SC-ST केस में आरोपी TI डेढ़ साल से फरार, लेकिन नौकरी जारी, प्रमोशन तक मिल गया

Pawan Modiya | May 19, 2026, 18:06 IST
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मुरैना में SC-ST एक्ट के आरोपी TI पुष्पक शर्मा डेढ़ साल से फरार हैं। 15 गिरफ्तारी वारंट जारी हो चुके हैं, लेकिन पुलिस ने अब तक गिरफ्तारी नहीं की। फरारी के दौरान ही उन्हें पदोन्नति भी मिल गई।

समझें क्या है पूरा मामला

  • मुरैना के TI पुष्पक शर्मा पर SC-ST एक्ट में केस है।
  • दलित पीड़ित रामशंकर जाटव की शिकायत पर पुलिस ने उल्टा उन पर ही केस दर्ज किया।
  • कोर्ट के आदेश पर 15 गिरफ्तारी वारंट जारी हो चुके हैं।
  • TI डेढ़ साल से फरार है, लेकिन नौकरी और पदोन्नति जारी रही।
  • पुलिस का कहना है कि वारंट की जानकारी मिलने पर कार्रवाई होगी।

जब शिकायतकर्ता पर ही दर्ज हो गया केस

मामला 7 अक्टूबर 2019 का है। मुरैना जिले के अंबाह थाना क्षेत्र के रुअरिया गांव में रहने वाले रामशंकर जाटव के साथ गांव के तीन युवकों ने मारपीट की। रामशंकर जब थाने में शिकायत दर्ज कराने पहुंचे तो तत्कालीन थाना प्रभारी पुष्पक शर्मा ने उनकी बात सुनने की बजाय उन्हीं पर केस दर्ज कर दिया। बस यहीं से इस पूरे विवाद की शुरुआत हुई।



रामशंकर ने बताया कि जब उन्होंने सीएम (Chief Minister) हेल्पलाइन पर शिकायत की तो पुलिसकर्मी उन्हें थाने बुलाकर पीटने लगे। उनका आरोप है कि आरोपी खुद पुलिस अधिकारी है, इसलिए पुलिस उसे बचा रही है।



कोर्ट ने दिया SC-ST केस का आदेश

पीड़ित ने न्यायालय में परिवाद दायर किया। लंबी सुनवाई के बाद 25 जून 2022 को कोर्ट ने आदेश दिया कि पुष्पक शर्मा सहित चार लोगों पर मारपीट और SC-ST एक्ट (Scheduled Castes and Scheduled Tribes Prevention of Atrocities Act) के तहत प्रकरण दर्ज किया जाए।



आरोपी पुष्पक शर्मा कोर्ट में लगातार गैरहाजिर रहे। इसके बाद अदालत ने गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिए। विशेष न्यायालय मुरैना ने 18 सितंबर 2024 को गिरफ्तारी वारंट जारी किए और 12 दिसंबर 2024 तक उन्हें कोर्ट में पेश करने के निर्देश दिए। बीते डेढ़ साल में 15 गिरफ्तारी वारंट जारी हो चुके हैं, लेकिन पुलिस आज तक उन्हें गिरफ्तार नहीं कर पाई।



फरारी में पदोन्नति, छतरपुर में पदस्थी

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि फरारी के दौरान ही पुष्पक शर्मा छतरपुर जिले में पदस्थ रहे। वहां उन्होंने न सिर्फ विभाग में लगातार काम किया, बल्कि पदोन्नति भी हासिल कर ली।



एसआई (Sub Inspector) से निरीक्षक बने इस अधिकारी ने अदालत के आदेशों की ही नहीं, बल्कि विभागीय सिस्टम की कमजोरियों का फायदा उठाकर खुद को बचाए रखा।



5 मई 2026 को फिर कोर्ट में पेशी थी, लेकिन पुलिस आरोपी टीआई (थाना निरीक्षक) को पेश नहीं कर सकी। इसके बाद न्यायालय ने फिर से गिरफ्तारी वारंट जारी करते हुए आरोपी को 7 जुलाई 2026 को कोर्ट में पेश करने के आदेश दिए हैं।



आरोपी बोले: वारंट की जानकारी नहीं

फरार आरोपी टीआई पुष्पक शर्मा का कहना था कि मुरैना के किसी न्यायालय में उनके खिलाफ कोई मामला लंबित नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें गिरफ्तारी वारंट की कोई जानकारी नहीं है।



उन्होंने यह भी बताया कि विशेष न्यायालय से वारंट जारी होने के बाद 4 सितंबर 2025 को उन्होंने अपने वकील के माध्यम से ग्वालियर हाईकोर्ट (Gwalior High Court) में अग्रिम जमानत याचिका दायर की थी। इसलिए उनका कहना है कि अग्रिम जमानत याचिका लगी होने पर उन्हें गिरफ्तारी वारंट की जरूरत नहीं पड़ी।



थाना प्रभारी और एएसपी क्या बोले

सिंहोनिया थाना प्रभारी अतुल सिंह परिहार ने कहा कि उन्होंने करीब दो माह पहले ही यह पदभार संभाला है। इस प्रकरण की जानकारी उन्हें नहीं थी। उन्होंने कहा कि अगर गिरफ्तारी वारंट की जानकारी मिलती है तो कार्रवाई जरूर की जाएगी।



