अपने ही बूथ नहीं बचा सके पूर्व गृहमंत्री-जिलाध्यक्ष! दतिया में BJP को भीतरघात ने डुबोया?
ऐसे समझें क्या है पूरा मामला...
- दतिया में कांग्रेस 12 हजार से अधिक वोटों से आगे।
- नरोत्तम मिश्रा अपने बूथ पर भाजपा को बढ़त नहीं दिला सके।
- भाजपा जिलाध्यक्ष रघुवीर सिंह कुशवाहा भी पिछड़े।
- भीतरघात और गुटबाजी पर भाजपा में मंथन शुरू।
- चुनाव प्रबंधन को लेकर संगठन पर उठे सवाल।
दतिया उपचुनाव के रुझानों ने भाजपा के भीतर कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि पार्टी के सबसे प्रभावशाली चेहरों में शामिल पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा अपने ही पोलिंग बूथ पर बढ़त नहीं दिला सके।
वहीं भाजपा जिलाध्यक्ष रघुवीर सिंह कुशवाहा भी अपने बूथ पर पार्टी को जीत नहीं दिला पाए। ऐसे में चर्चा केवल हार की नहीं, बल्कि संगठन के भीतर संभावित अंदरूनी असंतोष और चुनावी रणनीति की भी होने लगी है।
दतिया की हार ने भाजपा संगठन की असली परीक्षा खोल दी
करीब 12 राउंड की मतगणना के बाद कांग्रेस प्रत्याशी घनश्याम सिंह 12 हजार से अधिक वोटों की बढ़त बना चुके हैं। यदि यही रुझान परिणाम में बदलता है तो यह केवल चुनावी हार नहीं, बल्कि भाजपा के संगठन और चुनाव प्रबंधन पर बड़ा सवाल होगा।
सबसे बड़ा झटका-अपने बूथ पर ही नहीं मिली बढ़त
राजनीति में माना जाता है कि किसी भी बड़े नेता की पहली ताकत उसका अपना पोलिंग बूथ होता है, लेकिन दतिया में तस्वीर उलट दिखाई दी।
पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा अपने बूथ पर पार्टी को निर्णायक बढ़त नहीं दिला सके। दूसरी ओर भाजपा जिलाध्यक्ष रघुवीर सिंह कुशवाहा भी अपने पोलिंग बूथ पर पार्टी का प्रदर्शन मजबूत नहीं कर पाए। यही तथ्य अब भाजपा के भीतर सबसे बड़ी चर्चा का विषय बन गया है।
कांग्रेस ने 'विभीषण' पहचाना, भाजपा तलाश में?
चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस ने खुलकर अपने भीतरघात पर कार्रवाई की और अनुशासनात्मक कदम उठाए। वहीं, भाजपा में लगातार अंदरूनी असंतोष और कथित गुटबाजी की चर्चाएं होती रहीं, लेकिन किसी भी नेता के खिलाफ खुली कार्रवाई सामने नहीं आई। अब चुनावी रुझानों के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या भाजपा भीतरघात को समय रहते पहचान नहीं सकी?
सत्ता और संगठन दोनों पर बढ़ा दबाव
दतिया के रुझानों ने सत्ता और संगठन दोनों की रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि पार्टी अपने सबसे प्रभावशाली नेताओं के बूथ पर भी अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सकी तो आने वाले समय में इसकी समीक्षा केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रहेगी।
हार का ठीकरा किस पर फूटेगा, यह फैसला परिणाम के बाद होगा, लेकिन फिलहाल संगठन के भीतर बेचैनी साफ दिखाई दे रही है।
अब सबसे बड़ा सवाल...
- 12 राउंड के बाद कांग्रेस 12 हजार से अधिक वोटों से आगे।
- पूर्व गृहमंत्री अपने बूथ पर बढ़त नहीं दिला सके।
- भाजपा जिलाध्यक्ष भी अपने पोलिंग बूथ पर पिछड़ गए।
- भीतरघात या कमजोर बूथ प्रबंधन-सबसे बड़ा सवाल।
- भाजपा संगठन की रणनीति पर गंभीर चर्चा शुरू।
- हार की स्थिति में जवाबदेही किसकी तय होगी?
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