दतिया में बदले सारे समीकरण, नरोत्तम फैक्टर से घिरी बीजेपी, बढ़त से उत्साहित कांग्रेस
मध्य प्रदेश की दतिया सीट का यह उपचुनाव सिर्फ एक विधायक चुनने की कवायद नहीं, बल्कि मोहन यादव सरकार, बीजेपी के अंदरूनी झगड़े और कांग्रेस की गुटबाजी का एक साथ टेस्ट बन गया है। हालांकि अंतिम नतीजे आना बाकी हैं, लेकिन ताजा स्थिति के साथ पूरी कहानी समझिए।
अभी क्या हो रहा है
गिनती अभी जारी है और तस्वीर उलटफेर भरी रही है। पहले राउंड में बीजेपी के आशुतोष तिवारी करीब 900 वोट से आगे थे, लेकिन दूसरे राउंड से ही कांग्रेस के घनश्याम सिंह ने बढ़त बना ली और शुरुआती झटके के बाद वापसी करते हुए मुकाबला पलट दिया।
नौवें राउंड तक घनश्याम सिंह की बढ़त 9 हजार वोट से ज़्यादा हो चुकी थी, जबकि तिवारी शुरुआती बढ़त गंवाकर पिछड़ गए। कुल 15 राउंड में गिनती पूरी होनी है, तो अंतिम नतीजा अभी कुछ घंटे दूर है, पर रुझान फिलहाल कांग्रेस के पक्ष में झुके दिख रहे हैं।
दिलचस्प यह भी है कि इसी दिन गुजरात की मांजलपुर और बिहार की बांकीपुर सीट के नतीजे भी आ रहे हैं। यानी आज का दिन तीन राज्यों की सियासत के लिए एक साथ अहम है।
असली ड्रामा तो टिकट कटने से शुरू हुआ
दतिया की यह लड़ाई बीजेपी के लिए महीने भर पहले ही मुश्किल हो गई थी, जब पार्टी ने पूर्व गृहमंत्री और दतिया के दिग्गज नेता डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बना दिया। नतीजा- मिश्रा समर्थकों का गुस्सा सड़क पर फूट पड़ा। समर्थकों ने दतिया-झांसी हाईवे पर करीब 15-20 किलोमीटर लंबा जाम लगा दिया, और मामला इतना बिगड़ा कि पुलिस पर पथराव हुआ, कई पुलिसकर्मी घायल हुए।
विरोध सिर्फ कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं रहा- बीजेपी जिलाध्यक्ष समेत पूरी जिला कार्यकारिणी ने ही सामूहिक इस्तीफा दे दिया, यह कहते हुए कि यह फैसला केंद्रीय नेतृत्व ने एकतरफा लिया और पार्टी कार्यकर्ताओं का अपमान है।
खुद तिवारी ने इस असंतोष को शांत करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि मिश्रा उनके लिए अभिभावक समान हैं और मिश्रा ने खुद उनके पक्ष में प्रचार करने का भरोसा दिलाया है। लेकिन ज़मीन पर गुस्सा कितना असरदार साबित हुआ, यह आज की गिनती में ही साफ होगा।
कांग्रेस में भी शांति नहीं
यह सीट खाली ही इसलिए हुई थी क्योंकि कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती अयोग्य करार दिए गए थे। एक पुराने बैंक धोखाधड़ी मामले में सज़ा के बाद। लेकिन कांग्रेस ने आगे बढ़कर भारती को पार्टी से ही निलंबित कर दिया और गिनती से ठीक पहले भारती ने मौजूदा उम्मीदवार घनश्याम सिंह पर बीजेपी से मिलीभगत का आरोप जड़ दिया। साथ ही यह ऐलान भी किया कि 2028 के चुनाव में वे खुद मैदान में उतरेंगे। यानी नतीजा चाहे जो हो, दतिया की कांग्रेस राजनीति में आगे भी टकराव तय दिख रहा है।
सीएम मोहन यादव और MP का उपचुनाव इतिहास
मोहन यादव के मुख्यमंत्री बनने (दिसंबर 2023) के बाद यह तीसरा उपचुनाव है। पहले दो में स्कोर बराबरी का रहा। बुधनी में बीजेपी जीती, विजयपुर में कांग्रेस। दतिया का नतीजा इसलिए टाई-ब्रेकर जैसा है।
अगर आज बीजेपी दतिया चुनाव हार गई, जैसा कि अब आधे से ज्यादा राउंड की गिनती होने के बाद दिखने लगा है, तो वे मुख्यमंत्री बनने के बाद लगातार दूसरा उपचुनाव हार रहे हैं।
इससे पहले विजयपुर उपचुनाव में भी उनके नेतृत्व में लड़ी बीजेपी हार गई थी। वहां तो उनके मंत्रिमंडल के मंत्री हारे थे।
इसी के साथ एक तथ्य और स्थापित हो रहा है कि नरोत्तम का टिकट काटकर बीजेपी ने खुद अपने लिए कुआं खोदा। दूसरी तरफ नरोत्तम के समर्थकों ने जिस तरह रातभर नेशनल हाईवे जाम करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री मोहन यादव के खिलाफ गंदे-गंदे नारे लगाए और गालियां दीं, उसके बाद खुद उनके लिए और पूरी जिला कार्यकारिणी के लिए आने वाला समय काफी मुश्किलों से भरा हो सकता है। दतिया की राजनीति के दो सबसे बड़े नाम नरोत्तम मिश्रा और राजेंद्र भारती के लिए आगे की राजनीति क्या होगी, यह कहना मुश्किल है।
अगर कांग्रेस जीतती है तो प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के नेतृत्व की धाक जमना तय है। पूरे चुनाव में जीतू दतिया में ही डटे रहे। उन्होंने जिस तरह मेहनत की है, इससे पहले किसी उपचुनाव में किसी प्रदेश अध्यक्ष ने नहीं की।
52 उपचुनावों में बीजेपी का पलड़ा भारी
इधर लंबी अवधि में देखें तो पलड़ा बीजेपी की तरफ ही झुका रहा है। 2014 से अब तक मध्य प्रदेश में विधानसभा-लोकसभा मिलाकर हुए 52 उपचुनावों में बीजेपी का स्ट्राइक रेट 63% और कांग्रेस का 37% रहा है। एक और आंकड़ा दिलचस्प है। कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में गए नेताओं का उपचुनाव जीतने का रेट 70% से ऊपर रहा है, जो बताता है कि सत्ताधारी दल और "दल-बदल के बाद जीत" का पैटर्न MP में कितना मजबूत रहा है।
लेकिन दतिया का मामला उस पैटर्न से थोड़ा अलग है। यहां न तो कोई दल-बदलू उम्मीदवार है, न ही मुकाबला सिर्फ बीजेपी बनाम कांग्रेस भर का। यह पार्टी के अंदर के असंतोष, स्थानीय क्षत्रपों की नाराज़गी और संगठनात्मक टूट-फूट का भी टेस्ट है। और शायद यही वजह है कि नतीजा राउंड-दर-राउंड इतना उतार-चढ़ाव भरा रहा।
अगर आखिरी नतीजा भी कांग्रेस के पक्ष में गया, तो मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व में यह लगातार दूसरा उपचुनाव होगा, जो बीजेपी हारेगी और नरोत्तम मिश्रा गुट को यह कहने का मौका मिलेगा कि "टिकट काटने का नतीजा" यही था।
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