अनुकंपा नियुक्ति के लिए भटक रहे परिजन फिर भी संवेदनहीन बने हुए हैं अफसर

Sanjay Sharma | Apr 21, 2026, 20:18 IST
Photograph: (THESOOTR)
BHOPAL. मध्य प्रदेश में अनुकंपा नियुक्ति में आ रही कठिनाइयों और सीपीसीटी की अनिवार्यता दिवंगत कर्मचारियों के परिजनों को तोड़ रही है। विभागों में बैठे जिम्मेदार अफसर उनके प्रति संवेदनहीन बने हुए हैं।

News in Short

  • स्कूल शिक्षा और पंचायत विभाग में अनुकंपा के सबसे अधिक मामले लंबित।
  • दिवंगत कर्मचारियों के आश्रितों को अनुकंपा नियुक्ति के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहे।
  • 2014 से CPCT यानी कंप्यूटर दक्षता परीक्षा पास करना अनिवार्य है।
  • पंचायत विभाग में 500 और स्कूल शिक्षा विभाग में 700 प्रकरण लंबित हैं।
  • मप्र लिपिक वर्गीय शासकीय कर्मचारी संघ का कहना नियमों का सरलीकरण हो।

News in Detail

सरकार के दावों और आश्वासनों के बावजूद अनुकंपा नियुक्ति की मुश्किलें दूर नहीं हो रही हैं। परिवार के मुखिया के निधन के बाद सरकार के विभागों में नियुक्ति के लिए परिजन भटक रहे हैं। कोई परिवार आर्थिक तंगी में घिरा है तो किसी के बच्चे लाचारी में पढ़ाई छोड़ने मजबूर हैं।



इसके बावजूद विभागों में बैठे जिम्मेदार अफसर उनके प्रति संवेदनहीन बने हुए हैं। एक और अनुकंपा नियुक्ति हासिल करने की जद्दोजहद से ज्यादा मुश्किल इसे बरकरार रखने सीपीसीटी जैसी पात्रता बरकरार रखने की चुनौती बनी हुई है।



दिवंगत कर्मचारियों के भटक रहे परिजन

मध्य प्रदेश के सरकारी विभाग और निकाय, आयोग, मंडलों में 5 हजार से ज्यादा अनुकंपा नियुक्तियां अटकी हुई हैं। अनुकंपा नियुक्ति के लिए सरकार अभियान चलाकर लंबित मामलों को सुलझाने का आदेश दे चुकी हैं। इसके बाद भी अधिकारी ऐसे प्रकरणों के निपटारे को अनदेखा कर रहे हैं। इससे दिवंगत कर्मचारियों के परिजन दर- दर भटक रहे हैं।



स्कूल शिक्षा, पंचायत, महिला बाल विकास, पीडब्ल्यूडी, वन और मप्र खेल विभाग में अनुकंपा नियुक्ति के सबसे जयादा मामले अटके हुए हैं। वहीं अनुकंपा नियुक्ति के बाद सीपीसीटी जैसी पात्रता परीक्षा उम्रदराज परिजनों के सामने चुनौती बन गई है। उम्रदराज लोग कई कोशिशों के बाद भी सीपीसीटी पास नहीं करने की वजह से नौकरी गवां रहे हैं।



कर्मचारियों की मांग सालों से विचाराधीन

मध्यप्रदेश में अनुकंपा नियुक्ति के प्रकरण गंभीर समस्या बन गए हैं। स्कूल शिक्षा और पंचायत विभाग में सबसे ज्यादा मामले लंबित हैं। स्कूल शिक्षा में सात सौ और पंचायत विभाग में 500 प्रकरण अटके हुए हैं। आश्रितों के लिए 2014 में लागू सीपीसीटी यानी कंप्यूटर दक्षता परीक्षा सबसे बड़ी बाधा है।



नियम के अनुसार आश्रित को तीन साल में यह परीक्षा पास करनी होती है। सफल नहीं होने पर उसे सेवा से बाहर करने का प्रावधान है। इस नियम के कारण 225 से ज्यादा कर्मचारी बेदखल किए जा चुके हैं। मप्र लिपिक वर्गीय शासकीय कर्मचारी संघ के संरक्षक एमपी द्विवेदी और मप्र राज्य कर्मचारी संघ के अध्यक्ष हेमंत श्रीवास्तव इस नियम को बदलने की मांग करते आ रहे हैं।



