दतिया सीट पर सियासी महासंग्राम, BJP की साख तो कांग्रेस की वापसी दांव पर
समझें क्या है पूरा मामला
- दतिया उपचुनाव भाजपा और कांग्रेस के लिए अहम है।
- दोनों दल मानसून सत्र बाद प्रचार तेज करेंगे।
- भाजपा ने जातीय समीकरणों पर रणनीति बनाई है।
- कांग्रेस भी सामाजिक समीकरण साधने में जुटी है।
- दतिया परिणाम प्रदेश राजनीति पर असर डालेगा।
बीजेपी-कांग्रेस दोनों की साख दांव पर
दतिया उपचुनाव अब सिर्फ एक विधानसभा सीट का चुनाव नहीं रह गया है। भाजपा के लिए यह सरकार और प्रदेश संगठन की साख बचाने की लड़ाई बन चुकी है, जबकि कांग्रेस इसे सत्ता को सीधी चुनौती देने का मौका मान रही है। मानसून सत्र खत्म होते ही दोनों दल अपने पूरे राजनीतिक कुनबे को मैदान में उतारने की तैयारी में हैं। अंदरखाने सबसे ज्यादा जोर जातीय समीकरणों को साधने पर है।
दतिया में अब 'वन टू वन' नहीं
नाम वापसी के बाद तस्वीर पूरी तरह साफ हो चुकी है। चुनाव मैदान में भले 21 उम्मीदवार हों, लेकिन असली मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच माना जा रहा है। अब दोनों दलों ने चुनाव को प्रतिष्ठा की लड़ाई बना दिया है। भाजपा के लिए यह सीट जीतना इसलिए जरूरी है क्योंकि हार का सीधा संदेश सरकार और प्रदेश संगठन की रणनीति पर जाएगा। वहीं कांग्रेस इसे सत्ता के खिलाफ माहौल बनाने का मौका मान रही है।
भाजपा के लिए सिर्फ सीट नहीं, नेतृत्व की परीक्षा
सूत्रों के अनुसार मानसून सत्र समाप्त होते ही मुख्यमंत्री, दोनों उपमुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद और संगठन के वरिष्ठ नेता दतिया में लगातार डेरा डालेंगे। पार्टी का मानना है कि यदि इस सीट पर अपेक्षित प्रदर्शन नहीं हुआ तो सवाल सिर्फ उम्मीदवार पर नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश नेतृत्व की चुनावी रणनीति पर उठेंगे। इसी वजह से प्रचार को पूरी तरह हाई कमान की प्राथमिकता में रखा गया है।
जाति के हिसाब से तैयार हुआ प्रचार का ब्लूप्रिंट
भाजपा ने प्रचार अभियान को सामाजिक समीकरणों के आधार पर बांट दिया है। हर बड़े समाज तक उसी वर्ग के प्रभावशाली नेता को भेजने की तैयारी है ताकि स्थानीय स्तर पर अधिक प्रभाव बनाया जा सके। पार्टी का पूरा फोकस ब्राह्मण, अनुसूचित जाति, कुशवाहा, यादव, लोधी, पाल और बघेल मतदाताओं पर है।
ब्राह्मण वोट सबसे बड़ी चुनौती
भाजपा की सबसे ज्यादा नजर ब्राह्मण वोट बैंक पर है। आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाए जाने के बाद पार्टी इस वर्ग में कोई जोखिम नहीं लेना चाहती। इसलिए ब्राह्मण समाज के बीच बड़े नेताओं की अलग अभियान योजना तैयार की गई है।
हर समाज के लिए अलग चेहरा
भाजपा ने अलग-अलग वर्गों के लिए अलग जिम्मेदारियां तय की हैं।
ब्राह्मण समाज : राजेंद्र शुक्ल, राकेश शुक्ल समेत वरिष्ठ नेता।
अनुसूचित जाति : जगदीश देवड़ा, तुलसी सिलावट, दिलीप अहिरवार।
कुशवाहा समाज : नारायण सिंह कुशवाह, भारत सिंह कुशवाह।
यादव, लोधी, पाल और बघेल समाज : डॉ. मोहन यादव, प्रह्लाद पटेल, धर्मेंद्र लोधी, एदल सिंह कंसाना समेत अन्य नेता।
कांग्रेस भी पीछे नहीं, सीधी टक्कर की तैयारी
भाजपा की सामाजिक रणनीति के जवाब में कांग्रेस भी अपने प्रभावशाली नेताओं को अलग-अलग वर्गों में सक्रिय करने की तैयारी कर रही है। पार्टी का लक्ष्य भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने के साथ स्थानीय असंतोष को राजनीतिक समर्थन में बदलना है।
असल लड़ाई वोट की नहीं, साख की
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दतिया का परिणाम सिर्फ एक विधायक नहीं चुनेगा। यह तय करेगा कि प्रदेश में सरकार और संगठन की चुनावी मशीनरी कितनी प्रभावी है और विपक्ष सरकार के खिलाफ कितना माहौल बना पाया। इसलिए दोनों दल इस चुनाव को प्रतिष्ठा की लड़ाई मानकर पूरी ताकत झोंक रहे हैं।
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