बैतूल में ठेकेदार कानून से ऊपर? सरकारी विश्रामगृह में बिना अनुमति लगा दिया मिक्सर प्लांट, सालभर से अफसर खामोश
आखिर इस मामले में कार्रवाई क्यों नहीं हुई? वहीं, शिकायतकर्ता ने सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाते हुए पुलिस से एफआईआर दर्ज करने की मांग की है।
ठेकेदार ने प्लांट लगाने की अनुमति नहीं ली
अब सवाल उठता है कि जब ठेकेदार ने प्लांट लगाने की अनुमति नहीं ली तो साल भर से उसे हटाने की कार्रवाई क्यों नहीं की गई। यही नहीं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी इस प्लांट को पर्यावरण के लिए नुकसानदेह बता चुका है। इसके बावजूद यहां भी कार्रवाई की जगह पल्ला झाड़ लिया गया है। यानी बिना अनुमति सरकारी जमीन पर कब्जा जमाया गया। शहर के बीच बेधड़क प्रदूषण फैलाया गया। फिर भी पीडब्ल्यूडी और एमपीपीसीबी महीनों से चुप्पी साधे हुए हैं।
आरटीआई से सामने आई जानकारी
शिकायतकर्ता अधिवक्ता संजय कुमार मिश्रा ने सूचना के अधिकार के तहत यह जानकारी हासिल की। उन्होंने 29 सितंबर 2026 को पुलिस अधीक्षक बैतूल को लिखित आवेदन देकर पूरी स्थिति सामने रखी।आवेदन में कहा गया है कि विश्रामगृह की बाउंड्रीवॉल को नुकसान पहुंचाया गया। विश्रामगृह की भूमि का स्वरूप बदला गया। और बिना किसी वैध अनुमति के प्लांट स्थापित कर दिया गया। अधिवक्ता का आरोप है कि यह केवल निर्माण का मामला नहीं है। यह लोक संपत्ति को सुनियोजित तरीके से क्षति पहुंचाने का मामला है। यह सरकारी भूमि के स्वरूप को बदलने का मामला भी है।
कानूनी धाराओं का हवाला
शिकायत में लोक संपत्ति को नुकसान के निवारण अधिनियम 1984 की धारा 3 और 4 का उल्लेख किया गया है। साथ ही भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 324(1) के तहत रिष्टी का अपराध बताया गया है। धारा 239 के तहत विश्रामगृह की देखरेख करने वालों के विरुद्ध अपराध का उल्लेख किया गया है। धारा 173 के तहत तत्काल कार्रवाई की मांग की गई है। अधिवक्ता ने यह भी कहा है कि बीएनएस 2023 की धारा 199 को ध्यान में रखकर आवेदन को गंभीरता से लिया जाए। उनका तर्क सीधा है। जब विभाग खुद कह रहा है कि अनुमति नहीं है, तो कार्रवाई में देरी किस बात की है।
संदेहास्पद पीडब्ल्यूडी की भूमिका
सबसे गंभीर सवाल पीडब्ल्यूडी की भूमिका पर उठता है। कार्यपालन यंत्री लोक निर्माण विभाग बैतूल का जवाब इस मामले की रीढ़ है। इस जवाब ने साफ कर दिया कि प्लांट लगाने की कोई परमिशन विभाग के पास नहीं है। यह जवाब एक साथ दो बातें साबित करता है। पहली बात। निर्माण अवैध है। दूसरी बात। विभाग को यह पता था या पता होना चाहिए था। फिर भी उसने समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया। एक सरकारी विभाग अपनी ही संपत्ति की रक्षा नहीं कर पाया। यह उसकी निष्क्रियता का प्रमाण है। यदि विभाग समय पर एक नोटिस भी जारी कर देता तो दीवार न टूटती। और भूमि का स्वरूप भी न बदलता।
एफआईआर और जांच की मांग
