कांग्रेस में ‘वन लाइन’ की जगह कई सुर : मैहर–विंध्य क्षेत्र में गुटबाजी का खुला खेल, निष्कासित नेता की वापसी पर बवाल
मध्य प्रदेश कांग्रेस में संगठन की “एक लाइन” वाली व्यवस्था जमीन पर बिखरती नजर आ रही है। मैहर–विंध्य क्षेत्र में निष्कासित नेता रामनिवास उरमलिया की वापसी ने अंदरूनी खींचतान को खुलकर सामने ला दिया है। बड़े नेताओं के अलग-अलग बयान, स्थानीय पदाधिकारियों को जानकारी तक नहीं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि पार्टी में फैसला आखिर ले कौन रहा है?
एक मुद्दा, कई बयान: कौन सही, कौन गलत?
रामनिवास उरमलिया की सदस्यता को लेकर कांग्रेस के भीतर ही विरोधाभास साफ दिख रहा है। मीडिया विभाग के अध्यक्ष मुकेश नायक कहते हैं कि अनुशासन समिति सदस्यता दिलवा सकती है। वहीं मैहर के जिलाध्यक्ष धर्मेश घेई का कहना है कि यह अधिकार सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष के पास है। ऐसे में पार्टी के अंदर ही नियमों की अलग-अलग व्याख्या सामने आ रही है।
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जिन्हें पता होना चाहिए था, वही अनजान
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि जिस कार्यक्रम में उरमलिया को शामिल कराया गया, उसमें न जिलाध्यक्ष को बुलाया गया और न ही नगर अध्यक्ष को जानकारी दी गई। जिलाध्यक्ष धर्मेश घेई ने साफ कहा—“बड़े नेता हैं, हम क्या कह सकते हैं।
मैहर कांग्रेस जिलाध्यक्ष धर्मेश घेई ने स्पष्ट कहा कि रामनिवास उरमलिया को वर्ष 2023 में तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ के कार्यकाल में 6 साल के लिए निष्कासित किया गया था। यह कार्रवाई उनके द्वारा विधानसभा और लोकसभा चुनाव के दौरान पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल रहने के कारण की गई थी।
उन्होंने यह भी साफ किया कि कांग्रेस संगठन में किसी भी निष्कासित सदस्य को दोबारा शामिल करने का अधिकार केवल प्रदेश अध्यक्ष के पास होता है। इस संबंध में उन्हें प्रदेश स्तर से किसी प्रकार की कोई आधिकारिक सूचना या निर्देश प्राप्त नहीं हुए हैं।
घेई के अनुसार, अनुशासन समिति की भूमिका सिर्फ अनुशंसा (रिकमेंडेशन) तक सीमित होती है। उसे न तो किसी को सीधे सदस्यता दिलाने का अधिकार है और न ही बहाली का अंतिम निर्णय लेने का। नगर अध्यक्ष प्रभात द्विवेदी ने भी यही कहा कि उन्हें कार्यक्रम की कोई सूचना नहीं थी।
निष्कासन से वापसी तक: पूरा विवाद
रामनिवास उरमलिया को 2023 में पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते 6 साल के लिए निष्कासित किया गया था। लोकसभा चुनाव के दौरान भी उन पर विरोध करने के आरोप लगे थे। अब अचानक उनकी वापसी ने संगठन के फैसलों पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।
किसने दिलाई एंट्री? कैसे हुई बहाली?
मैहर में आयोजित कार्यक्रम में पूर्व नेता अजय सिंह और अनुशासन समिति के अध्यक्ष राजेंद्र सिंह ने उरमलिया को पार्टी में शामिल कराया। हालांकि, सवाल यह है कि क्या यह फैसला पार्टी की आधिकारिक प्रक्रिया के तहत हुआ या व्यक्तिगत स्तर पर लिया गया?
लेटर, प्रक्रिया और दावे-सच क्या है?
18 अप्रैल को जारी एक पत्र में बहाली का जिक्र है, जिस पर राजेंद्र सिंह के हस्ताक्षर बताए जा रहे हैं। राजेंद्र सिंह का कहना है कि उनके पास अपील आई थी और प्रक्रिया के तहत कार्रवाई हुई। लेकिन प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने उसी दिन कहा कि उन्हें इस मामले की जानकारी नहीं है।
गुटबाजी या सामाजिक समीकरण?
सूत्रों के मुताबिक, इस फैसले के पीछे सिर्फ संगठनात्मक कारण नहीं, बल्कि जातीय समीकरण भी अहम हैं। चर्चा है कि अजय सिंह और राजेंद्र सिंह, उरमलिया के जरिए ब्राह्मण वोट बैंक में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते हैं। यानी फैसला सिर्फ संगठन नहीं, राजनीति के समीकरण देखकर लिया गया।
मैहर से विंध्य तक: ‘अपना-अपना राग’
कांग्रेस के अंदर फिलहाल स्थिति ऐसी दिख रही है, जहां हर बड़ा नेता अपनी लाइन पर चल रहा है। कोई गाइडलाइन की बात कर रहा है, तो कोई अपने स्तर पर फैसले ले रहा है। इससे कार्यकर्ताओं के बीच भी भ्रम की स्थिति बन रही है।
सवाल बड़े हैं, जवाब गायब
पार्टी में सदस्यता दिलाने का अधिकार आखिर किसके पास है? निष्कासित नेता की वापसी किस प्रक्रिया से हुई? स्थानीय नेतृत्व को क्यों दरकिनार किया गया? प्रदेश स्तर पर जानकारी के बिना फैसला कैसे हुआ? इन सवालों के जवाब फिलहाल साफ नहीं हैं।
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गुटबाजी में उलझा संगठन
मैहर–विंध्य क्षेत्र का यह मामला सिर्फ एक नेता की वापसी तक सीमित नहीं है, बल्कि कांग्रेस के अंदर चल रही गुटबाजी और समन्वय की कमी को उजागर करता है। जब पार्टी के जिम्मेदार पदाधिकारी ही एक राय पर नहीं हैं, तो संगठन को मजबूत करने की चुनौती और बड़ी हो जाती है। फिलहाल तस्वीर यही बता रही है कि कांग्रेस में “एक आवाज” की जगह “कई आवाजें” गूंज रही हैं।