओं का विस्तार।
- स्व-वित्तपोषित पाठ्यक्रमों की फीस तय करना।
- नए कोर्स और शैक्षणिक नवाचारों को मंजूरी देना।
सबसे बड़ा सवाल
सरकार के मौजूदा कार्यकाल का समय तेजी से घट रहा है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जनभागीदारी समितियों की नियुक्तियां आखिर कब होंगी?
यदि निर्णय में और देरी होती है तो क्या नई समितियां वास्तव में कॉलेजों के विकास को गति दे पाएंगी, या फिर यह पूरा मामला केवल राजनीतिक नियुक्तियों तक सीमित रह जाएगा? यही सवाल अब शिक्षा जगत और राजनीतिक गलियारों दोनों में चर्चा का विषय बन गया है।
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