कमर्शियल टैक्स के डिप्टी कमिश्नर पर लगे रेप आरोपों में बड़ा उलटफेर, हाईकोर्ट ने 10 साल की सजा रद्द कर किया बरी
News In Short
- डिप्टी कमिश्नर पर महिला असिस्टेंट कमिश्नर ने आरोप लगाए थे।
- भोपाल जिला अदालत ने सुनाई थी 10 साल की सजा और 12 हजार जुर्माना लगाया था।
- विशेष न्यायाधीश (ओएडब्ल्यू) पल्लवी द्विवेदी ने फैसला दिया था।
- हाईकोर्ट ने साक्ष्यों में विरोधाभास पाकर सजा रद्द की थी।
- हाईकोर्ट ने माना - संबंध सहमति पर आधारित थे।
News In Detail
यह मामला उस समय चर्चा में आया जब नोएडा के वाणिज्यिक कर विभाग में पदस्थ डिप्टी कमिश्नर पंकज कुमार सिंह पर उसी विभाग की एक महिला असिस्टेंट कमिश्नर ने रेप और मारपीट के आरोप लगाए थे। दोनों अधिकारी एक ही विभाग में कार्यरत थे और उनकी पहचान सालों पुरानी बताई गई।
महिला अधिकारी ने आरोप लगाया कि आरोपी ने अपने पद और रिश्तों का गलत इस्तेमाल करते हुए उसके साथ जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाए। इसके बाद उसने वीडियो के जरिए उसे ब्लैकमेल किया और बार-बार उसके साथ रेप किया। इस मामले में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी पर लगे गंभीर आरोपों के कारण ये मामला खूब चर्चा में आया था।
क्या था पूरा घटनाक्रम, भोपाल कनेक्शन कैसे जुड़ा?
कथित पीड़िता के अनुसार, घटनाओं की शुरुआत साल 2010 में हुई जब दोनों नोएडा में पदस्थ थे। उसने आरोप लगाया कि आरोपी ने उसे अपनी मां से मिलने के बहाने घर बुलवाया था। अपने घर बुलाकर दुष्कर्म किया और कथित तौर पर वीडियो बनाकर उसे ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया।
इसके बाद कई सालों तक शोषण का सिलसिला चलता रहा। अगस्त 2018 में जब महिला भोपाल एक स्कूल रीयूनियन कार्यक्रम में शामिल होने आई, तब आरोपी भी वहां पहुंच गया।
महिला का आरोप था कि आरोपी ने होटल के कमरे में घुसकर उसके साथ दुष्कर्म किया। इसके बाद उसने एयरपोर्ट से भी उसे जबरन दूसरे होटल ले जाकर धमकी दी और मारपीट की। किसी तरह महिला आरोपी के चंगुल से बचकर पुलिस के पास पहुंची और शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद मामला कानूनी तौर पर आगे बढ़ा।
ट्रायल कोर्ट ने दी थी 10 साल की सजा
भोपाल जिला अदालत ने इस मामले की सुनवाई के बाद आरोपी को दोषी मानते हुए कड़ा फैसला सुनाया था। विशेष न्यायाधीश (ओएडब्ल्यू) पल्लवी द्विवेदी की अदालत ने पंकज कुमार सिंह को दुष्कर्म और मारपीट के आरोपों में दोषी ठहराते हुए 10 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी।
इसके साथ ही अदालत ने उन पर कुल 12 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया था। ट्रायल कोर्ट ने अपने फैसले में पीड़िता के बयानों को विश्वसनीय मानते हुए यह निष्कर्ष निकाला था कि आरोपी ने उसके साथ गंभीर अपराध किया है, जिसके लिए कठोर दंड जरूरी है।
पंकज सिंह ने हाईकोर्ट में दायर की अपील
जब मामला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट पहुंचा, तो वहां साक्ष्यों और गवाहों का परीक्षण किया गया। इस दौरान कई ऐसे तथ्य सामने आए, जिन्होंने ट्रायल कोर्ट के फैसले और निष्कर्षों पर सवाल खड़े कर दिए।
होटल कर्मचारियों ने अपने बयानों में कहा कि दोनों होटल में सामान्य तरीके से रह रहे थे और उनके व्यवहार में किसी तरह का तनाव या दबाव दिखाई नहीं दे रहा था। यह भी सामने आया कि होटल में रुकने के लिए रजिस्टर एंट्री जैसी फॉर्मेलिटी भी स्वयं महिला अधिकारी ने पूरी की थीं।