अनुकंपा नियुक्ति मिलने के बाद हटाया

  • राजस्व विभाग: जबलपुर में पटवारी सुरेश वर्मा के पुत्र राहुल वर्मा को 2020 में पटवारी पद पर अनुकंपा नियुक्ति मिली। राहुल तीन साल कोशिश करने के बाद भी सीपीसीटी परीक्षा पास नहीं कर सका। इस वजह से साल 2023 में उसे सेवा से बाहर कर दिया गया।
  • वन विभाग : वनकर्मी रईसुद्दीन की दिसम्बर 2019 में मृत्यु हो गई थी। उनकी बेटी शादमा बेगम को 2020 में सहायक ग्रेड 3 के पद पर नियुक्ति मिली। शादमा को सीपीसीटी पास करना थी, लेकिन लगातार कई बार कोशिश करने पर भी वह पास नहीं पा पाई और नौकरी से निकाल दिया गया।
  • वन विभाग : 57 वर्षीय साधना चौधरी, जो वन विभाग में सहायक ग्रेड 3 पद पर कार्यरत थीं, बेल्ट कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रही थीं। उनके पति का 2008 में निधन हो गया था। इसके बावजूद उन्हें सीपीसीटी पालन न करने के कारण नौकरी से बाहर कर दिया गया।
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अनुकंपा के लिए सालों से भटक रहे लोग

  1. रीवा : दिवंगत सहायक शिक्षक मनोज तिवारी का निधन 2016 में हुआ। पत्नी सीमा तिवारी 8 साल से दफ्तरों के चक्कर काट रही हैं। सीपीसीटी पास न होने से फाइल रुकी है। वहीं आर्थिक तंगी पूरे परिवार की मुश्किल बन गई है।
  2. ग्वालियर : पटवारी दिनेश कुशवाह की 2017 में मृत्यु हुई थी। उनके पुत्र रवि कुशवाह ने 2018 में आवेदन दिया, लेकिन 7 साल बाद भी नियुक्ति नहीं मिली। नियमों की उलझन और अफसरों की लापरवाही से मामला अटका है।
  3. उज्जैन : स्कूल शिक्षा विभाग के लिपिक रमेश चंद्रा का 2015 में निधन हुआ। बेटी पूजा चंद्रा ग्रेजुएट है पर दो बार सीपीसीटी में फेल हो चुकी। तीन साल की मियाद पूरी होने पर फाइल बंद कर दी गई। अब वे बेरोजगार है।
  4. जबलपुर : वनरक्षक किशन लाल की 2014 में ड्यूटी पर मौत हुई। पत्नी गीता बाई को आज तक नौकरी नहीं मिली। हर बार नया दस्तावेज मांग लिया जाता है। 10 साल से किराये के मकान में गुजारा कर रही हैं।

अनुकंपा पर बयान बेअसर

पिछले कुछ महीनों में मध्य प्रदेश सरकार के अधिकारियों ने अनुकंपा नियुक्ति के लंबित मामलों पर कई बार बयान दिए हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने जुलाई 2024 में विभागों को अभियान चलाकर अनुकंपा नियुक्ति के प्रकरण 3 माह में निपटाने के निर्देश दिए थे। उन्होंने दिवंगत कर्मचारियों के आश्रितों की परेशानी दूर करने कहा था लेकिन हालात जस के तस हैं।



अगस्त 2024 में जीएडी ने निर्देश जारी कर स्पष्ट किया कि सीपीसीटी की अनिवार्यता बरकरार रहेगी। लेकिन 3 साल की समय सीमा के दौरान वेतन नहीं रोका जाएगा। इसके बावजूद कई विभागों ने सीपीसीटी के बिना नियुक्ति ही नहीं दी है। अक्टूबर 2024 में उप मुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा ने कहा अनुकंपा के मामलों में सरकार द्वारा सहानुभूतिपूर्ण विचार करने का भरोसा दिलाया था लेकिन ये भरोसा बयान तक ही सिमटकर रह गया है।



2026 की स्थिति...

  1. नियम यथावत: सीपीसीटी पास करना अनिवार्य है। 3 साल में पास न करने पर सेवा समाप्त का नियम लागू है।
  2. लंबित मामले: स्कूल शिक्षा में 700+ और पंचायत विभाग में 500+ प्रकरण अभी भी अटके हैं। 2011 से पंचायत विभाग में कोई प्रकरण नहीं निपटा।
  3. सरकार का फोकस: सरकार का पूरा ध्यान नई भर्तियों पर है, जबकि अनुकंपा नियुक्ति पर नियमों के सरलीकरण को अनदेखा कर दिया गया है।

नियमों के आधार पर दे रहे नियुक्ति

सामान्य प्रशासन विभाग के अपर सचिव अजय कटेसरिया का कहना है कि अनुकंपा नियुक्तियां शासन के नियमों के आधार पर दी जा रही हैं। लंबित प्रकरणों में विभाग से जानकारी बुलाकर समाधान किया जा रहा है। नगरीय निकाय, निगम मंडल जैसे संस्थाओं को छोड़ दें तो अनुकंपा प्रकरणों की संख्या बहुत ज्यादा नहीं है। अनुकंपा नियुक्ति के लिए भी पात्रता जरूरी है। इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।



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