डिप्टी कलेक्टरों की सीनियरिटी लिस्ट पर विवाद, एमपी हाईकोर्ट ने पलटा फैसला
समझें क्या है पूरा मामला
- एमपी हाईकोर्ट ने डिप्टी कलेक्टरों की वरिष्ठता सूची में बदलाव को रद्द किया।
- 2008 बैच अधिकारियों की सीनियरिटी बिना सुनवाई बदली गई थी।
- वेटिंग लिस्ट से नियुक्त अधिकारी को मुख्य सूची से सीनियर बनाया गया।
- जस्टिस विशाल धगट ने 2019, 2020 के आदेश निरस्त कर दिए।
- अब 30 दिन में सुनवाई के बाद नई सूची जारी होगी।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 2008 बैच के डिप्टी कलेक्टरों (Deputy Collector) की वरिष्ठता सूची में हुए बदलाव को गलत ठहराया है। कोर्ट ने साफ कहा कि किसी अधिकारी की सेवा शर्तें बिना सुनवाई नहीं बदली जा सकती है। यह फैसला कई अधिकारियों के करियर के लिए बड़ी राहत लेकर आया है। मामला दस साल पुराना है, फिर भी इसका असर आज तक बना हुआ है।
वरिष्ठता विवाद
जस्टिस विशाल धगट ने 2019 और 2020 में जारी दोनों सरकारी आदेश रद्द कर दिए हैं। इन आदेशों में वेटिंग लिस्ट यानी प्रतीक्षा सूची से नियुक्त अधिकारी को मुख्य मेरिट सूची के अधिकारियों से वरिष्ठ बताया गया था। कोर्ट ने कहा कि ऐसा फैसला लेने से पहले सभी पक्षों को सुना जाना चाहिए था। यह प्रक्रिया पूरी तरह गलत तरीके से अपनाई गई।
2008 बैच का मामला
याचिकाकर्ताओं में कृष्ण कुमार रावत, महेताब सिंह गुर्जर, नेहा भारतीय, सुरभि तिवारी और अतेन्द्र सिंह गुर्जर शामिल हैं। इन सभी का चयन मुख्य मेरिट सूची से हुआ था। इन्होंने 2008 में ही नौकरी जॉइन कर ली थी। सभी ने अपना प्रोबेशन यानी परिवीक्षा काल भी पूरा किया।
दूसरी ओर तेजस्वी महीप का नाम शुरू में वेटिंग लिस्ट में था। मुख्य सूची के एक उम्मीदवार ने जॉइन नहीं किया। इसी वजह से महीप को 2010 में नियुक्ति मिल गई। उन्हें उस समय 2010 बैच आवंटित किया गया था। यह व्यवस्था कई साल तक बिना किसी विवाद के चली।
अचानक बदली सीनियरिटी
साल 2019 तक वरिष्ठता की यही स्थिति बनी रही। इसके बाद शासन ने तेजस्वी महीप के एक आवेदन पर फैसला लिया। एमपी सरकार ने बिना किसी दूसरे पक्ष को सुने उनकी वरिष्ठता बढ़ा दी। महीप को मुख्य सूची के अधिकारियों से भी ऊपर कर दिया गया। इस फैसले से 2008 बैच के मूल अधिकारी हैरान रह गए। उन्हें इस बदलाव की जानकारी तक पहले नहीं दी गई थी।
वकील की दलील
याचिकाकर्ताओं के वकील अमित सिंह ने MP High Courtमें मजबूती से पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि मेरिट सूची में दस साल बाद बदलाव करना पूरी तरह गलत है। इतने साल बाद वरिष्ठता में छेड़छाड़ अधिकारियों के अधिकार का हनन है। वकील ने कोर्ट से आदेश रद्द करने की मांग की थी।
कोर्ट का रुख साफ रहा। जस्टिस धगट ने कहा कि प्रशासनिक फैसले पारदर्शी तरीके से लिए जाने चाहिए। किसी अधिकारी की सेवा शर्तें प्रभावित करने से पहले उसका पक्ष सुनना जरूरी है। यह प्राकृतिक न्याय का बुनियादी सिद्धांत है।
अब आगे क्या होगा
हाईकोर्ट ने सरकार को 2019 और 2020 के दोनों आदेश रद्द करने का निर्देश दिया है। साथ ही अगले 30 दिन में नई सूची जारी करने को कहा गया है। इस बार सभी पक्षों को सुनवाई का मौका दिया जाएगा। इसके बाद ही नई वरिष्ठता सूची तैयार होगी।
यह फैसला केवल पांच अधिकारियों तक सीमित नहीं है। यह प्रशासनिक सेवा में पारदर्शिता को लेकर एक बड़ा संकेत है। सरकारी विभागों को अब सेवा से जुड़े फैसले लेने में सावधानी बरतनी होगी। बिना सुनवाई के फैसले लेना अब आसान नहीं रहेगा।
अधिकारियों में इस फैसले से राहत का माहौल है। कई अधिकारी लंबे समय से इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठा रहे थे। अब उन्हें उम्मीद है कि नई सूची में उनका हक मिलेगा। प्रशासनिक हलकों में भी इस फैसले की चर्चा हो रही है।
FAQ
- सवाल: एमपी हाईकोर्ट ने डिप्टी कलेक्टरों के मामले में क्या फैसला दिया?
जवाब: एमपी हाईकोर्ट ने 2019 और 2020 के उन सरकारी आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें वेटिंग लिस्ट से नियुक्त अधिकारी को मुख्य मेरिट सूची के अधिकारियों से वरिष्ठ बनाया गया था। कोर्ट ने 30 दिन में नई सूची जारी करने को कहा है।
ये खबरें भी पढ़ें...
नो सात फेरे, नो वैलिड शादी: मैरिज रजिस्ट्रेशन पर गुजरात हाईकोर्ट सख्त
बंद करो 70,80,90% वेतन की नौटंकी, प्रोबेशन में कम वेतन देना गलत, हाईकोर्ट ने लगाई फटकार
बॉम्बे हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, नागरिकों को गुलाम नहीं बना सकती सरकार
सीमांकन रिपोर्ट देने में देरी पर हाईकोर्ट सख्त, तहसीलदार को 15 दिन की मोहलत