एक साल बाद भी ई-अटेंडेंस बेहाल! सर्वर फेल, नेटवर्क गायब, फिर भी शिक्षकों पर कार्रवाई की तलवार

Ramanand Tiwari | May 31, 2026, 23:58 IST
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एमपी में नया शैक्षणिक सत्र शुरू होते ही ई-अटेंडेंस चर्चा में आया। सिस्टम अभी भी फेल है। सर्वर और नेटवर्क की खामियां दूर नहीं हुई हैं। इसके बावजूद स्कूल शिक्षा विभाग ने शिक्षकों पर कार्रवाई की चेतावनी दी है।

मध्य प्रदेश में नया शैक्षणिक सत्र शुरू होते ही ई-अटेंडेंस चर्चा में आया। पिछले एक साल में व्यवस्था पूरी तरह दुरुस्त नहीं हुई। फिर भी अब इसे सख्ती से लागू करने की तैयारी चल रही है। सर्वर की खामियां और नेटवर्क की समस्या जस की तस हैं। तकनीकी अव्यवस्थाओं के बावजूद विभाग का फोकस शिक्षकों पर कार्रवाई की चेतावनी देने पर है। सवाल यह उठ रहा है कि इस विफल सिस्टम की जवाबदेही किसकी होगी।




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सवालों के घेरे में विभाग की तैयारी

ई-अटेंडेंस को लेकर स्कूल शिक्षा विभाग कई वर्षों से प्रयास कर रहा है। 2025 में इसे प्रभावी रूप से लागू करने की घोषणा हुई थी। अब तक यह व्यवस्था पूरी तरह स्थिर नहीं हो सकी। नया सत्र शुरू होने जा रहा है। विभाग फिर से ई-अटेंडेंस को लेकर सक्रिय हो गया है। कई जिलों में सर्वर और नेटवर्क की समस्याएं आज भी हैं। सवाल यह उठता है कि सिस्टम तैयार न होने पर इसे लागू करने की जल्दबाजी क्यों?



सिस्टम फेल, कार्रवाई शिक्षकों पर!

विभागीय अधिकारी कहते हैं कि ऑनलाइन अटेंडेंस नहीं लगाने वाले शिक्षकों के खिलाफ कार्रवाई होगी। शिक्षक पूछ रहे हैं कि जब सर्वर काम नहीं करता और नेटवर्क उपलब्ध नहीं है, तो जिम्मेदारी कौन लेगा। पोर्टल बार-बार तकनीकी दिक्कत देता है। अगर कोई शिक्षक जानबूझकर अटेंडेंस नहीं लगाता तो कार्रवाई उचित हो सकती है। लेकिन सिस्टम की गलती होने पर पूरी जिम्मेदारी शिक्षक पर डालना सवाल खड़ा करता है।



ग्रामीण स्कूलों की हकीकत से दूर है विभाग?

भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर जैसे बड़े शहरों में इंटरनेट और नेटवर्क की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है। लेकिन प्रदेश के दूरस्थ आदिवासी, वनांचल और ग्रामीण इलाकों में आज भी मोबाइल नेटवर्क बड़ी समस्या है। ऐसे कई स्कूल हैं जहां कॉल तक नहीं लगती, इंटरनेट की बात तो दूर है। इसके बावजूद विभाग के पास ऐसी परिस्थितियों से निपटने का कोई स्पष्ट और स्थायी समाधान दिखाई नहीं देता।



एक साल में क्यों नहीं सुधरा सिस्टम?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर ई-अटेंडेंस की मॉनिटरिंग प्रभावी होती तो तकनीकी समस्याएं एक साल में दूर हो जातीं। आज भी जिलों से नेटवर्क विहीन स्कूलों की सूची मंगानी पड़ रही है। इसका मतलब है कि जमीनी स्तर पर मॉनिटरिंग अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाई। ऐसे में जवाबदेही केवल शिक्षकों की नहीं बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की भी है।