अधिवक्ता मिश्रा की शिकायत में प्लांट लगाने वाले व्यक्तियों और प्लांट के मालिकों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कर अन्वेषण की मांग की गई है। उनका कहना है कि केवल निर्माण हटाना पर्याप्त नहीं होगा। जिन्होंने लोक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया, उन पर कार्रवाई होनी चाहिए। जिन्होंने सरकारी जमीन पर कब्जे जैसी स्थिति बनाई, उन पर भी कार्रवाई होनी चाहिए। और जिन्होंने देखरेख की जिम्मेदारी निभाने के बजाय आंखें मूंद लीं, उन्हें भी नहीं बख्शा जाना चाहिए। अन्यथा यह संदेश जाएगा कि सरकारी संपत्ति पर अवैध निर्माण करो। कुछ दिन विवाद होगा। फिर सब सामान्य हो जाएगा।
प्रशासनिक रवैये पर भी सवाल
इस पूरे प्रकरण ने बैतूल के प्रशासनिक रवैये पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। क्योंकि मामला चर्चित ठेकेदार के मिक्सर प्लांट से जुड़ा है। शिकायत की प्रतिलिपि पुलिस महानिदेशक, पुलिस मुख्यालय भोपाल को भी भेजी गई है। इसका अर्थ साफ है। शिकायतकर्ता को स्थानीय स्तर पर त्वरित न्याय की उम्मीद कम दिख रही है। इसलिए उन्होंने उच्च स्तर को भी अवगत कराया है।जब एक नागरिक को अपनी ही सरकार की संपत्ति बचाने के लिए आरटीआई लगानी पड़े, शिकायत लिखनी पड़े, और फिर भी कार्रवाई के लिए भोपाल तक पत्र भेजना पड़े, तो यह व्यवस्था की विफलता ही कहलाएगी।
अफसर मौत, नहीं दे रहे जवाब
सवाल अब केवल प्लांट का नहीं है। सवाल यह है कि बिना अनुमति के सरकारी विश्रामगृह में निर्माण कैसे हो गया। बाउंड्रीवॉल को नुकसान पहुंचाने की अनुमति किसने दी। विभाग ने मौके पर जाकर निरीक्षण क्यों नहीं किया। और अनुमति न होने का लिखित जवाब मिलने के बाद भी पुलिस ने एफआईआर क्यों नहीं दर्ज की। इन सवालों का जवाब न देना भी एक तरह का जवाब है। इससे यही संकेत मिलता है कि सिस्टम अपने ही लोगों को बचाने में लगा है।
चुप्पी उठा रही मंशा पर सवाल
बैतूल का यह मामला बताता है कि भ्रष्टाचार हमेशा पैसे के लेन-देन से नहीं होता। कई बार वह चुप्पी से होता है। फाइल दबाने से होता है। निरीक्षण न करने से होता है। यहां भी वही हुआ। विभाग ने अनुमति नहीं दी। लेकिन अवैध निर्माण को रोका भी नहीं। पुलिस के पास शिकायत पहुंची। लेकिन कार्रवाई की गति अब तक सुस्त है।
अब गेंद पुलिस और प्रशासन के पाले में
पीडब्ल्यूडी के कार्यपालन यंत्री की चुप्पी और टालमटोल के बाद अब शिकायतकर्ता को पुलिस से उम्मीद है। यानी अब गेंद पुलिस और प्रशासन के पाले में है। यदि इस मामले में शीघ्र एफआईआर दर्ज कर निष्पक्ष अन्वेषण नहीं हुआ तो यह मान लिया जाएगा कि सरकारी संपत्ति की सुरक्षा केवल कागजों तक सीमित है। बैतूल की जनता यह देख रही है कि कानून किताबों में रहेगा या जमीन पर भी उतरेगा।
जिम्मेदार मौन
इस मामले में कार्यपालन यंत्री मनीष कुमार मरकाम चुप हैं। उन्होंने ठेकेदार पर अब तक कोई कार्रवाई प्रस्तावित नहीं की है और न ही विश्राम गृह की जमीन को खाली कराने का नोटिस जारी किया है। द सूत्र ने उन्हें कई बार कॉल किया और मैसेज भी भेजा लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।