वहीं एएसपी (Additional Superintendent of Police) पूर्णिमा मिश्रा ने बताया कि पुष्पक शर्मा 2023 से 2025 तक जिले के बमोरी और हरपालपुर थानों में पदस्थ रहे हैं। वर्तमान में वे जिले में पदस्थ नहीं हैं। लगभग चार से पांच माह पहले उनका स्थानांतरण पुलिस मुख्यालय भोपाल हो चुका है।



पीड़ित की पीड़ा: दलित हूं, न्याय नहीं मिला

रामशंकर जाटव का कहना है कि वे साइंस से स्नातक हैं और पीएससी (Public Service Commission) की तैयारी कर रहे थे। गांव में उनके साथ मारपीट हुई। शिकायत लेकर थाने गए तो रिपोर्ट लिखने की बजाय उन्हीं पर मामला दर्ज कर दिया गया। सीएम हेल्पलाइन पर शिकायत की तो थाने बुलाकर पीटा गया।



उनका कहना है, "यह लड़ाई सिर्फ इसलिए लड़ रहा हूं क्योंकि मैं दलित हूं और आरोपी पुलिस अधिकारी है। इसलिए पुलिस आज तक उसे गिरफ्तार नहीं कर रही।"



सिस्टम पर गंभीर सवाल

यह मामला सिर्फ एक अधिकारी की फरारी का नहीं है। यह सवाल उठाता है कि क्या पुलिस विभाग के भीतर कोई ऐसा तंत्र नहीं है जो अपने ही आरोपी अधिकारियों को न्यायालय के सामने पेश करे। 15 गिरफ्तारी वारंट का कोई असर न होना, फरारी में पदोन्नति मिलना और विभागीय संरक्षण का लाभ उठाना, यह सब मिलकर एक ऐसी तस्वीर बनाते हैं जो पुलिस की जवाबदेही पर सीधे सवाल खड़े करती है।



SC-ST एक्ट जैसे कानून कमजोर तबके की रक्षा के लिए बने हैं। लेकिन जब खुद कानून के रखवाले ही इस कानून को नजरअंदाज करें, तो पीड़ित के लिए न्याय पाना और मुश्किल हो जाता है।



यह खबर क्यों जरूरी है

यह खबर कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को जीने और न्याय पाने का अधिकार देता है। SC-ST एक्ट संसद द्वारा बनाया गया विशेष कानून है जो दलित और आदिवासी समुदाय को अत्याचार से बचाने के लिए है। लेकिन इस मामले में खुद एक पुलिस अधिकारी इस कानून का उल्लंघन करने का आरोपी है और डेढ़ साल से फरार है। यह पुलिस की जवाबदेही, न्यायपालिका के आदेशों की अनदेखी और दलित उत्पीड़न तीनों मुद्दों को एक साथ सामने रखती है। सामाजिक न्याय के नजरिए से यह खबर दिखाती है कि जब पीड़ित कमजोर हो और आरोपी ताकतवर, तो सिस्टम किस तरह काम करता है। यह खबर पाठकों को जागरूक करती है और सरकार व पुलिस प्रशासन पर जवाबदेही का दबाव बनाती है।



जरूरी FAQ

TI पुष्पक शर्मा पर क्या आरोप हैं और यह मामला कब का है?



यह मामला 7 अक्टूबर 2019 का है। मुरैना के अंबाह थाना क्षेत्र में दलित पीड़ित रामशंकर जाटव के साथ मारपीट हुई। जब वे शिकायत दर्ज कराने गए तो तत्कालीन थाना प्रभारी पुष्पक शर्मा ने उनकी बात सुनने की जगह उन्हीं पर केस दर्ज कर दिया। इसके अलावा सीएम हेल्पलाइन पर शिकायत करने पर पीड़ित को थाने बुलाकर पीटने का भी आरोप है। बाद में कोर्ट के आदेश पर पुष्पक शर्मा सहित चार लोगों पर मारपीट और SC-ST एक्ट के तहत केस दर्ज हुआ।



15 गिरफ्तारी वारंट जारी होने के बाद भी TI को गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया?



जवाब: विशेष न्यायालय मुरैना ने 18 सितंबर 2024 से लेकर अब तक कुल 15 गिरफ्तारी वारंट जारी किए हैं। इसके बावजूद पुलिस ने आरोपी टीआई को गिरफ्तार नहीं किया। खबर के मुताबिक फरारी के दौरान वे छतरपुर जिले में पदस्थ रहे और पदोन्नति भी मिली। थाना प्रभारी का कहना है कि उन्हें इस मामले की जानकारी नहीं थी। एएसपी ने बताया कि आरोपी का तबादला अब पुलिस मुख्यालय भोपाल हो चुका है। आरोपी का दावा है कि उसने ग्वालियर हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दायर की थी।



SC-ST एक्ट के मामले में न्यायालय के आदेश की अनदेखी करने पर क्या कार्रवाई हो सकती है?



जवाब: SC-ST एक्ट एक गंभीर कानून है। न्यायालय के वारंट की अनदेखी करना अदालत की अवमानना (Contempt of Court) के दायरे में आ सकता है। किसी आरोपी को फरार रहने देना और विभागीय संरक्षण देना दोनों ही प्रशासनिक और कानूनी जांच के दायरे में आते हैं। इस मामले में अगर यह साबित हो कि पुलिस ने जानबूझकर अपने अफसर को बचाया, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ भी विभागीय और आपराधिक कार्रवाई हो सकती है।



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