समझौते के बाद भी दहेज केस जारी रखना उत्पीड़न, एमपी हाईकोर्ट ने रद्द की FIR
समझें क्या है पूरा मामला
- वैवाहिक विवाद में दोनों पक्षों का विधिवत समझौता हुआ।
- समझौते के बाद भी दहेज मामला वापस नहीं हुआ।
- हाईकोर्ट ने मुकदमा जारी रखना उत्पीड़न माना।
- कोर्ट ने इसे कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया।
- एफआईआर और पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।
क्या बोला हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ कहा है कि अगर वैवाहिक विवाद में कोर्ट के सामने विधिवत समझौता हो चुका है, तो उसी विवाद से जुड़ा आपराधिक मुकदमा जारी रखना गलत है। कोर्ट के मुताबिक ऐसा करना पक्ष का उत्पीड़न और कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
जबलपुर स्थित जस्टिस हिमांशु जोशी की एकलपीठ ने यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने दहेज प्रताड़ना के आरोप में दर्ज FIR और उससे जुड़ी पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।
समझौता हुआ, फिर भी केस नहीं लिया वापस
दरअसल ये पूरा मामला पन्ना निवासी तौसीफ राइन सहित अन्य लोगों ने यह याचिका दायर की थी। इसी मामले में कोर्ट ने सुनवाई की है। उन्होंने साल 2020 में दर्ज दहेज प्रताड़ना की FIR रद्द करने की मांग की थी।
याचिका के मुताबिक 2017 में शादी के बाद पत्नी ने पति, सास-ससुर, विवाहित ननद और देवर के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का मामला दर्ज कराया था। सुनवाई में सामने आया कि घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत चल रहे मामले में दोनों पक्षों के बीच पहले ही विधिवत समझौता हो चुका था।
स्त्रीधन और कार मिली, फिर भी अटका मामला
समझौते के तहत पत्नी को स्त्रीधन, शादी का सामान, मेहर की राशि और एक कार दी जा चुकी थी। उसने सभी लंबित मुकदमे वापस लेने पर सहमति भी जताई थी। लेकिन बाद में उसने दहेज प्रताड़ना का मामला वापस नहीं लिया।
सिर्फ रिश्तेदारी के आधार पर नहीं चलेगा केस
हाईकोर्ट ने कहा कि सास और विवाहित ननद के खिलाफ शिकायत में केवल सामान्य आरोप लगाए गए हैं। कोर्ट ने बताया कि विवाहित ननद अपने पति के साथ अलग रहती है, और उसके खिलाफ कोई ठोस आरोप नहीं है।
कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ पारिवारिक रिश्ते के आधार पर किसी के खिलाफ आपराधिक मुकदमा जारी रखने की इजाजत नहीं दी जा सकती।
चार्जशीट में भी नहीं मिले ठोस सबूत
एकलपीठ ने यह भी पाया कि चार्जशीट में दहेज मांगने या क्रूरता से जुड़ा कोई ठोस और विशिष्ट आरोप मौजूद नहीं है। कोर्ट का कहना था कि जब वैवाहिक विवाद आपसी समझौते से सुलझ चुका है, तो मुकदमा जारी रखना सिर्फ अनावश्यक कानूनी लड़ाई और उत्पीड़न को बढ़ावा देगा। इसी आधार पर कोर्ट ने FIR और उससे जुड़ी सभी आपराधिक कार्यवाही रद्द करने का आदेश दिया।
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