एमपी की देवास टेकरी, यहां गिरा था मां सती का रक्त, जानें दो देवियों की अनूठी कहानी
Dewas Tekri: मध्यप्रदेश का देवास शहर अपनी धार्मिक पहचान के लिए विश्व प्रसिद्ध है। नवरात्रि के समय यहां भक्तों की भारी भीड़ जमा होती है। इस शहर का नाम दो देवियों के वास के कारण देवास पड़ा है। प्राचीन समय में लोग इस पावन स्थान को देववासिनी कहते थे।
यहां एक छोटी पहाड़ी है जिसे टेकरी के नाम से जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, इस टेकरी पर माता सती के रक्त की बूंदें गिरी थीं। इसी कारण इसे एक सिद्ध रक्त पीठ माना जाता है।
सदियों से ये स्थान नाथ संप्रदाय और मालवा के राजवंशों की आस्था का केंद्र रहा है। यहां माता दिन में तीन बार अपने स्वरूप बदलती हैं, जिसे देखना एक दिव्य अनुभव है।
बड़ी मां और छोटी मां की अनोखी लोककथा
मान्यताओं के मुताबिक, टेकरी पर विराजित देवियों को बड़ी मां और छोटी मां कहते हैं। बड़ी मां तुलजा भवानी हैं और छोटी मां चामुंडा देवी हैं। लोकमान्यता है कि प्राचीन समय में दोनों बहनों में विवाद हुआ था।
क्रोध में आकर दोनों माताएं अपना स्थान छोड़कर जाने लगी थीं। बड़ी मां पाताल में समाने लगीं और छोटी मां नीचे उतरने लगीं। तब हनुमान जी और भैरव बाबा ने उनसे रुकने की विनती की। इस कारण बड़ी मां का आधा धड़ आज भी पाताल में है।
स्वयंभू मूर्तियों की तपोभूमि
यहां की मूर्तियां स्वयंभू हैं और हजारों वर्षों से पूजी जा रही हैं। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, यह स्थान नाथ और दसनामी संप्रदाय का मुख्य शक्तिपीठ माना जाता है। गुरु गोरखनाथ और राजा भर्तृहरि ने यहां घोर तपस्या की थी।
सम्राट विक्रमादित्य और पृथ्वीराज चौहान भी यहां माथा टेक चुके हैं। राजा भर्तृहरि की गुफा आज भी यहां आस्था का केंद्र है। शीलनाथ महाराज और देवनारायण जी ने भी यहां साधना की थी। यह टेकरी सिद्ध पुरुषों की दिव्य ऊर्जा से ओतप्रोत है।
होलकर और पंवार राजवंशों की कुलदेवी
देवास में ऐतिहासिक रूप से दो राजवंशों ने शासन किया था। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, बड़ी मां तुलजा भवानी होलकर राजवंश की कुलदेवी मानी जाती हैं। वहीं छोटी मां चामुंडा देवी पंवार राजवंश की कुलदेवी हैं।
राज परिवार आज भी अष्टमी और नवमी पर विशेष पूजन करता है। वर्तमान मंदिर का निर्माण इन्हीं राजवंशों द्वारा करवाया गया था। मराठा शासकों की गहरी आस्था इस शक्तिपीठ से जुड़ी हुई है। महाराष्ट्र के तुलजापुर से भी इस स्थान का गहरा संबंध है।
संतान प्राप्ति की मान्यता
भक्तों का मानना है कि माता दिन में तीन रूप बदलती हैं। सुबह वे बाल स्वरूप और दोपहर में युवा स्वरूप दिखती हैं। रात के समय माता वृद्धावस्था के स्वरूप में नजर आती हैं।
संतान प्राप्ति के लिए यहां एक विशेष धार्मिक मान्यता प्रचलित है। श्रद्धालु लगातार पांच दिनों तक माता को पान का बीड़ा चढ़ाते हैं। साथ ही मंदिर की दीवार पर उल्टा स्वास्तिक (सातिया) बनाया जाता है। मन्नत पूरी होने पर स्वास्तिक को सीधा किया जाता है।
दर्शन करने का सही नियम
टेकरी पर दर्शन करने का एक विशेष और प्राचीन नियम है। नियम के मुताबिक, भक्तों को सबसे पहले माता तुलजा भवानी के दर्शन करने चाहिए। फिर भैरव बाबा और बजरंगबली के दर्शन का विधान बताया गया है।
इसके बाद कालिका माता और अन्नपूर्णा माता के दर्शन होते हैं। अंत में भक्त माता चामुंडा यानी छोटी मां के पास पहुंचते हैं। सीढ़ियों से जाने पर चामुंडा माता का मंदिर पहले आता है। परंतु नियम के मुताबिक परिक्रमा मार्ग से ही आगे बढ़ना चाहिए।
कैसे पहुंचें देवास टेकरी
देवास पहुंचने के लिए सड़क और रेल मार्ग बहुत सुगम हैं। ये शहर इंदौर और उज्जैन से मात्र 30 किलोमीटर दूर है। इंदौर का हवाई अड्डा यहां का सबसे नजदीकी एयरपोर्ट है।
आगरा-मुंबई राष्ट्रीय राजमार्ग सीधे माता की टेकरी के नीचे से गुजरता है। भक्त बस, टैक्सी या ट्रेन से आसानी से यहां पहुंच सकते हैं। नवरात्रि के समय यहां भक्तों की भारी भीड़ जमा होती है। प्रशासन द्वारा यात्रियों के लिए विशेष इंतजाम किए जाते हैं।
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