नेटवर्क विहीन स्कूलों की सूची

लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) ने सभी जिला शिक्षा अधिकारियों से जानकारी मांगी है। इसमें शामिल हैं ऐसे स्कूल जहां नेटवर्क की समस्या बनी रहती है या नेटवर्क उपलब्ध नहीं है। साथ ही शिक्षकों की संख्या, रिक्त पद, सेवानिवृत्त और मृत शिक्षकों की जानकारी भी तलब की गई है। जनगणना कार्य में लगे शिक्षकों का डेटा भी मांगा गया है। यह संकेत है कि विभाग के पास नेटवर्क समस्या का अद्यतन डेटा अभी भी नहीं है।



अधूरे सिस्टम के बीच सख्ती की तैयारी

15 जून से शुरू होने वाले नए सत्र में ई-अटेंडेंस को सख्ती से लागू करने की तैयारी की जा रही है। विभाग का दावा है कि नया पोर्टल तैयार किया जा रहा है और सभी शिक्षकों की उपस्थिति ऑनलाइन दर्ज होगी। हालांकि सवाल यह है कि यदि नया पोर्टल भी पुराने सिस्टम जैसी समस्याओं से जूझा तो उसकी जिम्मेदारी कौन तय करेगा?



पहले एम-शिक्षा मित्र, अब नया पोर्टल

शुरुआत में विभाग ने एम-शिक्षा मित्र ऐप के माध्यम से उपस्थिति दर्ज कराने की योजना बनाई थी। बाद में फैसला बदलकर नवीन 3.0 पोर्टल के जरिए ई-अटेंडेंस लागू करने की घोषणा कर दी गई। बार-बार प्लेटफॉर्म बदलने से भी यह संकेत मिलता है कि विभाग अब तक स्थायी और भरोसेमंद तकनीकी व्यवस्था विकसित नहीं कर पाया है।



20 हजार गायब शिक्षकों का सच भी अधूरा

विभाग दावा करता है कि प्रदेश में करीब 20 हजार शिक्षक नियमित रूप से स्कूल नहीं जाते। इनमें बड़ी संख्या ऐसे शिक्षक हैं जो सरकारी विभागों, जनगणना, चुनाव, जिला कार्यालयों, पंचायतों और अन्य प्रशासनिक कार्यों में लगे हैं। अगर सरकार शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाएगी तो स्कूलों में उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी सरकार की होगी।



शिक्षकों की भी अपनी चिंताएं

शिक्षक संगठनों का कहना है कि उन्हें अक्सर चुनाव सर्वे और जनगणना में लगाया जाता है। ऐसी स्थिति में निर्धारित समय पर स्कूल पहुंचना संभव नहीं हो पाता। नेटवर्क विहीन क्षेत्रों में ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज करना भी चुनौती है। लोक शिक्षण संचालनालय के संचालक केके द्विवेदी ने कहा कि जानकारी मिलने के बाद नेटवर्क प्रभावित स्कूलों को चिन्हित किया जाएगा। जहां नेटवर्क की समस्या है, वहां वैकल्पिक व्यवस्था पर विचार किया जा रहा है। अन्य क्षेत्रों में ई-अटेंडेंस सख्ती से लागू होगा।



ई-अटेंडेंस लागू करने की जल्दबाजी क्यों?

यदि एक साल बाद भी नेटवर्क विहीन स्कूलों की पहचान की जा रही है। सर्वर और पोर्टल की खामियां पूरी तरह दूर नहीं हुई हैं। वैकल्पिक व्यवस्था पर अभी भी विचार चल रहा है। फिर ई-अटेंडेंस लागू करने की जल्दबाजी क्यों? शिक्षकों की जवाबदेही तय होना जरूरी है। लेकिन पहले यह तय होना चाहिए कि अधूरी तकनीकी व्यवस्था और कमजोर मॉनिटरिंग के लिए जिम्मेदार अधिकारी कौन हैं।



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