घर से वोट डालने की तैयारी, लेकिन पहचान और गोपनीयता की गारंटी कौन देगा?, डिजिटल मतदान की सुरक्षा पर बड़ा सवाल
चुनाव आयोग के सामने भरोसे का सवाल
मध्यप्रदेश में स्थानीय चुनावों की प्रक्रिया में बदलाव की तैयारी के बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल मतदान की स्वतंत्रता और गोपनीयता का है। राज्य निर्वाचन आयोग ऐसी तकनीकी व्यवस्था विकसित कर रहा है, जिससे कुछ श्रेणियों के मतदाता मतदान केंद्र पहुंचे बिना अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सकेंगे।
प्रस्ताव के अनुसार बीमार, दिव्यांग, बुजुर्ग और विभिन्न सेवाओं में तैनात मतदाताओं सहित कुछ अन्य पात्र वर्गों को यह सुविधा मिल सकती है। लेकिन मतदान केंद्र पर मौजूद निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था को घर से होने वाले मतदान में कैसे सुनिश्चित किया जाएगा, यह बड़ा प्रश्न है।
मोबाइल पर पहचान होगी, लेकिन दबाव कैसे पकड़ा जाएगा?
प्रस्तावित प्रक्रिया में मतदाता को पहले विशेष पोर्टल पर पंजीकरण कराना होगा। डिजिटल सत्यापन (Digital Verification) के बाद यूजर आईडी, पासवर्ड और ओटीपी के जरिए मतदान की सुविधा देने की तैयारी है। इस प्रक्रिया से मतदाता की डिजिटल पहचान की जांच की जा सकती है।
केवल ओटीपी से यह सुनिश्चित नहीं होता कि मतदान करते समय व्यक्ति अकेला है या किसी दबाव में नहीं है। यदि किसी मतदाता के मोबाइल या लॉगिन विवरण तक दूसरा व्यक्ति पहुंच जाता है, तो अनधिकृत मतदान रोकने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा उपाय आवश्यक होंगे। यही वह चुनौती है, जिसका समाधान तकनीकी परीक्षण और अंतिम नियमों में स्पष्ट होना चाहिए।
साइबर सुरक्षा में चूक हुई तो जिम्मेदारी किसकी?
चुनाव आयोग की आईटी सेल तकनीकी ढांचा और साइबर सुरक्षा प्रणाली विकसित कर रही है। इस व्यवस्था में मतदाता की पहचान से जुड़ी जानकारी सुरक्षित रखना, अनधिकृत लॉगिन रोकना और मतदान प्रणाली को साइबर हमलों से बचाना महत्वपूर्ण होगा।
इसके अलावा यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि मतदाता की पहचान और उसके मतदान विकल्प को आपस में जोड़कर उसकी गोपनीयता भंग न की जा सके। स्वतंत्र सुरक्षा परीक्षण, तकनीकी ऑडिट और शिकायत निवारण की व्यवस्था कैसी होगी, इसका स्पष्ट विवरण अंतिम प्रणाली सामने आने पर ही मिलेगा।
पहले उपचुनाव में सामने आएगी वास्तविक स्थिति
प्रस्ताव के मुताबिक जनवरी 2027 तक प्रणाली तैयार करने का लक्ष्य है। जून-जुलाई 2027 में प्रस्तावित स्थानीय चुनावों से लगभग छह महीने पहले किसी उपचुनाव में इसका परीक्षण करने की योजना बताई गई है। पायलट परीक्षण में केवल मतदान की तकनीकी सफलता देखना पर्याप्त नहीं होगा।
पहचान सत्यापन, सर्वर की क्षमता, मतदान की गोपनीयता और तकनीकी खराबी की स्थिति में वैकल्पिक व्यवस्था को भी परखना जरूरी होगा। परीक्षण सफल होने के बाद भी व्यापक इस्तेमाल अंतिम नियमों और आयोग के निर्णय पर निर्भर करेगा।
413 निकाय, 22,921 पंचायतें और बड़ा चुनावी दायरा
प्रदेश में 413 नगरीय निकायों और 22,921 ग्राम पंचायतों में चार लाख से अधिक पदों के चुनाव प्रस्तावित बताए गए हैं। इतने बड़े चुनावी ढांचे में डिजिटल मतदान का सीमित प्रयोग भी प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होगा।
प्रस्तावित सुविधा का लाभ अस्पताल में भर्ती मरीजों, 90 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्गों, दिव्यांग मतदाताओं, प्रवासी मजदूरों, विद्यार्थियों और आवश्यक सेवाओं में तैनात कर्मचारियों जैसे वर्गों तक पहुंचाने की तैयारी है। हालांकि, इन सभी श्रेणियों की अंतिम पात्रता और पंजीकरण संबंधी शर्तें अभी निर्धारित नियमों से ही स्पष्ट होंगी।
एस्टोनिया का मॉडल, लेकिन मध्यप्रदेश में कितनी तैयारी?
जानकारी के मुताबिक राज्य निर्वाचन आयुक्त मनोज श्रीवास्तव ने एस्टोनिया की ई-वोटिंग व्यवस्था की तर्ज पर सीमित डिजिटल मतदान प्रणाली विकसित करने की बात कही है। एस्टोनिया के मॉडल से प्रेरणा लेना और उसे मध्यप्रदेश में सुरक्षित तरीके से लागू करना अलग-अलग चुनौतियां हैं। यहां इंटरनेट की उपलब्धता, डिजिटल साक्षरता, मतदाता सत्यापन और तकनीकी सहायता की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण होगी।
सुविधा के साथ निष्पक्षता कैसे बचेगी?
घर से मतदान की सुविधा उन लोगों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है, जिन्हें बूथ तक पहुंचने में परेशानी होती है। लेकिन चुनाव की विश्वसनीयता केवल मतदान आसान बनाने से तय नहीं होती। मतदाता बिना दबाव अपना विकल्प चुन सके और उसका वोट गोपनीय तथा सुरक्षित रहे, यह भी उतना ही आवश्यक है।
अब सवाल यह है कि राज्य निर्वाचन आयोग डिजिटल मतदान की सुविधा शुरू करने से पहले सुरक्षा, स्वतंत्र सत्यापन और शिकायतों के समाधान की कितनी मजबूत व्यवस्था सार्वजनिक करेगा?