दतिया उपचुनाव: बसपा की चुप्पी बनी सबसे बड़ा सस्पेंस, तीसरी ताकत बिगाड़ सकती है खेल!
समझें क्या है पूरा मामला
- भाजपा ने आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया है।
- कांग्रेस ने घनश्याम सिंह को मैदान में उतारा है।
- बसपा ने इस चुनाव में प्रत्याशी नहीं उतारा।
- सपा ने कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन दिया है।
- बहुजन और ओबीसी वोट अहम भूमिका निभा सकते हैं।
भाजपा और कांग्रेस की सीधी लड़ाई
दतिया विधानसभा उपचुनाव को अब सिर्फ भाजपा और कांग्रेस की सीधी लड़ाई मानना जल्दबाजी हो सकती है। बसपा के चुनाव नहीं लड़ने से पैदा हुआ राजनीतिक खालीपन अब नई चुनावी रणनीति का केंद्र बन गया है। आजाद समाज पार्टी इसी खाली जगह को भरने की कोशिश कर रही है। यदि वह बहुजन और ओबीसी वोटों का एक हिस्सा भी अपने पक्ष में खींच लेती है तो दोनों प्रमुख दलों का चुनावी गणित प्रभावित हो सकता है।
बसपा की गैरमौजूदगी क्यों बनी सबसे बड़ा सवाल?
दतिया में बसपा का वर्षों से अपना वोट बैंक रहा है। इस बार पार्टी के चुनाव नहीं लड़ने से उसके समर्थक मतदाता किस ओर जाएंगे, यही सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल बन गया है। इसी वजह से आजाद समाज पार्टी खुद को बसपा का विकल्प बताकर चुनाव प्रचार कर रही है।
दामोदर यादव किस रणनीति पर काम कर रहे हैं?
आजाद समाज पार्टी के उम्मीदवार दामोदर यादव गांव-गांव संपर्क अभियान चला रहे हैं। उनका पूरा फोकस बहुजन, पिछड़ा वर्ग और युवाओं पर है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि उन्हें 8 से 15 हजार वोट भी मिलते हैं तो मुकाबले का परिणाम प्रभावित हो सकता है।
भाजपा की सबसे बड़ी कोशिश क्या है?
भाजपा परंपरागत सवर्ण वोटों के साथ ओबीसी वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखना चाहती है। पार्टी बूथ स्तर तक सक्रिय है और सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों के जरिए समर्थन मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है।
कांग्रेस किस उम्मीद पर लड़ रही है?
कांग्रेस को भरोसा है कि सपा के समर्थन और बसपा के चुनाव नहीं लड़ने का फायदा उसे मिल सकता है। पार्टी दलित, पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम मतदाताओं को अपने पक्ष में लामबंद करने की कोशिश कर रही है।
दतिया में बसपा का पुराना रिकॉर्ड क्यों अहम है?
दतिया में बसपा पहले भी मजबूत प्रदर्शन करती रही है। वर्ष 2008 के विधानसभा चुनाव में पार्टी दूसरे स्थान पर रही थी और उसे 44 हजार से ज्यादा वोट मिले थे। इसके बाद भी बसपा का वोट प्रतिशत सम्मानजनक बना रहा। यही वजह है कि उसके वोटों को लेकर सबसे ज्यादा राजनीतिक चर्चा हो रही है।
जातीय समीकरण बदलने से मुकाबला भी बदला
इस बार भाजपा और कांग्रेस दोनों ने सामान्य वर्ग के उम्मीदवार उतारे हैं। ऐसे में ओबीसी और अनुसूचित जाति मतदाताओं की भूमिका पहले से अधिक महत्वपूर्ण मानी जा रही है। खासकर कुशवाहा, यादव और अन्य पिछड़ा वर्ग के वोट परिणाम पर असर डाल सकते हैं।
अनुमानित जातीय गणित
- ओबीसी: 95 हजार से 1.05 लाख
- अनुसूचित जाति: 52 से 58 हजार
- ब्राह्मण: 18 से 20 हजार
- ठाकुर: 16 से 18 हजार
- वैश्य: 10 से 12 हजार
- अन्य सामान्य वर्ग: 25 से 30 हजार
- मुस्लिम: 9 से 11 हजार
- अन्य: 15 से 20 हजार
- ओबीसी में प्रमुख समाज
- कुशवाहा/शाक्य/मौर्य: 30 से 35 हजार
- यादव: 12 से 15 हजार
बसपा का पारंपरिक वोट किधर जाएगा
दतिया उपचुनाव में मुकाबला सिर्फ भाजपा और कांग्रेस के बीच नहीं रह गया है। असली चुनौती यह है कि बसपा का पारंपरिक वोट आखिर किस ओर जाएगा। यदि यह वोट पूरी तरह किसी एक दल के साथ नहीं जाता और उसका बड़ा हिस्सा आजाद समाज पार्टी की ओर मुड़ता है तो चुनाव परिणाम में बड़ा उलटफेर देखने को मिल सकता है। इसलिए इस बार उम्मीदवारों से ज्यादा चर्चा वोट ट्रांसफर की हो रही है।
ये भी पढ़ें...
दतिया उपचुनाव: कांग्रेस ने उतारा डमी कैंडिडेट, मीनाक्षी नटराजन मामले से लिया सबक
दतिया उपचुनाव: घनश्याम सिंह 20 करोड़ के मालिक, आशुतोष तिवारी से हैं 11 गुना अमीर
दतिया उपचुनाव: भाजपा के बाद कांग्रेस का भी दांव, स्टार प्रचारकों की फौज उतारी
दतिया उपचुनाव में कांग्रेस को मिला सपा का साथ, घनश्याम सिंह ने भरा नामांकन