मंदिर में दान चोरी रोकने पुजारियों की ड्रेस में ना हो जेब : महंत रवींद्र पुरी
समझें क्या है पूरा मामला
- आगर-मालवा के बगलामुखी मंदिर में दान चोरी का मामला सामने आया।
- राम मंदिर के बाद अब यह दूसरा बड़ा मामला बना है।
- उज्जैन पहुंचे अखाड़ा परिषद अध्यक्ष महंत रवींद्र पुरी ने सुझाव दिए।
- पुजारियों की ड्रेस में जेब न रखने की सलाह दी गई।
- मंदिरों में ड्रेस कोड और मेटल डिटेक्टर लगाने की मांग उठी।
अयोध्या के राम मंदिर के बाद अब एक और मंदिर सुर्खियों में है। मध्य प्रदेश के आगर-मालवा जिले के नलखेड़ा में बगलामुखी मंदिर है। यह मंदिर तांत्रिक पूजा और सिद्धि के लिए मशहूर है। देशभर से रोज हजारों श्रद्धालु यहां दर्शन करने आते हैं।
यहां दान चोरी का मामला सामने आने से हड़कंप मच गया है। इस घटना के बाद धार्मिक जगत में चिंता बढ़ गई है। मंदिरों की सुरक्षा और पारदर्शिता पर सवाल उठने लगे हैं। सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा तेजी से फैल रहा है।
इसी बीच अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रवींद्र पुरी उज्जैन पहुंचे। साथ में महामंडलेश्वर शांति स्वरूपानंद भी मौजूद रहीं। दोनों संतों ने मंदिरों की व्यवस्था पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि बड़े मंदिरों में सख्त नियम लागू होने चाहिए। पुजारियों और कर्मचारियों के लिए खास ड्रेस कोड बनाने की बात कही गई। साथ ही मेटल डिटेक्टर जैसी जांच व्यवस्था की भी सिफारिश की गई। दोनों संतों का मानना है कि यह कदम भरोसा बढ़ाएगा।
पुजारियों की ड्रेस पर सुझाव
महंत रवींद्र पुरी महाराज ने बड़ी बात कही। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म को बदनाम करने की कोशिश होती है। इसलिए मंदिरों में ऐसी व्यवस्था जरूरी है जिससे विवाद न हो। उन्होंने हरिद्वार के मनसा देवी मंदिर का उदाहरण दिया। वहां पुजारियों की यूनिफॉर्म में जेब नहीं रखी जाती है। पूजा के दौरान धोती-कुर्ता पहना जाता है, पर कुर्ते में जेब नहीं होती।
महंत पुरी ने बताया कि श्रद्धालु अक्सर ऐसा करते हैं। वे सीधे पुजारी की जेब में पैसे रख देते हैं। बाद में इसकी तस्वीर या वीडियो वायरल होने पर गलत संदेश जाता है। कई बार इससे पुजारी की छवि को भी नुकसान पहुंचता है। उन्होंने कहा कि जेब न होने से यह समस्या खत्म हो जाएगी। श्रद्धालु तब सीधे दानपेटी में ही पैसे डालेंगे। इससे किसी तरह का विवाद भी नहीं होगा। साथ ही पुजारियों पर लगने वाले बेबुनियाद आरोप भी रुकेंगे।
पुजारियों का खर्च ट्रस्ट उठाए
रवींद्र पुरी ने एक और अहम सुझाव दिया। उनका कहना था कि पुजारियों को वेतन ट्रस्ट से मिलना चाहिए। साथ ही उनकी बाकी जरूरतें भी ट्रस्ट को पूरी करनी चाहिए। उनके मुताबिक जब ट्रस्ट जिम्मेदारी उठाएगा तो हालात बदलेंगे। पुजारियों को फिर श्रद्धालुओं से सीधे पैसे लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इससे मंदिर की छवि भी बेहतर होगी। साथ ही पुजारियों पर भरोसा भी बढ़ेगा। कई बड़े मंदिरों में यह व्यवस्था पहले से लागू भी है। इससे आर्थिक पारदर्शिता भी बनी रहती है।
ड्रेस कोड और डिटेक्टर जरूरी
चारधाम मंदिर ट्रस्ट के संचालक महामंडलेश्वर शांति स्वरूपानंद ने भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाएं सनातन धर्म की छवि खराब करती हैं। इसलिए सभी बड़े मंदिरों में ड्रेस कोड लागू होना चाहिए। यह नियम कर्मचारियों और पुजारियों दोनों पर लागू होना चाहिए।
उन्होंने मेटल डिटेक्टर से जांच का सुझाव भी दिया। हर कर्मचारी की ड्यूटी पर आते समय जांच होनी चाहिए। ड्यूटी खत्म होने पर भी जांच जरूरी है। इससे चोरी और गड़बड़ी की आशंका पूरी तरह खत्म हो सकती है। उनका कहना था कि यह व्यवस्था हर बड़े मंदिर में जरूरी है।
आगे क्या हो सकता है बदला
दोनों संतों की राय से एक बात साफ है। मंदिरों में पारदर्शिता बढ़ाने की जरूरत महसूस की जा रही है। आने वाले समय में कई बड़े मंदिर ऐसे नियम अपना सकते हैं। कुछ राज्यों में मंदिर प्रबंधन पहले से इस पर काम कर रहे हैं। सरकार और मंदिर ट्रस्ट मिलकर नई गाइडलाइन भी बना सकते हैं। इससे श्रद्धालुओं का भरोसा और मजबूत होगा। साथ ही मंदिर प्रबंधन पर उठने वाले सवाल भी कम होंगे। धार्मिक स्थलों की साख बचाना अब सबकी जिम्मेदारी बन गई है।
क्यों अहम हैं दोनों संतों के सुझाव
महंत रवींद्र पुरी अखाड़ा परिषद जैसे बड़े संगठन के अध्यक्ष हैं। उनकी बात का सीधा असर देशभर के मंदिरों पर पड़ सकता है। महामंडलेश्वर शांति स्वरूपानंद भी धार्मिक क्षेत्र में जाना-पहचाना नाम हैं। दोनों संतों का अनुभव और प्रभाव काफी बड़ा माना जाता है। इसलिए उनके सुझावों को हल्के में नहीं लिया जा सकता। कई भक्त लंबे समय से मंदिरों में पारदर्शिता की मांग कर रहे थे। अब यह मांग संतों की जुबानी सामने आई है। इससे प्रशासन और मंदिर ट्रस्ट पर दबाव भी बढ़ सकता है। आने वाले दिनों में इस पर ठोस फैसला भी लिया जा सकता है।
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