उसने आरोपी के साथ रहने पर कोई आपत्ति नहीं जताई थी। इसके साथ ही वह लगातार आरोपों के साथ घूमती फिरती रही और एक ज्वेलर्स के यहां से मंगलसूत्र भी खरीदा था। इन परिस्थितियों ने कोर्ट को यह सोचने पर मजबूर किया कि घटनाक्रम में सहमति की संभावना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
मेडिकल और जांच रिपोर्ट ने किए खुलासे
मेडिकल जांच में भी ऐसे ठोस साक्ष्य सामने नहीं आए जो गंभीर मारपीट या जबरन दुष्कर्म के आरोपों की पुष्टि कर सकें। रिपोर्ट में केवल मामूली चोटों का उल्लेख था, जबकि पीड़िता ने अपने बयान में गंभीर चोटों और हमले का जिक्र किया था।
इसके अलावा जांच अधिकारी ने भी अदालत में यह माना कि दोनों के बीच लंबे समय से संबंध थे, जो सहमति पर आधारित प्रतीत होते हैं। इस तरह मेडिकल और जांच संबंधी तथ्यों ने भी अभियोजन के पक्ष को कमजोर किया।
पंकज सिंह का नंबर महिला के नाम से सेव किया था
मामले की सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि महिला ने आरोपी का नंबर अलग नाम से सेव कर रखा था। साथ ही अपने पति से लगातार संपर्क में रहने के बावजूद उसने किसी तरह की प्रताड़ना का जिक्र नहीं किया।
हाईकोर्ट ने इस बात पर खास ध्यान दिया कि पीड़िता के बयानों में समय के साथ कई बदलाव आए और कुछ नई घटनाओं का जिक्र किया गया, जो पहले की शिकायत में नहीं थीं।
उसने यह भी माना कि जिस वीडियो के आधार पर ब्लैकमेलिंग का आरोप लगाया गया, उसे उसने कभी खुद नहीं देखा। इन सब हालात ने अदालत के सामने उसकी गवाही की सच्चाई पर सवाल खड़ा कर दिया।
तकनीकी साक्ष्य भी नहीं टिक पाए
मामले में प्रस्तुत किए गए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य भी अदालत को संतुष्ट नहीं कर सके। व्हाट्सएप संदेशों के समर्थन में प्रस्तुत धारा 65B का प्रमाण पत्र तकनीकी रूप से कमजोर पाया गया।
अदालत ने माना कि जब साक्ष्य की प्रमाणिकता ही स्पष्ट नहीं है, तो उसे आधार बनाकर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती। इस कारण डिजिटल साक्ष्य भी अभियोजन के पक्ष में मजबूत भूमिका नहीं निभा सके।
केवल बयान के आधार पर नहीं हो सकता गंभीर मामलों में फैसला
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में साफ किया कि दुष्कर्म जैसे गंभीर मामलों में केवल आरोप पर्याप्त नहीं होते, बल्कि गवाही और साक्ष्य दोनों ही बेहद विश्वसनीय और सुसंगत होने चाहिए।
इस मामले में पीड़िता की गवाही उस स्तर की नहीं पाई गई, जिसे बिना किसी संदेह के स्वीकार किया जा सके। परिस्थितिजन्य साक्ष्यों और गवाहों के बयानों ने भी सहमति के पहलू को मजबूत किया, जिससे अभियोजन की पूरी कहानी कमजोर पड़ गई।
अंतिम फैसला: सजा रद्द, आरोपी बरी
सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला निरस्त कर दिया और डिप्टी कमिश्नर पंकज कुमार सिंह को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि यदि आरोपी ने कोई जुर्माना जमा किया है तो उसे वापस किया जाए। यह फैसला एक बार फिर यह दर्शाता है कि न्यायालय साक्ष्यों की कसौटी पर ही निर्णय करता है और यदि संदेह की स्थिति उत्पन्न होती है, तो उसका लाभ आरोपी को दिया जाता है।
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