हाईकोर्ट के फैसले के बाद धार भोजशाला में हुई मां वाग्देवी की पहली पूजा
समझें क्या है पूरा मामला
- इंदौर हाईकोर्ट ने 15 मई को धार की विवादित भोजशाला पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया।
- अदालत ने कहा कि भोजशाला मूल रूप से मां सरस्वती का मंदिर है।
- यह फैसला एएसआई की वैज्ञानिक सर्वे रिपोर्ट और सबूतों के आधार पर आया।
- कोर्ट ने माना कि वर्तमान ढांचे में पुराने मंदिर के खंभों का उपयोग हुआ।
- फैसले के तुरंत बाद हिंदू समुदाय ने वहां सुबह की पूजा शुरू कर दी है।
धार भोजशाला में गूंजे मंत्र
कल 15 मई को मध्यप्रदेश के धार जिले के लिए सुबह की पहली किरण खुशियां लेकर आई। सालों से जिस पल का इंतजार था, वह कल (15 मई) हाईकोर्ट के फैसले से पूरा हुआ। इंदौर हाईकोर्ट के फैसले के बाद भोजशाला में आज (16 मई) सुबह से ही पूजा शुरू हो गई है। बड़ी संख्या में लोग वाग्देवी के दर्शन करने पहुंच रहे हैं। हर तरफ भक्ति का माहौल है और मंत्रों की गूंज सुनाई दे रही है। प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े पहरे लगाए हैं ताकि श्रद्धालु शांति के साथ दर्शन और पूजन कर सकें।
इंदौर हाईकोर्ट ने क्या फैसला सुनाया
कल (15 मई) इंदौर हाईकोर्ट ने धार की भोजशाला को लेकर स्थिति साफ कर दी। कोर्ट ने भोजशाला को देवी सरस्वती का प्राचीन मंदिर माना। न्यायाधीशों ने कहा कि ये कोई मस्जिद नहीं है। कोर्ट ने कहा कि मस्जिद के लिए अलग से जमीन अलॉट की जाएगी। बेंच ने यह भी कहा कि एएसआई (ASI survey in Bhojshala) का इसमें पूरा कंट्रोल और मॉनिटरिंग रहेगी। वह 1958 एक्ट के तहत इसे संभालेगा। यहां वाग्देवी की प्रतिमा को लाकर स्थापित करने के लिए भी केंद्र सरकार द्वारा कदम उठा जाएं। इन सभी की मांग हिंदू फ्रंट और कुलदीप तिवारी की याचिका में थी।
ASI की रिपोर्ट बनी आधार
हाईकोर्ट के इस फैसले का आधार एएसआई की 2100 पन्नों की रिपोर्ट बनी। इसके लिए 98 दिन तक परिसर का वैज्ञानिक तरीके से सर्वे हुआ था। हाईकोर्ट ने फैसले में लिखा कि इस सर्वे की रिपोर्ट में कई तथ्य सामने आए हैं, जो वैज्ञानिक तरीके से हुआ था।
इसमें बताया गया है कि राजा भोज के समय पर बनी संरचना है। इस संबंध में कई तथ्य सामने आए हैं। भोजशाला को भले ही हिंदुओं की माना गया है, लेकिन मॉनिटरिंग और पूरा कंट्रोल एएसआई को दिया गया है। साथ ही प्रशासन को अन्य व्यवस्थाएं करने के लिए कहा गया है।
एएसआई की रिपोर्ट में क्या सच सामने आया
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (Archaeological Survey of India) ने यहां गहराई से जांच की थी। उन्होंने जमीन के नीचे जीपीआर सर्वे और खुदाई भी की। इस रिपोर्ट को हाईकोर्ट ने बहुत ज्यादा महत्व दिया है। रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।
भोजशाला में ASI सर्वे में पता चला कि वर्तमान ढांचा पुराने मंदिर के अवशेषों पर टिका है। मस्जिद बनाने के लिए मंदिर के खंभों और मूर्तियों को तोड़ा गया। खंभों पर आज भी प्राचीन हिंदू कलाकृतियां और संस्कृत के श्लोक मौजूद हैं।
