धरमपुरी विधायक कालू सिंह ठाकुर पर नोटिस फर्जी, लेकिन भाजपा में अनुशासन का सवाल असली?
वायरल नोटिस में क्या लिखा था?
आज यानी 06 अक्टूबर की सुबह कई डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक खबर चल रही थी। इसमें दावा किया जा रहा था कि प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की ओर से विधायक को कारण बताओ नोटिस दिया गया है। कारण बताओ नोटिस यानी ऐसा पत्र, जिसमें किसी से सफाई मांगी जाती है।
रिपोर्टों में कथित पत्र के आधार पर तीन दिन में जवाब मांगने की बात कही गई थी। अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी भी बताई गई थी। इसी वजह से यह मामला तुरंत चर्चा में आ गया।
लेकिन प्रदेश भाजपा का पक्ष इससे उलट है
भाजपा प्रदेश मीडिया प्रभारी ब्रजगोपाल लोया ने इसका खंडन किया है। उन्होंने कहा कि प्रदेश नेतृत्व ने धरमपुरी विधायक कालू सिंह ठाकुर को कोई कारण बताओ नोटिस जारी नहीं किया है। उनके मुताबिक सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर चल रहा पत्र पार्टी की ओर से नहीं आया है।
यही इस विवाद का सबसे नया तथ्य है। अब सवाल उठता है कि पार्टी के नाम से चल रहा पत्र आया कहां से। इसे किसने बनाया और किसने फैलाया, यह अभी साफ नहीं है। गलती, शरारत या कोई और कारण था, इसकी पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए किसी साजिश को तथ्य मानना ठीक नहीं होगा।
कालू सिंह ठाकुर भूख हड़ताल क्यों?
कालू सिंह ठाकुर धरमपुरी से भाजपा विधायक हैं। जिले की सरकारी वेबसाइट भी उन्हें इसी क्षेत्र का विधायक बताती है। नोटिस की खबर से पहले ही वे एक घोषणा कर चुके थे।
उन्होंने धामनोद के स्थानीय मुद्दों की बात उठाई थी। नगर निकाय से जुड़ी शिकायतें भी उनमें शामिल थीं। इसी को लेकर उन्होंने 09 अक्टूबर से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल की बात कही है। यह हड़ताल केंद्रीय राज्य मंत्री सावित्री ठाकुर के निवास के बाहर होनी है।
विधायक ने मंत्री पर आरोप भी लगाए थे। रिपोर्ट के मुताबिक ये आरोप प्रशासनिक सुनवाई और विकास कार्यों से जुड़े हैं। सावित्री ठाकुर ने इन आरोपों को खारिज किया। उन्होंने विधायक को बातचीत के लिए बुलाया था।
यानी दोनों पक्षों की बात अलग है। किसी एक दावे को अंतिम तथ्य मानना जल्दबाजी होगी।
नोटिस नहीं, फिर भी विवाद क्यों?
कथित नोटिस पर सवाल हो सकता है। लेकिन मूल विवाद अपनी जगह कायम है। एक भाजपा विधायक और पार्टी की केंद्रीय मंत्री के बीच मतभेद सबके सामने है।
असल सवाल अब यह नहीं कि नोटिस मिला या नहीं। सवाल यह है कि विधायक को अपनी शिकायत रखने के लिए यह रास्ता क्यों चुनना पड़ा। सत्ता में बैठी पार्टी का विधायक अपनी ही मंत्री के घर के बाहर हड़ताल की बात कहे, तो संवाद पर सवाल उठते हैं।
संवाद की कमी का यह सवाल सिर्फ विधायक तक सीमित नहीं है। यह पार्टी की अंदरूनी व्यवस्था की भी परीक्षा है।
संगठन के दौरे के बाद टकराव
मध्यप्रदेश के नए भाजपा प्रभारी बिप्लब कुमार देब सितंबर के आखिर में भोपाल आए थे। यह उनका पहला प्रदेश दौरा था। उनका कार्यक्रम पार्टी नेताओं से चर्चा का था।
ऐसे समय में पार्टी के विधायक और केंद्रीय मंत्री का विवाद बाहर आना अहम है। अगर संगठन अनुशासन और संवाद पर जोर दे रहा है, तो विधायक की नाराजगी पार्टी फोरम में क्यों नहीं सुलझी? यह सवाल अभी खुला है।
क्या आगे कार्रवाई हो सकती है?
भाजपा के खंडन का मतलब बस इतना है कि अभी कोई आधिकारिक नोटिस जारी नहीं हुआ है। इससे यह तय नहीं होता कि आगे कार्रवाई होगी या नहीं होगी। यह फैसला पार्टी नेतृत्व को करना है।
अब सबकी नजर तीन बातों पर रहेगी। कालू सिंह ठाकुर 09 अक्टूबर को हड़ताल पर कायम रहते हैं या नहीं। वे घोषणा वापस लेते हैं या नहीं। और संगठन बातचीत से रास्ता निकाल पाता है या नहीं।
कथित पत्र की जांच जरूरी क्यों?
इस मामले का दूसरा पहलू सूचना की विश्वसनीयता है। मान लीजिए किसी दल के प्रदेश अध्यक्ष के नाम से अनुशासन का पत्र सामने आए। कई प्लेटफॉर्म उस पर खबर भी चला दें। फिर पार्टी उसे जारी करने से ही मना कर दे। तब मूल दस्तावेज की जांच जरूरी हो जाती है।
कथित पत्र किस स्रोत से आया, यह साफ नहीं है। सबसे पहले किसने उसे फैलाया, यह भी पता नहीं। पार्टी इस पर औपचारिक शिकायत या जांच करेगी या नहीं, यह भी अभी सामने नहीं आया।
अगर पार्टी के नाम से कोई अनधिकृत पत्र चला है, तो यह अलग गंभीर मामला है। यह पार्टी के आधिकारिक संचार की साख से जुड़ता है।
नोटिस पर भाजपा ने स्थिति साफ कर दी है। अब असल सवाल यही बचता है। पार्टी कालू सिंह ठाकुर और सावित्री ठाकुर के सार्वजनिक टकराव को कैसे संभालेगी?