भोजशाला फैसला सुनाने वाले जस्टिस के पुत्र सरकारी अधिवक्ता नियुक्त, कांग्रेस नेता ने उठाए सवाल
धार के भोजशाला मामले में शुक्रवार, 15 मई को इंदौर हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अब भोजशाला हिंदुओं की हो गई है। इस पर जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच ने फैसला सुनाया।
इस फैसले के एक दिन पहले 14 मई को मप्र शासन विधि विभाग ने शासकीय अधिवक्ताओं की पैनल घोषित की। इसमें जस्टिस शुक्ला के बेटे सुजय शुक्ला को भी लिया गया है।
अब इस नियुक्ति को लेकर कांग्रेस के पूर्व प्रवक्ता और अभी छत्तीसगढ़ अल्पसंख्यक विभाग के प्रमुख डॉ. अमिनुल खान सूरी ने एक विवादित ट्वीट किया है।
कांग्रेस नेता बोले- फैसले के समय नियुक्ति क्यों
सूरी ने ट्वीट करते हुए कहा कि इतिहास गवाह है कि जब न्याय की कुर्सी पर बैठे लोग निष्पक्षता से हटते दिखाई देते हैं, तब लोकतंत्र की आत्मा घायल होती है। कमाल मौला मस्जिद मामले में ऐतिहासिक फैसला देने वाली संयुक्त पीठ में शामिल न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला के पुत्र सुजय शुक्ला को लगभग उसी दिन सरकारी पैनल अधिवक्ता नियुक्त किया जाना कई गंभीर सवाल खड़े करता है?
इतना ही नहीं, यह जानकर और भी आश्चर्य होता है कि सुजय शुक्ला, वरिष्ठ अधिवक्ता एवं भारत सरकार के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल श्री सुनील जैन जी के सहायक भी हैं, जिन्होंने इसी मामले में एएसआई (Bhojshala ASI Survey)@ASIGoका पक्ष रखा था।
उन्होंने आगे कहा कि ऐसे में जनता के मन में यह प्रश्न स्वाभाविक है। क्या यह केवल संयोग है? या फिर सत्ता, व्यवस्था और प्रभाव का सुनियोजित प्रयोग? जब न्यायपालिका से जुड़े इतने बड़े फैसले के आसपास ऐसे नियुक्ति आदेश सामने आते हैं, तो सवाल उठना लोकतंत्र की सेहत के लिए आवश्यक है।
सूरी ने कहा कि न्याय केवल होना नहीं चाहिए, न्याय होता हुआ दिखना भी चाहिए। अगर न्याय के मंदिर में भी पक्षपात की आहट सुनाई देने लगे, तो लोकतंत्र का भरोसा कमजोर होता है। शुक्ला जी को अपने बेटे के भविष्य का कितना ध्यान रखना पड़ा है, यह इन परिस्थितियों से स्पष्ट होता दिखाई देता है। देश जानना चाहता है कि क्या यह योग्यता थी, या व्यवस्था की कृपा?
नियुक्ति नई बात नहीं है
वहीं, जानकारों और कानूनविदों का कहना है कि इस तरह की नियुक्तियां नई बात नहीं हैं और इसे पक्षपात भी नहीं कहा जा सकता। सरकार अपनी पैनल में वकीलों को उनके काम और योग्यता के आधार पर शामिल करती है। न्यायपालिका में निष्पक्षता बनाए रखने के लिए किसी जस्टिस के बेटे या रिश्तेदार अपने पिता की कोर्ट के केस से खुद ही दूर रहते हैं। कई जस्टिसों के बेटे और रिश्तेदार आज भी वकालत कर रहे हैं। निष्पक्षता का पूरा ध्यान रखा जाता है। ऐसे में ये टिप्पणियां सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी हैं। वैसे भी भोजशाला केस में अधिवक्ता सुजय कहीं भी शामिल नहीं थे।
सुजय शुक्ला ने टिप्पणी से किया इनकार
इसके पहले पूर्व सीएम दिग्गी उठा चुके सवाल
इसके पहले शनिवार को इंदौर में पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह भी भोजशाला फैसले को लेकर सवाल उठा चुके हैं। उनका कहना है कि एएसआई संरक्षित स्थल पर पूजा या इबादत नहीं हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट में ज्ञानवापी केस, संभल मस्जिद, ये सभी केस पर स्टे है। सुप्रीम कोर्ट ही इसमें तय करेगा कि क्या होना चाहिए।
उधर हिंदुओं में खुशी की लहर
लेकिन इन सब विवादों के परे धार की भोजशाला में खुशियों का माहौल है। वहां रोज पूजा शुरू हो चुकी है। एएसआई ने नमाज को प्रतिबंधित कर दिया है। बीजेपी और अलग-अलग हिंदू संगठन, साथ ही आम हिंदू समाज में भी उत्साह देखने को मिल रहा है।
मां वाग्देवी की प्रतिकृति को रविवार को भोजशाला मंदिर में विराजित किया गया। श्रद्धालु इसे सिर पर रखकर ढोल-नगाड़ों के साथ लाए और मंदिर में रखा। पूजा के दौरान कलेक्टर राजीव रंजन मीणा और एसपी सचिन शर्मा भी मौजूद रहे। वहीं सीएम डॉ. मोहन यादव कह चुके हैं कि वे लंदन म्यूजियम से मां वाग्देवी की असली प्रतिमा लेकर आएंगे और भोजशाला को अयोध्या जैसा विकसित करेंगे।
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