विशेषज्ञों ने पाया कि मंदिर की बीम और खिड़कियों को बदला गया। पत्थरों को काटकर उनके मूल स्वरूप को छिपाने की कोशिश हुई। लेकिन वैज्ञानिक जांच ने सच सबके सामने लाकर रख दिया है।
एमपी की भोजशाला का इतिहास
वाग्देवी शब्द दो सुंदर शब्दों के मेल से बना है। 'वाक्' का मतलब वाणी और 'देवी' का अर्थ ईश्वरीय शक्ति है। यानी वाग्देवी का सीधा अर्थ 'वाणी की देवी' होता है। इन्हें हम मां सरस्वती के रूप में पूजते हैं।
शास्त्रों के मुताबिक वे ज्ञान, बुद्धि और कला की अधिष्ठात्री हैं। उनका स्वरूप सफेद वस्त्रों में बहुत शांत और दिव्य होता है। वे कमल पर विराजमान होकर सत्य का मार्ग दिखाती हैं। भोजशाला प्राचीन काल में संस्कृत की पढ़ाई का बड़ा केंद्र था।
वहां मां सरस्वती की विशेष साधना और अध्ययन किया जाता था। राजा भोज ने इसे विद्या के मंदिर के रूप में स्थापित किया था। इस फैसले ने उसी प्राचीन गौरव को वापस लौटाया है। श्रद्धालु इसे अपनी संस्कृति की पुनर्स्थापना मान रहे हैं।
FAQ
- इंदौर हाईकोर्ट ने भोजशाला के बारे में अपने फैसले में मुख्य आधार किसे माना?
इंदौर हाईकोर्ट ने अपने फैसले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की वैज्ञानिक रिपोर्ट को सबसे बड़ा आधार माना है। कोर्ट ने कहा कि एएसआई एक विशेषज्ञ संस्था है और उसकी रिपोर्ट को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। रिपोर्ट में मिले संस्कृत शिलालेख, खंभों पर उकेरी गई आकृतियां और मंदिर के स्थापत्य अवशेषों ने साबित किया कि यह मूल रूप से एक हिंदू मंदिर था। कोर्ट ने आस्था के साथ-साथ इन ठोस पुरातात्विक साक्ष्यों को न्याय का आधार बनाया। - एएसआई सर्वे के दौरान भोजशाला परिसर में कौन-कौन से मंदिर के अवशेष मिले थे?
एएसआई के वैज्ञानिक सर्वे और खुदाई के दौरान भोजशाला में पुरानी मंदिर संरचना के कई हिस्से मिले। रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान ढांचे के नीचे एक प्राचीन विशाल संरचना के अवशेष मौजूद हैं। वहां पुराने नक्काशीदार खंभे, मूर्तियां, बीम और खिड़कियां मिली हैं जिन्हें विकृत किया गया था। सबसे खास बात यह कि वहां कई पत्थर और दीवारें मिलीं जिन पर संस्कृत में श्लोक लिखे हुए थे, जो स्पष्ट करते हैं कि यह स्थान शिक्षा और सरस्वती उपासना का केंद्र था। - क्या अब भोजशाला में नियमित रूप से पूजा-अर्चना की अनुमति मिल गई है?
हां, इंदौर हाईकोर्ट के ताजा फैसले ने भोजशाला को वाग्देवी का मंदिर मानते हुए हिंदू पक्ष के पूजा के अनुमति मिली है । फैसले के बाद आज सुबह से ही हिंदू समुदाय के लोगों ने वहां पहुंचकर पूजा-अर्चना और आरती शुरू कर दी है। कोर्ट ने माना कि इस स्थल का ऐतिहासिक स्वरूप मंदिर का रहा है, इसलिए वहां की पूजा परंपरा की निरंतरता बनी रहनी चाहिए। अब सुरक्षा के बीच श्रद्धालु वहां मां सरस्वती की आराधना कर सकेंगे।
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